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Monday, March 9, 2015

महिला अर्थात जिसमें महान शक्तियां निहित हैं..


एक दिन औरत के नाम-

आदम की कहानी में स्त्री पुरुष का यह राजनैतिक, सामाजिक, एवं वैक्तिक भेद के अफसानों से पहले "दिन" की परिभाषा पर बात करना चाहूंगा, सूरज के निकलने और डूबने के मध्य का वक्त, तारीखों से पहले की बात है, जब आदमी को दिन के अतरिक्त समय की कोइ गणित नहीं मालूम थी, जब तारीख नहीं थी तो तवारीखों की बात करना बेमानी होगा, और तब आज के साइबेरिया कहे जाने वाले जैसे किसी इलाके में किसी जगह कोइ औरत हाथ में पत्थरों के औजार लेकर अपने अन्य स्त्री-पुरुष व् पुत्रों और पुत्रियों के साथ अपने कुटुंब की भूख मिटाने के लिए निकलती थी, उन बर्फीले पहाड़ों में, उसे यह नहीं पता होता था की इस शिकार यात्रा के बाद लौटते हुए उसमे से कितने अपने प्रवास स्थल पर वापस लौटेंगे, और उस नेतृत्व करने वाली औरत की पूरी जिन्दगी, जब तक उसकी हड्डियों में इतना बल रहता की वह जंगली जानवरों से लड़ सके, मौसम की मार को सहन कर सके तब तक वह अपने कुटुंब का भरण पोषण करती रहती और उसके बाद उसकी पुत्री इस नेतृत्व को आगे बढाती....पिता जैसी किसी परिभाषा ने अब तक जन्म ही नहीं लिया था...एक मातृ सत्ता के सरंक्षण में जीवन संघर्ष में रचा बसा आदमी...

कहानी आगे बढ़ती है, स्त्री नेतृत्व में शिकार दल जब मांस के अतिरिक्त जंगलों से फल फूल लाता और अपनी गुफाओं के आस पास खाए जा चुके फलों के बीजों को फेक देता तो कुछ समय बाद वहां पौधे उगते दिखाई देते, और उनमे उन्ही फलों की तरह फल, जिन्हें वह जंगलों से खोज कर लाते थे, बस यही वक्त था कृषि के आविष्कार का, और शायद इस आविष्कार की जननी भी कोई नेतृत्व करने वाली स्त्री ही रही होगी,...वक्त गुजरने के साथ ही आदमी की संख्या भी बढ़ने लगी और शिकार के लिए आपसी संघर्ष भी,...इलाके बांटे जाने लगे समुदायों के...आवश्यकताओं ने जब अपना असर जोर किया तो आदमी खेती और पशु-पालन की जुगत में लग गया, फिर क्या था आदमी प्रवासी से निवासी बन गया, साथ ही जमीन और पशुओं पर मालिकाना हक़ भी...स्त्री अभी भी स्वन्त्रत थी किन्तु जमीन और पशुधन पर अधिकार के भावों का प्रादुर्भाव हो चुका था, अभी जो बाकी था वह, धातुओं की खोज और आदम समुदायों में उनकी बढ़ती मांगों ने पूरा कर दिया, अभी तक जो जमीन जंगल जानवर और जरूरी हथियार मानव के पास अपनी जीविका चलाने के लिए ही थे, वह अब संपत्ति के  रूप में तब्दील हो गए...आवश्यकता व्यापार में बदल गयी.....और धन का प्रादुर्भाव हो गया.....बस यही वह छड थे इतिहास में जब आदमी की स्वाभाविक स्वछंदता में भय उत्पन्न हुआ संपत्ति के सरंक्षण और अधिकार के खो जाने का.....जो मानव धरती पर प्रकृति की सत्ता में खुद को आनन्दित पाता था बिना तेरा-मेरा के, वही आदमी अब खुद स्वामी बनने को आकुल हो उठा, यही पहला चरण था स्त्री के संपत्ति बनने का...जमीन, पशुधन को तो आदमी पहले ही अपने अधिकार क्षेत्रों में ले चुका था, बस उसे इस संपत्ति का वारिस चाहिए था! और संपत्ति के  दाखिल खारिज के पश्चात उसका मालिक कौन हो? इस बात के लिए आदमी को अब स्त्री को भी अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की कवायदे करनी थी....अंतत: हुआ भी ऐसा, जो स्त्री नेतृत्व करती थी अपने समुदाय के भरण पोषण के लिए, जो स्वछंद थी आदेशित करने के लिए वह अब एक पुरुष के संसर्ग में आने वाली थी जीवन पर्यंत के लिए...अतीत की इस घटना ने एक मौजूदा कहावत को चरितार्थ कर दिया था...जर जोरू और जमीन..!

स्त्री पुरुष के इन स्थाई? संबंधों ने सभ्यता को एक नया रूप दिया, पिता और बंधु-बांधवों के रिश्तों का प्रादुर्भाव हुआ, घर बने, नगर विकसित हुए, व्यवसाय में क्रान्ति आई, और साथ ही संघर्ष बढ़ा आदमी और आदमी के बीच, जो आज भी अनवरत जारी है, इतिहास के कालखंडों में इसी जार जोरू जमीन के लिए बड़ी बड़ी क्रांतियाँ हुई जिन्हें महाभारत जैसे तमाम महा-काव्यों में पढ़ा जा सकता है, ...हालांकि इस मातृ सत्ता से पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के बीच के समय में सभ्यता में बहुत से संक्रमण हुए....आदमी जंगलों अर्थात प्रकृति से दूर होता गया भौतिकता के पथ पर चलते चलते उसने कई कीर्तिमान गढ़े...तकनीक और विज्ञान के आज तक के सफ़र में ये वही सदियों पुराना मानव अब भी बिना पीछे मुड़ कर देखे हुए आगे बढ़ता जा रहा है, अब माता-पुत्र के संबंधों के बजाए  पिता-पुत्र के रिश्तों की सामाजिक पहचान होने लगी, समुदायों में, परिवारों में और सरकारों में, पिता के नाम से उसकी अगली पीढी जाने जानी लगी और दर्ज भी होने लगी, सरकारी तौर पर तो माता अप्रासंगिक ही हो गयी, गाँव का पटवारी व् जिले का कलेक्टर या अस्पताल का डाक्टर अपने दस्तावेजों में पुरुष का ही नाम दर्ज करता स्त्री की यदि बात आती तो कोइ भी नाम दर्ज कर दिया जाता, क्योंकि जर और जमीन पर स्त्री का कही कोइ अधिकार नहीं था, बस वह कथित गृह स्वामिनी और समाज में कथित तौर पर जानी पहचानी जाने वाली किसी की पत्नी या माता के रूप में स्थापित होती रही, यहाँ तक की मताधिकार के लिए मत सूचियों और परिवार रजिस्टरों में भी फर्जी नामों से जानी जाती रही ये स्त्रियाँ, यदि इन्हें मताधिकार प्रयोग करने के लिए जाना होता तो पति के नाम से ही इनकी पहचान होती...विडम्बना के क्षण थे ये और वजह थी संपत्ति में मालिकाना हक़ का न होना, पता नहीं इतिहास के उन कैसे क्षणों में स्त्री ने अपनी सत्ता को पुरुषों के हवाले किया और साथ ही अपने उन सारे हुनर भी हवाले कर दी पुरुषों के, स्त्री अब यदि कलाकार होती तो उसके उस हुनर को तमाशा मान लिया जाता, चाहे फिर वह नृत्य कला में पारंगत हो या गायन में या फिर घुड़सवारी में और या हथियारों के चलाने में, स्त्री की इन तमाम खूबियों को राज दरबारों से लेकर धर्म के गलियारों तक तमाशबीनों के मध्य तमाशा बनाया जाता रहा, पर कहानी के दूसरे पहलूँ में यह स्त्री बंधू बांधवों, पुत्र-पुत्रियों, नाते-रिश्तेदारों के मध्य सम्मानित व् गरिमामयी भी रही, इस घरेलू स्त्री के अपने कुछ विशेषाधिकार भी रहे.....कन्या के रूप में भी और देवी के रूप में भी यह तमाम सभ्यताओं में पूज्य रही...मानव प्रजाति के यह दो रूप विघटित कब से होने लगे यह जरूर शोध का विषय है, समाज की किन मनोदशाओं ने यह अलगाववादी मानसिकता को जन्म दिया? कब ये टकराव सामने आये, उस एक ही मानव में ...स्त्री पुरुष के अलाहिदा हक व् हुकूक के ....

कही न कही मताधिकार के प्रयोग से वंचित रखना, युद्ध व् खेल के मैदान में सिर्फ पुरुषों का होना, तथा लेखन आदि कलाओं में पुरुषों को ही महत्त्व मिलना, ये सब का कारण एक ही लगता है की व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी  पुरुष के हाथ में होना, प्रासंगिक भी वही होता है जिसके हाथ में जिम्मेदारिया होती है और जो उन्हें पूरा करता है, जाहिर है की तमाम अच्छे बुरे दोनों हालातों से स्त्रियाँ वंचित रही जिनसे पुरुष को ही दो चार होना था..आज वक्त बदला रहा सामाजिक व्यवस्थाएं भंग हो रही है, और स्त्री पुरुष के मध्य क़ानून की रेखाएं भी खींची जा रही है, एक पूर्णतया सरकारी व्यवस्था का अंग हो रहा है यह स्त्री पुरुष, और अब जब स्त्री पुरुष के बराबर दुनियाबी सभी कामों में शिरकत कर रही है, तो उसे भी दो चार होना पड़ रहा है उन कठिनाइयों से, जिनसे अभी तक पुरुष ही सामना करता आ रहा था, फिर चाहे वह आफिस में किया जाने वाला बुरा बर्ताव या फिर जंग के मैदान में दुश्मन की गोली, अब जो स्त्रियाँ इन कार्य क्षेत्रों में है जहां सिर्फ पुरुष ही थे कभी तो उन्हें भी उन सबसे गुजरना पड़ रहा है, कुलमिलाकर व्यवस्था में स्त्री पुरुष के समावेश से दोनों को को अब वह लाभ और हानि उठाने पड़ रहे है जिन्हें अभी तक पुरुष ही भोगता और झेलता आया है, फिर यह हल्ला क्यों....जब एक सी जिम्मेदारियां होगी तो जाहिर है टकराव होगा, जिम्मेदारियां जब बांटी गयी थी तब ये टकराव नहीं थे फिर चाहे वह माता की सत्ता की व्यवस्था हो या पिता की, हाँ स्वीकार्यता थी यहाँ पर स्त्री और पुरुष दोनों की एक दूसरे की सत्ता की......

आदि मानव से चलकर आदमी का कारवां जब देवत्व की अवधारणा तक पहुंचा, देव-भाषाएँ गढ़ी गयी और उनमे देवी देवताओं की महिमा का गुणगान भी, वहां भी देवी अर्थात स्त्री सर्व-पूज्य रही, इसी देव भाषा अर्थात संस्कृत का एक शब्द है "महिला" जिसका पर्याय होता है "जो तमाम शक्तियों से विभूषित हो" बिनोवा भावे ने अपनी पुस्तक "स्त्री शक्ति" में इस ब्रह्मचारी ने प्रकृति में महिला तत्व की बहुत सुन्दर व्याख्या की...किन्तु यदि आज के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मनाये जा रहे दिवसों की तरफ दृष्टी डाले तो यह सिर्फ दुनिया का सारा जिम्मा अपने ऊपर लेने वाली कुछ संस्थाओं की एक राजनैतिक कवायद है, बहुत से फंड को खर्च कर विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा खुद की प्रासंगिकता सिद्ध करना ज्यादा जाहिर होता है इनमे, हालांकि इसी बहाने कुछ लाभ अवश्य मिल जाता है उस विषय वस्तु को जिस पर यह कथित दिन आधारित होते है ! 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च मुख्यता योरोप में सन २००९ में महिलाओं द्वारा किये गए आन्दोलन जो कि कपड़ों के व्यवसाय में सलग्न कामगार महिलाओं ने किया था, की स्मृति में मनाया जाता है, यह आन्दोलन भी सोशियालिज्म से प्रभावित था, बाद में सन २०१४ में जर्मनी में मताधिआर के लिए महिलाओं ने आन्दोलन किए और रूस में भी तमाम कामगार महिलाओं ने आवाज बुलंद की, सच्चाई ये थी की ये आन्दोलन दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ थे और साम्यवाद के उद्भव की यह शुरूवात थी. बस २६ फरवरी और आठ मार्च के मध्य जो असमंजस है वह जूलियन कैलेण्डर व्  ग्रेगेरियन कैलेण्डर के बीच की गणनाओं की रस्सा-कसी का नतीजा है....अब भारत ने भी पिछले वर्ष से सरोजनी नायडू के जन्म दिवस पर राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना शुरू ए किया है ....भारत में ही नहीं दुनिया में तमाम जीव जंतुओं के लिए दिवस घोषित किए है, सयुक्त राष्ट्र में बड़ी बड़ी योजनाए और कार्यक्रम बनते है, किन्तु बाघ दिवस हाथी दिवस आदि दिवसों की जगह पर उनके दिवसों को लिंग के आधार पर दिवस मनाने की परम्परा अभी नहीं शुरू हुई, यहाँ लिंग भेद नहीं है, प्रजाति पर फोकस है!...

फिर मौजूदा वक्त में ये दिवस उल्ल्हास का प्रतीक नहीं रहे, जिस भी जीव पर संकट मँडराता है, उसके नाम से दिवस घोषित कर दिए जाते है, यह दिवस प्रतीक है उस विषय के लिए जिसके लिए दिवस मनाया जा रहा है, तो फिर संस्कृत का यह शब्द क्या झूठा जिसमे स्त्री को महिला शब्द से चिन्हित किया गया, जो शक्तियों से विभूषित है, जिसकी सत्ता घर और समाज दोनों में है, नजरिया बदलने की आवश्यकता है समाज को संस्कार देने की भी, क्योंकि कोई भी क़ानून किसी के अधिकार पूर्णतया नहीं दिला सकता जब तक उसकी सामाजिक मान्यता नहीं और न ही अपराधों को रोक सकता है, स्त्री या पुरुष दोनों की पहचान समाज में उसके कुल जाति  धर्म से होती थी, अब सरकारी दस्तावेजों में सामान्य पिछड़ी और अनुसूचित जाति  में होती है, बस हमने पुराना तानाबाना ख़त्म कर एक नई व्यवस्था लागू कर दी, किन्तु क्या इन सभी अगड़ों या पिछड़ी जातियों में एकता आ गयी ..एक जगह नाम दर्ज कर देने से ...खैर सरकारी अधिकार महिला पुरुष दोनों के बराबर हो यह जरूरी है किन्तु इनके बीच सरकारी लकीर न खींची जाए और न ही इन्हें सामाजिक व्यवस्था से अलाहिदा किया जाए....क्योंकि क़ानून समाज के बाद का मुद्दा होता है....और सामाजिक न्याय सरकारी न्याय से बड़ा ...

दिवसों के पीछे छुपी बेचारगी और आडम्बर युक्त करुणा से दूर ही रहे तो अच्छा है, क्रान्तियाँ  हो पर मुद्दों पर फिर वो चाहे महिला के मताधिकार की हो यह उसके नौकरी या व्यवसाय से जुडी हो, तभी शायद मैंने कही लिखा था की "अब पुरुष दिवस कब मनाया जाएगा" उसके पीछे भी यही वजह थी ! एक व्यंग जिसके पीछे वो तथ्य है जो कमजोरी बयान करते है दिवसों को आक्षेपित करने वाले जीव या वस्तु की !

प्रकृति को सब मालूम होता है तभी तो उसने विद्धुत ऊर्जा के आविष्कार से करोड़ो वर्ष पहले पक्षियों के पंजों को रक्तहीन बनाया ताकि बिजली के तारों में दौड़ते करंट से वह बच सके, और एकलिंगी पुष्पों के अलावा द्विलिंगी  पुष्प भी ताकि महिला पुरुष जैसे पुष्प अलाहिदा होने लगे कानून की किताबों से लेकर यथार्थ में भी तब भी प्रकृति की गति यूं ही चलती रहे....!!

शुभकामनाएं और महिलाओं से क्षमा यदि कुछ यथोचित न लगे मेरे लेखन में !


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com





Saturday, December 24, 2011

भारत में एक योरोपियन रियासत की कहानी

J.B.Hearsey's Bungalow at Mamri Lakhimpur, India
राजा ममरी का किला-

भारत में योरोपियन रियासत की एक कहानी-

महान! एंग्लो- इंडियन हर्षे परिवार के निशानात मौजूद है उत्तर भारत के खीरी जनपद में-

ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार से शुरू होकर आजाद भारत के रियासतदारों में हर्षे कुनुबा-

अब वे दरो-दीवार भी मायूस है ..

उत्तर भारत की तराई सर्द मौसम, घना कोहरा जो नज़ारों को धुंधला देखने के लिए मजबूर कर रहा था, कोहरे की धुंध और सर्द हवाओं में गुजरते हुए इतिहास की रूमानियत लिए मैं ब्रिटिश-भारत के उस महत्वपूर्ण जगह से रूबरू होने जा रहा था जो अब तक अनजानी और अनकही थी इतिहास के धरातल पर...

इस जगह के बारे में मैं एक दशक से किताबी राफ़्ता रख रहा था, किन्तु नाजिर होने का मौका आज था, मन में तमाम खयालात और अपने किताबी मालूमात के आधार पर कहानियां गढ़ते मैं अपने एक साथी गौरव गिरि (गोलागोकर्ननाथ) के साथ गोला से मोहम्मदी मार्ग पर चला जा रहा था। बताने वालो के मुताबिक मार्ग पर स्थित ममरी गांव को पार कर लेने के बाद एक नहर पुल मिलना था और फ़िर उस जगह से वह एतिहासिक स्थल दिखाई पड़ेगा ऐसा कहा गया था!

 ज्यों ही नहर के पुल पर पहुंचा और ठहर गया, आंखे खोजने लगी उस अतीत को जो हमारा और उनका मिला जुला था, बस फ़र्क इतना था कि इस इतिहास को गढ़ने वाले वे लोग हुक्मरान थे, इस जमीन के, और हम सामन्य प्रजा। नहर के पुल से मैं पश्चिम में जल की धारा के विपरीत चला, जहां एक बागीचा था और उसमें मौजूद कुछ खण्डहर, अपने अतीत और वर्तमान के साथ, और उनका भविष्य उनके वर्तमान में परिलक्षित हो रहा था। मैं मायूस हुआ वो एक नहर कोठी थी सुन्दर किन्तु ध्वंश ! बरतानिया शासन की नहर कोठियों में बहुत दिलचस्पी रही मेरी, परन्तु आज मैं कुछ और ही तलाश रहा था......
हमारी जमीन पर गोरो की सत्ता का केन्द्र- हर्षे बंग्लो:

आखिरकार हमें वापस पुल पर फ़िर आना पड़ा और नहर की जल धारा के समानान्तर चलते हुए मुझे कुछ दिखाई पड़ा एक सुन्दर दृष्य- खजूर के विशाल वृक्ष, तालाब, पीली सरसो के फ़ूलों से भरे खेत और इसके बाद एक किलेनुमा इमारत-----बस यही तो वह जगह थी जिसकी मुझे तलाश वर्षो से थी। जिसके बारे में पढ़ते और सुनते आये थे...किवदन्तियां, रहस्य और वृतान्त.....

उस किले के नजदीक जाने से पहले कुछ तस्वीरे खीची और फ़िर मैं उस इमारत के सामने के प्रांगण में जा पहुंचा, जहां पास  के खेत में काम करता हुआ एक व्यक्ति दिखाई दिया, आवाज देने पर वह मेरे नजदीक आया- नाम पूछने पर पता चला वह छोटे सिंह है, इस कोठी के मालिक ज्वाला सिंह का पुत्र । मैने उस कोठी के अन्दर घुसने का विनम्र दुस्साहस करने की बात कही तो उसने मना कर दिया, वह सहमा हुआ सा था, जिसकी कुछ अपनी वजहे थी। किन्तु थोड़ी देर बाद वह इमारत से बाहर आया और अन्दर आने के लिए कहा, मेरे मन में बस कोठी की अन्दरूनी बनावट, पुराना एंग्लो-इंडियन फ़र्नीचर और कुछ अवशेष देखने भर की थी, खैर मैं इमारत के बाहरी कमरे में घुसा तो नजारा बिल्कुल अलग था, एक बांस की खाट (खटिया) पर लेटे एक बुजुर्ग रूग्ण और बुरे हालातों से लत-पत, कमरे कोई फ़र्नीचर नही और न ही बरतानिया हुकूमत के कोई शाही निशानात सिवाय गीली छत और बे-नूर हो चुकी दीवारो के, छतों में भी घास और वृक्षों की पतली जड़े सांपों की तरह घुमड़ी हुई दिखाई दे रही थी।


 एडिमिनिस्ट्रेटर जनरल  ने इसकी नीलामी कराई

उनसे मुलाकात हो जाने पर कुछ मैं खश हुआ चलो इनकी आंखो से इस इमारत के इतिहास को देखते है, ज्वाला सिंह जो कभी मिलीट्री वर्कशॉप बरेली में नौकरी कर चुके थे और अब रिटायर्ड होकर यही रहते थे अपनी पत्नी और बेटे के साथ, इनके पिता गम्भीर सिंह (डिस्ट्रिक एग्रीकल्चर आफ़ीसर) ने इस इमारत को सन 1966 में खरीदा,  भारत सरकार द्वारा जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम के तहत इस सम्पत्ति की नीलामी की और मात्र २९ हजार रुपयें में यह शाही इमारत और ३० एकड़ भूमि को क्रय कर दिया गया, और तबसे यह सम्पत्ति इनके परिवार के आधीन है। गम्भीर सिंह के तीन पुत्रों में सबसे छोटे ज्वाला सिंह इस जगह के मालिक है। ये पुणीर क्षत्रियों का परिवार मूलत: मुजफ़्फ़रनगर का है

तिब्बतियों ने भी शरण ली हर्षे के महल में-

ज्वाला सिंह के मुताबिक सन 1962 में चाइना-भारत युद्ध के समय तमाम तिब्बती प्रवासियों को इस इमारत में ठहराया गया और उसके बाद इसमें रेवन्यु आफ़िस खोला गया। नतीजतन इस किले का शानदार फ़र्नीचर और सामान या तो सरकारी मुलाजिम जब्त कर गये या तिब्बतियों ने- आज बस वीरान इमारत के सिवा यहां कुछ नही।  



इमारत के निर्माण वर्ष को ठीक से वे बता नही सके, और इमारत की प्राचीरों से कोई लिखित प्रमाण भी नही मिला, सिवाय ईंटों के, शुक्र है कि उस वक्त ईंट भट्टों में जिन ईंटों का निर्माण किया जाता था उनमें ईंस्वी सन या संवत का वर्ष पड़ा होता था, और इस वजह से ध्वंश अवशेषों के निर्माण-काल ज्ञात हो जाता है। किन्तु आजकल ईंट भठ्ठे वाले उल्टे सीधे नामों को छापते है ईंटों पर ! 

फ़ूस-बंग्ला-

ध्वंशाशेषों में कुएं की प्राचीर से मिली ईंटों पर सन 1884 की ईंटे प्राप्त हुई और दीवार की प्राचीरों से सन 1912 ई० की, यानि यह जगह सन 1884 के आस-पास आबाद की गयी। बताते हैं मौजूदा इमारत के पहले फ़ूस के बंगलों से आछांदित था यह बंगला, इस इमारत के मालिकों को भारतीय घास फ़ूस के वातानुकूलित व मजबूती के गुणों का शायद भान था और इसी लिए जिला मुख्यालय पर मौजूद इनकी कोठी भी फ़ूस से निर्मित थी- जिसे लोग फ़ूस -बंग्ला भी कहते आये। 


ज्वाला सिंह के मुताबिक इस इमारत और जमीन जायदात के मालिक जे० बी० हर्षे जमींदारी विनाश अधिनियम के पश्चात सम्पत्ति जब्त हो जाने के बाद मसूरी में रहने लगे थे और सन 1953 में  वही हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हुई।


योरोपियन वनस्पति?-



एक बात और और इन्सान जहा रहता है वहां के वातावरण को अपने मुताबिक ढालता है, और वही वजह रही कि इस जगह पर अभी भी योरोपियन वृक्ष, लताये मौजूद है । अपने गौरवशाली अतीत में यह इमारत बहुत ही खूबसूरत रही होगी और इस इमारत का एक गृह-गर्भ भी है, यानि जमीन के भीतर का हिस्सा जो रियासती दौर में खजाना रखने के काम आता था।



इमारत के चारो तरफ़ फ़ूली सरसों इसकी सुन्दरता को अभी भी स्वर्णिम आभा दे रही , आस-पास में बने सर्वेन्ट क्वार्टर्स, रसोई, कुआ इत्यादि, जिनमें तमाम अनजानी बेल, झाड़िया...1857, और कुछ रहस्य पोशीदा है, जिन्हे वक्त आने पर बताऊंगा.....!
मिलनिया-
एक नये शब्द की खोज भी हुई उस जगह पर अपने अन्वेशण के दौरान इमारत के पिछले हिस्से की तरफ़ मैं तस्वीरे ले रहा था तभी लकड़ियों का बोझ लिए एक महिला वहां से गुजरी, मै बात कर रहा था बहुत छोटे कमरे की जिस पर खपरैल बिछा था, उसने कहा कि यह मन्दिरथा जिसे योरोपियन मालिको ने नह बल्कि मौजूदा मालिकों ने बनवाया था और यहां पर एक मिलनिया लगवाई थी- पूछने पर पता चला गन्ना पेरने वाला कोल्हूं को उसने मिलनिया कहा था !  


मंजर वही है बस नाजिर और वक्त बदल गये-
...अब मैं लौट रहा था सूरज भी यहां से मेरे साथ-साथ चल दिया था, मै उस जाते हुए सूरज को कैमरे में कैद कर रहा था, यह सोचकर इसने अब तक मेरा साथ दिया, नजारों को रोशन किया और इसकी रोशनी ने तस्वीरे लेने में मदद की, यह भी गवाह बना मेरी मौजूदगी का, कृत्यज्ञता का भाव था उस कथित डूबते सूरज के लिए, मैं सोचने लगा कि कभी बरतानिया हु्कूमत में इस रियासत के हुक्मरान हर्षे परिवार के लोग बड़ी रूमानियत से सूरज के डूबने का नजारा देखते होगे और खुश होते होगे- कि ब्रिटिश राज का सूरज कभी नही डूबता.....और आजादी के बाद जब यह सूरज डूब रहा होगा तब भी उन गोरो ने अपने इस किले से बड़ी मायूसी और हार के भाव से उसे डूबते हुए देखा होगा, और आज ये आजाद भारत के ठाकुर साहब जो मौजूदा मालिक है अपने रूग्ण शरीर और विपरीत परिस्थिति के साथ इस सूरज के डबने के मंजर को देख रहे होगे, मंजर एक ही है पर मनोभाव जुदा-जुदा है...काल और परिस्थिति इन्सानी सोच में इतनी तब्दीली लाती है की चीजों के मायने बदल जाते है जहन से....

इति 


नोट- इस किले के रहस्य और इसके मालिकानों का तस्किरा कभी और...हां इतना बता दूं कि खीरी जनपद की इस इमारत में रहने वाले योरोपियन मालिकान बंकिमघम पैलेस से लेकर फ़्रान्स और अमेरिका में अपनी बुलन्द हैसियत के लिए जाने जाते रहे हैं।  
© कृष्ण कुमार मिश्र (सर्वाधिकार सुरक्षित)




कृष्ण कुमार मिश्र
Cellular: +91-9451925997
krishna.manhan@gmail.com

Thursday, July 29, 2010

जो रईंसों के घर-आँगन में खिलने का गरूर रखते थे!

Kachnar: Photo courtsey: Wikipedia.com
पुष्पवाटिकायें जिनसे महरूम रहा आम आदमीं!

बात फ़ूलों की करना चाह्ता हूं, चूंकि मसला खूबसूरती और खुशबुओं का है, तो थोड़ा हिचक रहा हूं! प्रकृति की अतुलनीय सुन्दरता का बखान करना वर्तमान में मुश्किल और पिछड़ेपन  की निशानी है..इन महान साहित्य पुरोधाओं के मध्य…क्योंकि वह समाज की गन्दगी जो उनकी नज़र में पहले से मौजूद है, रिस्तों की कड़वाहट जो उनके घरों में विद्यमान है…दुखों, करूणाओं और प्रेम के तमाम विद्रूप आकार-प्रकारों को (जो उनके मन शाम-सबेरे हर वक्त उपजते रहते हैं) बेचते ये बुद्धि-विद्या के स्वयंभू अब प्रकृति की बात करने में शर्मसार होते है..कारण स्पष्ट है कि रेलवे स्टेशनों, बसड्डों बुक स्टालों पर प्रकृति प्रेम! नही खोजते यात्री! और राजिनीतिक गलियारों में वोट और गोट में प्रकृति समा ही नही सकती!…फ़िर कौन बेवकूफ़ इन्हे फ़ूल, पत्तियों पर लेखन के लिए पुरस्कृत कर देगा! खैर..मैं लिए चलता हूं कालीदास और उस दौर के तमाम…. प्रकृतिकारों का नाम भूल रहा हूं!!!!…..  जब सरोवरों में कमल-कमलिनियां पुष्पित होते थे और राज-कन्यायें उनमें स्नान करने आया करती थी…तो घोड़े पर सवार राज-पुरूषों के घोड़ो को अक्सर उन्ही सरोवरों पर पानी पिलाना आवश्यक होता था !! महलों और बगीचों में युनान,  मंगोलिया, अरब देशो से लाये गये वृक्षों, झाड़ियों, और लताओं की सुनहरी छटाओं का जिक्र रामायण काल से लेकर राज महलों व बौद्ध मठों तक विस्तारित था! मुगलों ने भी दुनियाभर से प्रकृति के विविध रूपों को अपने बगीचों में खूब इकट्ठा किया….फ़ुलवारियों के रूप में!…हाँ हमें अंग्रेजों को कतई नही भूलना हैं जिन्होंने दुनिया में मौजूद अपने साम्रराज्य के प्रत्येक भू-भाग पर उगने वाली सुन्दरता को भारत के विविधता पूर्ण  मौसम व जमीन में रचा-बसा दिया, जिसकी कुछ झलकें अभी भी कुछ सरकारी आवासों में दिखाई दे जाती हैं!…

मैं आप को याद दिला दूं एडविन लैंडसीयर लुटियन की जिसने नई दिल्ली का निर्माण किया और गवर्नर हाउस, रायसीना हिल जैसी जगहों को प्रकृति के इन रंगो से सरोबार….!! भारत के वन विभाग के पुराने डाक बंग्लों में कुछ योरोपीय व अफ़्रीकी वनस्पतियां अभी भी मिल जायेंगी जिन्हे अंग्रेज सुन्दरता और सुगन्ध के लिए इन जगहों पर लगाया था!….एक बात कहना चाहूंगा कि धरती पर कोई प्रजाति देशी-विदेशी नही होती…बशर्ते उसे धरती का वह हिस्सा उस प्रजाति को अपना ले…..!

अब भूमिका शायद लम्बी व निरर्थक हो रही तो चलिए आप को ले चलते है उत्तर भारत के मैनहन ग्राम में जहा सरोवर भी है और आम-जामुन व पलाश के बगीचे भी, जो धीरे-धीरे पतन की राह पर अग्रसर किए जा रहे हैं! १९८०-९० के भारत में बचपन में मैनें उन्ही गांवों में फ़ुलवारियां देखी जहां कोई मन्दिर मौजूद हुआ और उसके आस-पास पुजारी प्रवृत्ति के लोग…उन्हे रोज जो भगवान को पुष्प अर्पित करने होते थे! सो पुष्प की उप्लब्धता की व्यवस्था  भगवान की मौजूदगी पर निर्भर थी! इन फ़ुलवारियों के रूप में! नही तो पुष्प व पुष्प-वाटिकायें आदि भारत में राजा-महराजाओं, मध्य भारत में नवाबों और माडर्न ईंडिया में अफ़सरों का विषय ही रहे, एक आम व औसत हिन्दुस्तानी रोटी के जुगाड़ में ही दिन काट रहा होता था उसे तो पेट भरने के लिए रोटी की सुगन्ध ही दरकार रही बेचारा पुष्प और उनकी खुशबुओं से बावस्ता हो, इसका न तो उसे कभी मौका मिला और न ही खयाल आ पाया। हाँ इतिहास के पन्नों में जमींदारों और राजाओं की जो फ़ुलवारियां हुआ करती थी, उनमें न तो आम हिन्दुस्तानी को जाने की इजाजत थी और न ही उस फ़ुलवारी के किसी पौधें का बीज या कलम किसी अन्य को मिल सकती थी..कारण स्पष्ट था कि आम हिन्दुस्तानी के घर में पुष्प खिला, तो उन जमींदार महाशय के रसूख में धब्बा लग जायेगा….

एक वाकया याद आ गया है, सुन ले….मेरे जनपद की तहसील मोहम्मदी जो कभी बरतानिया सरकार में  जिला होने का गौरव रख चुका है, वहां दिल्ली सरकार (मुगल) के समय डिप्टी कमिश्नर  टाइप की हैसियत से रहने वाले जनाब ने एक बगीचा लगाया था, उसमें केतकी (केवड़ा) का पुष्प कहीं से लाया गया, जो इस इलाके भर में अदभुत व अप्राप्त वनस्पति वन कर सैकड़ों सालों तक गौरवान्वित होता रहा…आम हिन्दुस्तानी जिसकी आज भी आदत क्या खून में यह पैबस्त है, कि राजा के घर की घास-पूस भी कुछ अतुलनीयता अवश्य रखती है…और वह मूर्ख उस सामान्य बात या वस्तु को असमान्य ढंग से पेश करता हुआ अपने को गौरवान्वित करता आया है….हाँ तो वह साधारण सा केवड़ा केतकी वन सिर्फ़ उसी बाग में खिलता रहा और हमारे लोग यहाँ तक की मीडिया गौरवगीत गा गा कर भरार्ने लगा….लेकिन सिलसिला नही टूटा….आदत में है जो…..कभी भारत की विविधिता का खयाल भी नही किया कि जहां हर देवता के सहस्र नाम हो, जहां की भाषा पर्यावाचियों से लबालब ठसी हुई हो..जहां एक कोस पर चीजों के नाम बदल जाते हों…इस बारे में भी नही सोचा…केतकी ही केवड़ा है जो हमारे गांवों में भी खिलता है!..बस केतकी जो वर्ष में एक बार  खिलती है!….दुनिया में सिर्फ़ मोहम्मदी में…संसार में नही होती…फ़लाने हसन द्वारा लाई गयी..केतकी….यह डाकूमेन्टेशन है हमारे मुल्क में…..बहुत जल्दी जहां चीजे बिना सोचे समझे अदभुत हो जाती है…और सरकार व पढ़े लिखे लोग उसे पढ़ते जाते है…बिना सोचे…जाने….साल दर साल केतकी खिलती रही….अभी भी खिलती है…….पूरे संसार में सिर्फ़ खीरी जिले को यह गौरव प्राप्त है…..आखिर फ़िर वह लाये कहां से थे इस केतकी को?..जब संसार में सिर्फ़…..मजा तो तब आया जब मेरे एक परिचित बुजर्ग ने गर्जना करते हुए मुझसे कहा कि केतकी उनके यहां खिला…..उनकी गर्जना में सदियों से गुलाम रहे हिन्दुस्तानी के भीतर चेतना व आत्म-गौरव का झरना स्फ़ुटित हो रहा था…जैसे वह तोड़ देना चाहते हो उन जंजीरों को जो सिर्फ़ यही कहती हो कि यह पुष्प सिर्फ़ राजा या नवाब के बगीचे में खिलता हो….उन्हे मैं सलाम करता हूं उनके इस जज्बे के लिए….काश…फ़िर सराहनीय है उनका प्रयास!
दरसल वो कही से केतकी का सम्पूर्ण (!) पौधा लाये और उसे रोप दिया…इसमें एक टेक्निकल मामला है, मोहम्मदी वाले केतकी का पौधा जमींदारी रहते तो आम आदमी को अपने घर लगाने की गुस्ताखी नही कर सकता था, लेकिन आजादी के बाद उसने जरूर प्रयास किए..किन्तु इस प्रजाति में नर व मादा पौधे अलग-अलग होते हैं ..इसलिए जिसने भी एक पौध उखाड़ कर अपने घरों में लगाई तो नर व मादा में से एक की अनुपस्थिति उसमे पुष्पं के पल्लवन में बाधक बनी रही। अंतत: यह मान लिया गया कि यह पौधा उसी बाग में खिल सकता है….नवाब साहब …के बाग …कोई कहता वह पौधे के साथ उस जगह से मिट्टी भी लाये थे..इसीलिए यह उसी बगीचे में खिल सकता है!….या कोई कहता भाई आदमी आदमी की बात होती है, उसके हाथों में…..
मौजूदा हालातों में अनिभिज्ञता व चलन में न होने के कारण वाटिकाओं से फ़ासला रहना जाहिर है, हमारें लोगों का, पर सबसे बड़ी दुश्वारी है, जमीन के हर टुकड़े पर खेती करने की होड़, या जमीन की कमी, जिसमें पेट पालना पहली जरूरत होती है! गाँवों का बदलता परिवेश, किन्तु मौके फ़िर भी है, हम थोड़ी सी ही जगह से सुवासित कर सकते है, गाँव की धरा को, और मौका दे सकते हैं, उन्हे जो अब हमारे आँगन व द्वारे पर नही दिखते...रंग बिरंगी तितलिया, गुनगुनाते भौरें, मकरन्द खाती चिड़ियां......वो सभी कुछ जो अब किताबी है वापस हो सकता है! इन्ही सब बातों के दरम्यान हम वापसी की तैयारी में उन सबकी जो राजाओं के घर-आँगन में खिलने का गरूर रखते थे! 
खैर अब चलिए मैनहन में जहाँ मैने अपने पूर्वजों के घर के पुनर्निर्माण के साथ-साथ दुआरे पर फ़ुलवारी की परिकल्पना पर काम कर रहा हूं..आखिर आजाद भारत का बाशिन्दा हूं और फ़िजाओं में खुसबूं और सुन्दरता तलाशने का मुझे पूरा हक है! तो मैने पहले चरण में…हरसिंगार, चम्पा, चमेली, रात के रानी, अलमान्डा, बेला, मालती,  के पौधे रोपे हैं, दूसरे चरण में मैं गन्धराज, मौलश्री, जूही, कचनार, बेल का रोपन करूंगा, साथ ही बरगद, सागौन जैसे विशाल वृक्ष भी मेरी कार में सुसज्जित है….जिन्हे कल रोपित किया जायेगा….फ़िलहाल मेरा अगला कदम गाँव के हर व्यक्ति कों तमाम खुशबुओं वाले पौधें भेट करने का निश्चय है!…लेकिन क्रमबृद्ध तरीके से…शायद रात की रानी मिशन…बेला…..चमेली….या फ़िर गन्धराज मिशन…एक वर्ष में प्रत्येक सगन्ध पुष्प वाले पौधों  में एक सुगन्धित पौधा वितरित करूंगा…जो हर घर में पल्ल्वित हो…..इसी इरादे के साथ.. पुष्पवाटिकाओं के चलन की शुरूवात करने की कोशिश…शायद रिषियों, और राज-कन्याओं और राज-पुरूषों के शैरगाह की जगहें आम हो सके आम आदमी के मध्य…जमींदारों, नवाबों और नौकरशाहों के बगीचों का मान तोड़ती ये पुष्पवाटिकायें एक औसत हिन्दुस्तानी को अपनी परेशानियों व तंगहालियों की गन्ध के मध्य विविध सुगन्धों का एहसास करा सके…और सुगन्धों व नवाबों के मध्य रिस्तों का मिथक टूट पाये….!

कृष्ण कुमा्र मिश्र
मैनहन-262727
भारतवर्ष

Tuesday, June 29, 2010

उदन्ती में गौरैया!

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित उदन्ती पत्रिका में प्रकाशित लेख जो गौरैया सरंक्षण को समर्पित हैं,



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यह लेख को जो उदन्ती पत्रिका में प्रकाशित हुआ- दुधवा लाइव के गौरैया बचाओ जनाभियान को  नुकूश-ए-कतरन में पढ़िए



Friday, November 13, 2009

हमें नेता नही प्रबन्धक चाहिये!


एक कविता जो मैने अपने बचपन में लिखी थी और आज मुझे एक टुकड़ा मिला है उसका जो फ़टा हुआ था बचे हुए अंश................

नेताओं के इस जंगल में
नेताओं के इस दंगल में


तिल-तिल जलता है इंसान (शोषित होता है इन्सान)


नेताओं के इस दलदल में
फ़ंसता रहता है इन्सान


नेताओं की इस नगरी में
फ़ीका है हर इक इन्सान


आपस में ये लड़ते-झगड़ते                                                                                पिसता है ये इन्सान                           
नेताओं को कौन सुधारे...............कागज फ़ट चुका है!

भाई हम आज़ाद मुल्क के बाशिन्दे है जहां प्राकृतिक संसाधन के साथ-साथ औद्योगिक विकास भी खूब हुआ है ।
नेता का पर्याय है नेतृत्व करने वाला, मुद्दों पर अटल रहकर जनहित में कार्य करना पर क्या आप को लगता है हमारे यहां अब कोई नेता बचा है जिसमे वास्तविक नेतृत्व की क्षमता है सिवाय राजिनीति करने के!

हमारे मुल्क में सहकारिता भी भृष्टाचार की भेट चढ़ गयी तो अब हम शासन को प्राईवेट लिमिटेड की तरह क्यो न ट्रीट करे जिसमे हमारे मुल्क का हर नागरिक शेयर धारक हो और नेता उस कम्पनी के प्रबन्धक हो जो सबकी भागीदारी सुनश्चित कर उनके रोज़गार और नागरिकों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करे! यथायोग्य सभी को काम मिले । जबकि इसकी जगह पर जनता को भड़काकर अभी भी क्रान्ति और परिवर्तन की बेहुदा बाते करते है ये नेता और पांच साल के लिये बेवकूफ़ बनाते है हमें। जब सत्ता में बैठा शासक मालिकाना हक रखता है मुल्क पर तो उसे नागरिकॊं के लिए अपनी जिम्मेदारी से क्यो मुह फ़ेर लेता है ।

मुझे तो जनता शब्द में राजतन्त्र की बू आती है और शासन जैसे शब्द में तानाशाही........................

आम सहभागिता सुनिश्चित हो और अनियोजित विकास बन्द हो! और भारत के सभी प्रान्तों के लोगों को एक ही मुख्यधारा में समाहित किया जाय!

Wednesday, May 20, 2009

संविधान निर्माताओं में से एक मेरे घर से भी- पं० बंशीधर मिश्र


१६ राजा बनाम पं०वंशीधर मिश्र- अपने समय के बेहतरीन राजनीतिज्ञ

संविधान निर्मात्री सभा के लखीमपुर खीरी से पं० बंशीधर मिश्र जी सद्स्य थे , जब गुलाम भारत के नेताओं ने ब्रिटिश कैबिनेट मिसन के नेताओं ने एक निगोसिएसन के तहत संविधान सभा का चुनाव प्रदेशीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा किया गया उसमे भारत की तमाम रियासतों के राजा महराजाओं को भी हक था अपने वोट का प्रयोग करने का इस प्रकार संविधान सभा की प्रथम बैठक ९ दिसम्बर १९४६ को दिल्ली में हुई ब्रिटिश राज़ में, तब पाकिस्तान की विधान सभायें भी इसमे सम्मलित थी और वहां के राजा महाराजा भी कान्ग्रेस बहुमत मे थी, १५ अगस्त १९४७ के बाद जब पाकिस्तान भारत से अलग हुआ तब संविधान सभा में कुल २०७ सदस्य थे जिनमें २८ सदस्य मुस्लिम लीग़ के, १५ महिला सदस्य और ९० नामित विभिन्न रियासतों के नामित राजा-महाराजा, शेष कान्ग्रेस के सदस्य कांग्रेस पूर्ण बहुमत में थी ८२ % वोट कांग्रेस के पास थे। १५ अगस्त १९४७ को भारत (डोमेनिअन)की आज़ादी के बाद यही संविधान सभा लोकसभा के रूप में जानी गयी इस लिहाज़ से पं० बंशी धर मिश्र खीरी से पहले संसद सदस्य भी थे। खीरी के लोगों को फ़क्र होना चाहिये की यहां से किसी व्यक्ति ने भारत के संविधान पर हस्ताक्षर किये।
इस तरह से लखीमपुर खीरी का संविधान निर्माण में योगदान होने का गौरव हम सभी को होना चाहिये और इस गौरव को देने वाले व्यक्ति का पर इसे विडंबना ही कहेगे कि पं० जी की कोई फ़ोटो या प्रतिमा खीरी के किसी भी यथा उचित स्थान पर नही है और अब न ही लोग उन्हे जानते हैं यह दुखद है कि हम अपने गौरवशाली अतीत को भूलते जा रहे है तो फ़िर भविष्य कैसे बेह्तर होगा!

राजनीति का महारथी- पंडित वंशीधर मिश्र
आज भारत के चुनावी महापर्व पर मुझे कुछ पुराने समय के बेह्तरीन महापुरषों का स्मरण बरबस होता है जो मैने अपने पिता से दादा से, नाना से और मां से सुना आप सभी को बताता हूं!
सन १९५२ के प्रथम चुनाव जब लोकसभा और विधान सभा के चुनाव साथ साथ हुआ करते थे आजादी की लडाई का ताजा ताजा खुमार अभी बाकी था लोगो मे देश प्रेम के जज्बे अभी बाकी थे और इस प्रथम उत्सव में लोग बड़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे ......एक आज़ाद मुल्क के आज़ाद लोग !!
कांग्रेस जो प्रतीक थी आज़ादी की और भारत का गरीब तबका शायद राजा महाराजाओं को छोड कर धन के मामले में सभी गरीब थे। और ये सभी कांग्रेस के साथ थे उस समय खीरी से पण्डित वन्शीधर मिश्र विधान सभा का चुनाव लड रहे थे और लोक सभा से कुंवर खुसवक्त राय ! वंशीधर मिश्र असल में वह नाम था जिसके नाम से कांग्रेस और कांग्रेस के नाम से पंडित जी, उनकी तस्वीर देख कर ऐसा मालूम पड़्ता है वो नेता जी से प्रभावित थे उनका ऎनक सुभाष बाबू की तरह और उनका पहनावा भी सु्भाष जैसा और क्यो ना हो नेता जी पूरे भारत के हीरो थे भले वह कांग्रेस की राजनैतिक व्यवस्था से अलग रहे हो!
लक्ष्मीपुर यानी लखीमपुर खीरी जहां वन संपदा बहुतायात में थी तो वंशीधर जी के १९५२ के चुनाव जीतने के उपरान्त उत्तर प्रदेश सरकार का वन मंत्री बनाया गया, राजनीति में माहिर यह व्यक्ति किताबों के भी शौकीन थे और खीरी में इनसे ज्यादा किसी पुस्तकालय में भी पुस्तकेंनही थी कांग्रेस के बडे़ नेता कमलापति त्रिपाठी जैसे लोग इन्हे भेट में पुस्तके दिया करते थे पंडित जी के स्वर्गवास के पश्चात् इनकी बहुमूल्य किताबे अब लखीमपुर के गांधी विद्यालय में मौजूद है इन्होने कई पुस्तके लिखी जो अब गुमनामी में है|
शिव प्रकाश शुक्ल जी एडवोकेट बताते है कि सन १९५२ के प्रथम चुनाव मे पंडित जी के खिलाफ़ १६ स्थानीय कथित राजा चुनाव लड़ रहे थे (क्यो कि वे सिर्फ़ नाम के राजा थे अंग्रेजों ने सब को अपना नौकर बना रखा था ठेकेदार या तालुकेदार या छोटे जमींदार) और सभी राजाओं की जमानत जब्त हो गई। वजह साफ़ थी पंडित जी ने आज़ादी की लड़ाई मे अपनी उम्र के तमाम वर्ष जेल मे गुजारे और वह नेहरू के करीबी थे, अंग्रेजी राज में राजाओं और जमींदारो के जुल्मों से लहुलुहान हो चुका जनमानस अब आज़ाद भारत की प्रणेता कांग्रेस के साथ परिवर्तन चाहती थी ।
१९५७ के द्वतीय चुनाओ में कुछ स्थानीय राजशाही मानसिकता के लोगों ने वंशीधर जी पर चारित्रिक आरोप लगाये और इन संदेशों को पं नेहरू तक पहुचाया नतीजा ये हुआ कि ५७ के चुनाव में मिश्र जी को कांग्रेस ने टिकट नही दिया, इसका परिणाम ये हुआ कि ५७ में खीरी में कांग्रेस का लगभग सफ़ाया हो गया और प्रज़ा सोसियालिस्ट पार्टी की जीत हुई। मात्र शिकायत करने पर इस महान नेता का टिकट काटा गया पर आज नेताओं पर सैकड़ों मुकदमें लदे होने के बावजूद टिकट भी दिया जाता है और वह जीतते भी है।
उस दौर के चुनाव में जनता और नेता जिस चाव और इमानदारी से हिस्सा लेते थे जिसका पता मुझे मेरी मां की बातॊ से लगता है "मेरे नाना पं० रामलोटन मिश्र शास्त्री निवासी मुरई ताजपुर जो उस समय के कांग्रेस के बडे़ लीडरों मे से एक थे सहकारिता की राजिनीति में उनका सानी नही था वो छोटे जिमींदार की हैसियत रखते थे और बहुत ही मह्त्वाकाक्षी उनकी मह्त्वाकाक्षा इससे पता चलती है कि वह रसियन ट्रेक्टर तब रखते थे जब यहां के राजाओं के पास ट्रेक्टर नही थे हरगांव चीनी मिल के कई वर्षो डाइरेक्टर रहे, एक संस्मरण वंशीधर जी के भतीजे शिवप्रकाश शुक्ल जी बताते है कि मेरे नाना और मिश्र जी चुनाव प्रचार के दौरान लईया और चना साथ साथ बैठकर खाया करते थे और यही तब नेताओं का फ़स्ट फ़ूड हुआ करता था।
और कांग्रेस पार्टी के नेता, अम्मा बताती है जब पं० वंशीधर मिश्र घर आते थे तो मेरे नाना जी घर की महिलाओं से बडे़ वर्तनों मे लगातार पानी गर्म करने को कहते ताकि नेता जी और उनके समर्थकों को तुरन्त चाय पिलाई जा सके, अम्मा कहती है कि तब वह सिर्फ़ सात-आठ वर्ष की थी उन्हे याद है मेरे नाना जी माला पहनाकर स्वागत करते मिठाई खिलाते फ़िर चाय!! उन दिनों के चुनाओं मे मेरे नाना जी खेती के सारे पैसे जनता की सेवा में लगाते और पार्टी के प्रचार - प्रसार में उनकी इस आदत से घर मेम हमेशा दिक्कते रहती थी।
खीरी की राजिनीति में पं० वंशीधर मिश्र का नाम आज भी सर्वोपरि है और पूराने लोग उन्हे आज भी याद करते है इस दूषित राजिनीति के दौर में।
संविधान निर्माताओं में से एक मेरे घर से भी- पं० बंशीधर मिश्र
कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन

Monday, October 6, 2008

तराई में बाढ़ की विभीषिका और जानवर

१- डीयर पार्क लखीमपुर खीरी में बचा अन्तिम खरगोश

२- बाढ़ से पूर्व यहाँ तीन खरगोश थे जो इस फोटो में देख सकते है

३-बाढ़ में तीन दिनों से खडा ये चीतल मानो हमसे सहायता माग रहा हो

४-तीन दिन पूर्व बाढ़ से पहले पार्क में मौजूद हिरन (चीतल)
५- ब्लॉगर द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का अवलोकन

६- ब्लॉगर द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का अवलोकन

७- इंदिरा मनोरंजन वन में लेखक
चित्रों में दिख रहे बचे हुए सभी जानवरो को साउथ खीरी डी एफ़ ओ से कह कर बचा लिया गया यह कार्य करने के बाद मुझे बहुत आत्म संतुष्ट प्राप्त हुई 
बाढ़ प्रभावित लोग जो सड़को पर बसेरा बनाए हुए है
अक्टूबर
२००८ के आखिरी हफ़्ते में खीरी जनपद के बाढ़ ग्रस्त इलाकों के साथ साथ इंदिरा मनोरंजन वन का  जायजा लेना शुरु ए किया नज़ारे अदभुत और करुण थे प्रकृति के सौन्दर्य और विकराल रूप के दर्शन एक साथ हो रहे थे एक तरफ़ जलमग्न बगीचें तालाब, नदी-नाले,फ़सले और जंगल तो दूसरी तरफ़ डूबे हुए गांव और सड़कों पर आशियाना बनाये लोग, पानी मे बहते जानवर, मृते
जीवों की उतराती लाशे, जल की विभीशिका भोग चुके लोगों के मुरझाये चेहरे, पटवारी से बाढ़ राहत के लिये नाम लिखवाती भीड़ और नेताओं की बड़ी गाड़िया, राहत सामग्री बाटने के नाम पर फ़ोटो खिचवाते लोग और इन अधमरे लोगो का शोषण करते कुछ मौका परस्त लोग, बंधा बनाने के नाम पर ठेकेदारों की भीड़.........................!!!


बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सच्चाई ये है कि कोई भी वहां नही पहुचता जहां लोग इस आपदा को झेल रहे होते है सैकड़ों किलो मीटर तक फ़ैली बाढ़ और उसमे डूब चुके पूरे गांव के गांव जहां कोइ नही पहुंचता न नेता और न ही सरकारी अफ़सर और हां वहां आसानी से पहुन्चा भी नही जा सकता छप्परों और छतों पर फ़ंसे लोग खाली हो चुके गावों के बचे हुए कुत्ते जो छप्परों य छतों पर सहारा लिए भूख से चिल्ला रहे थे जंगलों मे डूबते उतराते हिरन जंगली सुअर और न जाने ्कितने जीव खैर यहां पर मै सिर्फ़ इन जानवरों की बात करना चाहूंगा क्यो कि इनका जिक्र मीडिया भी कम करती आई है!!

krishna Kumar Mishra