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Wednesday, December 9, 2009

राहुल गांधी और दुधवा नेशनल पार्क, क्या रिस्ता है इनमें!


92 वर्ष की बूढ़ी आखें जिन्हे कही न कही अपेक्षा थी कि राहुल गांधी उनकी आखों से देखेंगे हाल दुधवा का और सुनेंगे उन समस्याओं को जिनसे दुधवा के जीव संघर्ष कर रहे है अपने अस्तित्व को बरकरार रखने के लिए।

ये कोई साधारण व्यक्ति की आंखे नही है, इन नज़रों में ६० वर्षों का वन्य-जीवन पर गज़ब का अनुभव हैं, इन्होंने ही आज़ादी के बाद एक दसक तक हुए अन्धाधुन्ध कटान से चिन्तित हो कर, टाइगर, लेपर्ड, हिरन, और अन्य प्रजातियों के आवासों को सुरक्षित करने की मुहिम चलाई, नतीजतन आज इन वनों का विशाल हिस्सा दुधवा टाइगर रिजर्व के रूप में मौजूद है। उनकी इन मुहिमों में श्रीमती इन्दिरा गांधी का अतुलनीय सहयोग रहा, जो उस वक्त भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री थी।
दुनिया इन्हे बिली अर्जन सिंह के नाम से पहचानती है। इन्हे पदम श्री, पदम भूषण, पाल गेटी (पर्यावरण के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार की तरह हैसियत रखता है), और तमाम प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है।

इनकी तमाम किताबें पूरी दुनिया को हमारे खीरी जनपद व दुधवा के जंगलों की रोचक कहानी सुनाती है और इन्ही किताबों ने  दुनिया की नज़र में, पूरे भारत वर्ष में इस क्षेत्र को एक विशिष्ठ जगह का दर्ज़ा हासिल करवाया है ।

राहुल गांधी की यह यात्रा सियासी जरूर थी किन्तु वह जिस तरह की हैसियत इस मुल्क में रखते है, उससे लाज़मी है कि उनसे यह आशा की जाए कि वह अपनी दादी और पिता की तरह वनों और उसके बाशिन्दों के प्रति अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करे।

बिली ने  इस बार राहुल को पत्र लिखवाया था कि वह दुधवा के बाघों और उनके आवासों यानी जंगलों की समस्याओं के लिए कोई कदम उठाए, लेकिन राहुल गांधी की पलिया में मौजूदगी के बावजूद उन्होंने न तो दुधवा की बात की और न ही उनमें बसने वाले जानवरों की। जो कि अपेक्षित थी!

क्या खीरी के पलिया कस्बे में आकर वहां से चन्द कदमों पर स्थित दुधवा नेशनल पार्क के हालातों का जायजा लेना आप की जिम्मेदारी नही?
क्या जनाब को दुधवा के बाघों का हाल नही जानना चाहिए था, क्या बिली अर्जन सिंह जैसे महान लेखक, वन्य-जीव संरक्षक से विचार-विमर्श नही करना था?
सात दिसम्बर २००९ वक्त तकरीबन शाम के ४ बजे,  पलिया हवाई अड्डे पर  सांसद राहुल गांधी का चार्टर प्लेन उतरा, आप ने पलिया में सभायें की जिसमें युवाओ और किसानों को संबोधित किया, कांग्रेस में युवाओं की भागेदारी अधिक से अधिक सुनश्चित की जाय, बस सारी कवायदें इसी बात की थी।

अब सवाल ये है कि राहुल गांधी खीरी जनपद के जिस भूभाग पर ये सभायें कर रहे थे उसी धरती पर भारत की जैवसंपदा का खज़ाना यानी दुधवा टाइगर रिज़र्व मौजूद है, जिसमें करोड़ों जीव अपनी ईह-लीला जारी रखे हुए है, उनमें भी जीवन है, वो भी अपना और अपनी संतति का भरण-पोषण करते हैं, वो भी इस धरती के लिए उतना ही महत्वपूर्ण हैं जितना कि मनुष्य, बल्कि उससे भी अधिक, किन्तु मानव और उनमे बस फ़र्क इतना है कि वो  सब भारत निर्वाचन विभाग में सूचीबद्ध नही हैं, लिहाज़ा वो मताधिकार का प्रयोग नही कर सकते, और यही कारण रहा कि राहुल गांधी ने धरती के उन महत्वपूर्ण जीवों के बावत कोई बात नही की और न ही उनका हाल जानने और देखने की जहमत उठाई।

यहां ये गौरतलब हैं कि आप की दादी श्रीमती इन्दिरा गांधी ने खीरी के इन जंगलों को संरक्षित क्षेत्र का खिताब दिलाया और फ़रवरी १९७७ ईस्वी में दुधवा नेशनल पार्क का उदभव हुआ। बाद में सन १९८८ई० में खीरी के अन्य वन-श्रखंलाओं को जोड़कर इसे और विस्तृत दुधवा टाइगर रिजर्व में तब्दील किया गया।

कपूरथला रियासत के राजकुमार पदमभूषण (मेज़र) श्री बिली अर्जन सिंह जो भारत के एकमात्र वन्य-जीव संरक्षक है जिनके बारे में ये कहा जा सकता है कि पूरे देश में टाइगर संरक्षण के क्षेत्र में कोई व्यक्ति उनके समकक्ष नही है। इन्ही के प्रयासो से श्रीमती गांधी  इन जंगलों और उनमें रहने वाले जीवों से परिचित हुई, और बिली को प्रोत्साहन और मदद देती रही उनके तमाम वन्य-जीव सरंक्षण सम्बन्धी प्रयोगों में।



बिली अर्जन सिंह इंडियन बोर्ड फ़ार वाइल्ड लाइफ़ के मेंबर भी रहे और दुधवा के जंगलों के मुद्दे जोरदार ढ़ग से उठाए, यहां तक एक मीटिंग के दौरान उन्होने मैडम प्राइमिनस्टर से ये तक कह डाला कि वाइल्ड लाइफ़ प्रोटेक्सन आप के लिए सिर्फ़ स्कीम हो सकती है..............................।

सन १९७० में आई०यू०सी०एन० और डब्ल्यू०डब्ल्यू०एफ़० की सयुंक्त मीटिंग हुई जिसमें एक मिलियन डालर भारत को टाइगर संरक्षण के लिए प्रदान किए जाने की बात हुई, तभी श्रीमती गांधी ने एक टास्क फ़ोर्स का गठन कर भारत के नौ वन क्षेत्रों की पहचान व अध्ययन करने के निर्देश दिए ये टास्क फ़ोर्स का प्रमुख महाराजा काश्मीर के पुत्र डा० करन सिंह को बनाया गया जो तब भारत के पर्यटक मन्त्री व वाइल्ड लाइफ़ बोर्ड के चेयरमैन थे।
श्रीमती इन्दिरा गांधी ने अर्जन सिंह को दो तेंदुए  जूलिएट और हैरिएट प्रदत्त करवाए और इस आशा के साथ कि बिली के प्रयोगों से अनाथ हो चुके शावक या चिड़िया घरों के शावक दोबारा अपने प्राकृतिक माहौल में रहने के काबिल हो सकेंगें।  और ऐसा हुआ भी बिली ने इससे पूर्व श्रीमती एन राइट (ट्रस्टी डब्ल्यू० डब्ल्यू०एफ़०) द्वारा दिए गये तेंदुआ शावक प्रिन्स को पाला और वह जंगली माहौल में रहने के काबिल हो गया था।

इन प्रयोगों की सफ़लता के बाद श्रीमती गांधी से बाघ शावक को ट्रेंड कर जंगल में रहने के काबिल बनाने के प्रोजेक्ट शुरू करने की इच्छा जाहिर की, जिसे उन्होने माना और बिली लन्दन से एक बाघिन शावक लेकर अपने टाइगर हावेन (बिली का प्राइवेट फ़ारेस्ट) ले आये। इस बाघिन के साथ इनका प्रयोग भी सफ़ल रहा और दुधवा में इस बाघिन की पीढ़ियां मौजूद हैं।

सन १९७२ ई० में जब टाइगर हावेन, खीरी में मैडम प्राइमिनिस्टर के आने की संभावना हूई तो बिली ने अपने टाइगर हावेन के निवास को संसोधित किया, जैसे इंग्लैड में पुराने घरों में एक अलग अट्टालिका बनाई जाती थी जब वहां की महारानी किसी नागरिक के घर स्वंम आकर उसे सम्मानित करती थी।

सन १९८५ ई० में भी राजीव गांधी के आने की प्रबल संभावना थी क्योंकि बिली के प्रयासों से इस बार इंडियन बोर्ड फ़ार वाइल्ड लाइफ़ की बैठक दुधवा में आयोजित होने वाली थी किन्तु सिख-आंतकवाद के चलते वह बैठक रद्द कर दी गई, इस तरह हमारा दुधवा दो-दो बार प्रधानमंत्रियों की उपस्थित से वंचित रह गया।

दुधवा के पूर्व निदेशक व टाइगर हावेन के अधिकारी जी०सी० मिश्र ने बताया कि उन्होंने बिली के हवाले से राहुल गांधी को दुधवा की कथा-व्यथा के संदर्भ में पत्र लिखा पर उसका कोई जबाव नही आया, इसके बाद उन्होने श्रीमती सोनिया गांधी को राहुल को भेजे पत्र का जिक्र करते हुए लिखा, इस बार जबाव आया और उसमे लिखा यह था कि इस संदर्भ में वो राहुल गांधी से बात करेगीं और उनके द्वारा आप को अवश्य जबाव दिया जाएगा किन्तु फ़िर कोई खत नही आया, राहुल गांधी की तरफ़ से।
खीरी जनपद में इस बार आई बाढ़ ने सिर्फ़ मनुष्यों को बेहाल नही किया जानवर भी पीड़ित है इस प्राकृतिक विभीषिका से।

इसे विडम्बना ही कहेंगे कि जिस पंरपरा के लोगों ने खीरी के जंगलों को अस्तित्व प्रदान किया, १९७२ ई० में वाइल्ड लाइफ़ एक्ट बनवाया, पर्यावरण मंत्रालय की शुरूवात की, उसी परंपरा के लोग इन वनों को और उनमें रहने वाले जीवों को नज़रदाज कर रहे हैं।

जो लोग इस देश को चलाने का दम भरते है क्या उनकी जिम्मेदारी उस देश के भूभाग पर रहने वाले मनुष्यों के प्रति ही है! उन लाखों-करोड़ों प्रज़ातियों के प्रति नही जिनके बिना मनुष्य का अस्तित्व इस धरती पर सम्भव ही नही।

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारत

Wednesday, November 11, 2009

क्या भारत एक राष्ट्र है ?


शब्द के मायने और उसके गुण-दोष परिस्थित और काल के अनुसार बदलते रहते है अब सोचना आप को है कि इस शब्द का इस्तेमाल कैसे और कहां करना है ?
उपमहाद्वीप,. हिन्दुस्तान,......... भारत, राष्ट्र,. गणराज्य, देश
देशद्रोहियों की सजाये सुनिश्चित की जाय


अभी हाल में चाइना ने इसी तरह कुछ कहा था कि भारत कोई राष्ट्र जैसी चीज नही, या वह यह कहना चाहता है कि भारत एक तरफ़ हिमालय से घिरा और तीन तरफ़ से समुन्दर से घिरा सिर्फ़ एक भूभाग है , जहां भाषाई तौर पर अलग-अलग टुकड़ें राज्य कहलाते है और इन जगहों पर तमाम संस्कृति, धर्म के लोग रहते है जो रोज आपस मे लड़ते है सिर्फ़ इस लिये कि उनकी ज़बान इलाहिदा है, धर्म जुदा-ज़ुदा है। उनके म़सायल अलग-अलग है !

 इस जमीन के टुकड़ों को सियासिती तौर पर  अग्रेज हुक्मरानों ने एक कर इण्डिया बना या ! और बापू  ने इस मुल्क को भावनात्यामक तौर से जोड़कर भारत बनाया । सियासत ने हमें भौगोलिक सीमाओं के भीतर समेट कर एक कर दिया किन्तु क्या हम "अनेकता में एकता" वाले सूत्र में गुथ पाये ?

महाराष्ट्र में जो हुआ, भाषा के नाम पर, वह क्या बेहूदा संदेश देना चाह्ता है,  दुनिया को । या दक्षिणपंथी, वामपंथी या फ़िर नक्सलवादी किस बात की लड़ाई लड़ रहे है इस राष्ट्र से, कभी मन्दिर के नाम तो कभी संस्कृति के नाम, सर्वहारा के नाम पर, जायज मुद्दों पर सरकार से लड़ाई तो समझ आती है पर राष्ट्र से लड़ाई लड़ना ,,,,,,,,,,,,,देश की अखण्डता, गौरव, सुरक्षा और संस्कृति को क्षति पहुचाना किस तरह की क्रान्ति का परिचायक है! 

आज राजनीति और राजनेता जिस तरह की गैरजिम्मेदाराना हरकते कर रहे हैं उनके लिये एक और प्रियदर्शिनी इन्दिरा की जरूरत, ताकि इन्हे इनकी राष्ट्रदोही गतिविधियों का सबक मिल सके, मै इमरजेन्सी या तानाशाही का समर्थक नही हूं लेकिन जब बात राष्ट्र की अखण्डता और उसकी संस्कृति पर कुठराघात की आये तो सज़ा सुनिश्चित होनी चाहिये!, और शासक को निरूकुंश  होना चाहिये !


हमारे मुल्क तमाम सिरफ़िरे लोग आयातित विचारधारा का चोला पहने घूम रहे है जो गरीबी, भुखमरी, और समानता की सवेंदनशील बाते करते है मशाले लेकर क्रान्ति की बात करते है पर क्या उन्होने अपने दामन को कायदे से निहारा है कि इन तमाम वर्षों में उनकी क्या उपलब्धता रही सिवाय इसके "कि भारत के खुशग़वार मौसम में भी छाता लगा लेने के यदि बीजिंग या मास्को में पानी बरस रहा हो तो ।"

और कुछ ऐसा ही है उन कथित राष्ट्रभक्तो के लिये जो दम भरते है विशुद्ध भारतीयता और इसके दर्शन का कभी-कभी तो वही अपने आप को भारतीय मानते है और सब कूड़ा-करकट, झाड़ू लगाने की बेहूदी बात भी कर देते है सियासी मैदानों में! अब इनकी भी देशभक्ति सुन लीजिये, जब आजादी की लड़ाई  में भारत हर खास ओ आम आदमी उस नेक-माहौल में अपना - अपना योगदान दे रहा था तब ये सब अग्रेजों की मुखबरी और बापू की हत्या करने के प्रयास में तल्लीन थे ! मुल्क आज़ाद हुआ तो ये सब जमीदारों-राजाओं के एजेन्ट बन कर उनकी रियासतॊं को बचाने में लग गये, उसमे विफ़ल हुए तो जनता पर क्रूरता और जोर-जबरदस्ती से शाशन करने वाले इन अग्रेजी एजेन्टों का पेन्शन-भत्ता ही बच जाय इसकी पुरजोर कोशिश .............किन्तु विफ़लता ही लगी इन कथित ...................को.............


विचारधारा को हथकण्डा बनाकर राजनीति करने वालों ने तो इस देश की जमीन पर अपने-अपने टुकड़ों का नक्शा भी ख़ीच लिया और सशस्त्र लड़ाईयां भी जारी है। पर सियासत दा जो सरकार में है वो भी किसी तरह पांच साल गुजारना चाहते है बिना किसी विवाद के और इस ख्वाइस के साथ कि आने वाले पांच साल भी हमारे हो जाय ।




इस मुल्क में तो राष्ट्रभक्तों पर गीत लिखने वाले व्यक्ति भी सुरक्षित नही रहे  एक पूर्व राजा ने  जिसकी  पीढ़ियां सियासत में आज भी राजा का दर्जा हासिल किये है, ने कविता की उन लाइन्स को खारिज़ करने की बात कही जिनमे उनके पुरखो के देशद्रोही होने का जिक्र था कवियत्री नही मानी तो उनका रोड-एक्सिडेन्ट करा दिया जाता है??????

तमाम सियासत दां के सफ़ेद चेहरों के पीछे छिपी है काली रात की भयानक करतूते किन्तु वों धरती के देवता का ओहदा प्राप्त किये लाल-बत्तियों वाले रथों में विराजमान  होकर देश की छाती पर मूंग दल रहे है बिना किसी डर या शर्म के ।

भारत सरकार को ऐसे "anarchists" ????????को राज्य-सत्ता की अस्मिता पर हमला बोलने के जुर्म में सजा-ए-मौत देना सुनिश्चित करे -----------इससे कम बिल्कुल नही ! यह राज्य का अधिकार भी है और दायित्व भी !


यदि सरकार अपने दायित्वों का निर्वहन सही ढ़ग से नही करती तो उसके खिलाफ़ आवाज उठाना यकीनन उचित है इसे आप "Anarchist Revolt" नाम दे सकते है महात्मा गांधी को भी ब्रिटिश सरकार कभी-कभी इसी शब्द से नवाजती थी ।




कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारतवर्ष