Showing posts with label botany. Show all posts
Showing posts with label botany. Show all posts

Wednesday, April 2, 2014

तितली वाला फूल.....



ऊँट-कटैया जो मलेरिया को कर सकती है ख़त्म

ये है मैक्सिकन पॉपी, इसका वैज्ञानिक नाम है आर्जीमोन मेक्सिकाना, पेपवेरेसी कुल का यह पौधा भारत में कब आया यह तो सुनश्चित नहीं है, किन्तु आर्यवेद में इसके औषधीय महत्वों का वर्णन संकलित होने से यह बात तो पुख्ता हो जाती है, कि यह प्रजाति भारत में पुरानी है, आयुर्वेद में इसे स्वर्ण-क्षीरी कहते है, वजह यह कि इसके डंठलों व् पत्तियों को तोड़ने से इसमें पीले रंग का गाढ़ा द्रव निकलता है, और इस द्रव में वो जहरीले रसायन मौजूद है, जो तमाम रोगों के मूल-विनाश की खासियत रखते है, आर्जीमोन मेक्सिकाना का एक प्रचलित नाम और है सत्यानाशी, शायद इस पौधे की नुकीली कांटेदार पत्तियाँ, और इसके जहरीले द्रव के कारण ये नाम पड़ा हो, इसी जहरीले होने की वजह से यह पौधा जानवरों से सुरक्षित रहता है, और यह किसी भी प्रकार की पारिस्थितिकी में अपनी जड़े जमा लेने की कूबत रखता है, खासकर सूखी व् रेतीली जमीनों पर यह प्रजाति अपने सुन्दर पीले फूलों को खिला लेती है, प्रत्येक दशा में,  मुर्दा जमीन में सूखे की स्तिथि में  रेगिस्तानी जमीन  में भी इस प्रजाति का उग आना ही इसके ऊँट-कटैया नाम का कारण बना.  

आयुर्वेद में एक ही पौधे के तमाम हिस्सों का इस्तेमाल तमाम बीमारियों में औषधि के तौर पर किया जाता है, ऊँट-कटैया की पत्तियाँ, पुष्प और जड़ का भी अलग अलग इस्तेमाल है. यहाँ एक बात बता देना जरूरी है, कि आर्जीमोन मेक्सिकाना के फलों से प्राप्त होने वाले दानेदार बीज सरसों के बीजों से मिलते जुलते है, जिस कारण इन बीजों का इस्तेमाल मिलावट खोरो द्वारा सरसो के बीजों के साथ कर दिया जाता है, यही वजह नहीं की भारत में बीसवीं सदी के नवे दशक में लोगों में ड्राप्सी की बीमारी ने महामारी का रूप धारण कर लिया था, इन जहरीले बीजों से निकाला हुआ तेल मनुष्य के शरीर में जहरीले प्रभाव छोड़ता है जिसमे सारे शरीर पर सूजन पैदा हो जाती है विशेषकर पैरों में.…। 

मैक्सिको के निवासी पारम्परिक तौर पर ऊँट-कटैया का इस्तेमाल किडनी से सम्बंधित बीमारियों में, प्लेसेंटा को बाहर निकालने में, और जन्म के पश्चात बच्चे की साफ़ सफाई में करते आये है, इस पौधे का  इस्तेमाल मनुष्य और जानवरों दोनों पर होता है. स्पेन के लोगो द्वारा भी आर्जीमोन मेक्सिकाना का  बड़ा रोचक इस्तेमाल किया गया, उन लोगों ने इस पौधे को सुखाकर उसका चूर्ण बनाकर नशे के लिए इस्तेमाल किया। महिलाओं के जननांगों से सम्बंधित समस्यायों में इस ऊँट-कटैया की जड़ अतयधिक लाभदायक होती है.

माली में ऊँट-कटैया मलेरिया रोधी के तौर पर प्रयोग में लाई जाती है पारम्परिक तौर पर. प्लाज्मोडियम फैल्सीपैरम प्रोटोजोआ जो की मलेरिआ का कारक है, और क्लोरोक्विन जैसी दवावों से प्रतिरोध हो गया है ऐसी स्तिथि में आर्जीमोन मेक्सिकाना के रस  में पाये जाने वाले रसायन में प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरस को नष्ट कर देने की क्षमता देखी गयी, यह प्रयोग स्विस ट्रापिकल इंस्टीट्यूट द्वारा किए गए.

 वैसे इस पौधे की एक बड़ी खासियत यह है कि इसके चूर्ण व् धुए से दीमक और अन्य कीट समाप्त हो जाते है, इसलिए यह  बेहतरीन बायो-पेस्टीसाइड के रूप में भी प्रयोग में लाया जा सकता है.

मुर्दा जमीनों में भी आर्जीमोन मेक्सिकाना के पौधों को सड़ाकर डालने से यह उर्वरक का कार्य करता है, और मृदा की क्षारीयता को नष्ट कर देता है. इस प्रकार भूमि सुधार में भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है.

यहाँ एक गौरतलब बात यह है, कि तमाम देशी-विदेशी पंजीकृत अथवा अपंजीकृत कम्पनियां बेवसाइट बनाकर इन औषधीय वनस्पतियों से बने चूर्ण, अवलेह या पूरे सूखे हुए पौधों को बेंच रही है, और बीमारियों के शर्तिया इलाज की घोषणा करते हुए ये आयुर्वेद की वैज्ञानिक पद्धितियों को धता बताते हुए लोगों को गुमराह कर रही है, सरकार को अवश्य इस सन्दर्भ में कानूनी प्रक्रियाएं अपनानी चाहिए ताकि देश की अमूल्य वनस्पतियों का दोहन रुक सके और आयुर्वेद की गुणवत्ता बरकरार रह सके.

प्रकृति सदैव सुन्दर होती है, धरती की यही खासियत है अगर उसमे कोइ घातक जीव उत्पन्न होता है तो निश्चित जान लीजिए की उसका एंटीडोट प्रकृति ने पहले से तैयार कर रखा है, बशर्ते आप की नज़ारे उसे खोज पाए, प्लाज्मोडियम फैल्सिपेरस जैसा प्रोटोजोआ अगर प्रकृति में उत्पन्न हुआ तो आर्जीमोन मेक्सिकाना भी।

भारत में यह प्रजाति खूब मौजूद है और इसका पारम्परिक इस्तेमाल भी, साथ इसके षष्ठ-पत्रों वाले पीत  वर्ण के पुष्प बृहस्पति भगवान् अर्थात गुरू भगवान् की आराधना में भी प्रयुक्त किये जाते है जनमानस में.

 चरक ने उद्धत किया है कि स्वर्ण क्षीरी या कनक क्षीरी को नारायण चूर्ण और क्षार गुटिका के साथ लेने से उदर के तमाम रोग दूर हो जाते है, साथ ही इसके पुष्प पत्रों को ल्यूकोडर्मा जैसे रोग में लाभदायक बताया है. परंपराओं में  स्वर्ण क्षीरी की जड़ बाल धुलने में प्रयुक्त होती रही है इसमें मौजूद रसायन बालों के परजीवियों को नष्ट कर देने की क्षमता रखते है,

सुश्रुत ने कनक क्षीरी को उदर में सूजन, आहार नाल के पक्षाघात में लाभप्रद बताया, साथ ही इसे त्वचा रोगों को दूर कर देने की अद्भुत क्षमता का गुणगान किया है.

यहाँ एक बात महत्त्व पूर्ण है कि प्राचीन आयुर्वेद में स्वर्ण क्षीरी या कनक क्षीरी आर्जीमोन मेक्सिकाना नहीं है, मूल वनस्पति के स्थान पर कालान्तर में वास्तविक कनक क्षीरी की अनुलपब्धता के कारण आयुर्वेदाचार्यों ने आर्जीमोन मेक्सिकाना का प्रयोग वास्तविक कनक क्षीरी के स्थान पर करना शुरू कर दिया था, क्योंकि वास्तविक कनक क्षीरी के सभी गुण इस वनस्पति से मिलते जुलते थे.

आर्जीमोन मेक्सिकाना यानि ऊँट कटैया या कनक क्षीरी का विकल्प है, इसमें आईसक्युनोलिन अल्केलायडस मौजूद होता है जो ओपियम पॉपी (अफीम) में भी पाया जाता है,  इसका ताजा लैटेक्स यानी निकलने वाला गाढ़ा पीला द्रव प्रोटीन को पिघलाने की क्षमता होती है इस कारण ऊँट कटैया के द्रव को मस्से, गाँठ व् होंठों पर धब्बे आदि को गलाने में प्रयुक्त करते है, ये पूरा पौधा दर्द निवारण की क्षमता रखता है. इसके बीज अस्थमा में और पुष्प कफ जैसी व्याधियों में गुणकारी है, परन्तु ऊँट कटैया का प्रयोग बिना डाक्टर की अनुमति के न करे उसका परामर्श आवश्यक है, क्योंकि की ऊँट कटैया का विषाक्त लक्षण के कारण सही से उपयोग न करने पर नुक्सान भी पहुंचा सकता है.

लखीमपुर खीरी उत्तर भारत का तराई जनपद जहां ये ऊँट कटैया के पुष्पों की पीतवर्ण आभा मेरे घर के आस पास मौजूद है, मार्च में यहाँ इस प्रजाति में पुष्पं आरम्भ हो जाता है. यह एक वर्षीय पौधा है, जो बीजों के परिपक्व होने के साथ ही सूख जाता है, फलों के फटने से बीजों का प्रकीर्णन आरम्भ होता है, हवा पानी और जीवों के द्वारा, धरती पर दोबारा अपना जीवन चक्र शुरू करने के लिए. इसके पुष्प की चटक पीली पंखुड़िया तितली के झीने पंखों की तरह होती है, इस लिए इन चमकीले व् पतले पुष्प पर्णों को देखकर बच्चो के मुख से बरबस निकल जाता है "तितली वाला फूल"....

ऊँट -कटैया यानि आर्जीमोन मेक्सिकाना को मैक्सिको की धरती का पौधा माना जाता है, और दुनिया में कही और इसके पाये जाने पर इसे विदेशी मूल का होने का दर्जा दे दिया जाता है, क्या पता हमसे पहले जिन लोगों ने वनस्पतियों का अध्ययन किया हो तो उन्हों ने जिस प्रजाति को अपने आस पास देखा हो उसे अपने मूल का बता दिया, किन्तु यह जरूरी तो नहीं कि वह उसी धरती का पौधा हो, प्रकृति के अध्ययन में देशवाद को शामिल नहीं करना चाहिए नहीं तो सुन्दर व् गुणवान वनस्पति भी सुन्दर नहीं दिखेगी और हैम उनके गुणो से वांछित रह जायेगे। ।

धरती पर जैव-विकास की प्रक्रियाओ के वक्त भूभागों के विघटन और जुड़ाव दोनों हुए कौन सी प्रजाति अचानक अलाहिदा हो गयी अपने समुदायों से और कब इसका अध्ययन हुआ होगा और हो भी रहा है, मनुष्य के द्वारा तमाम प्रजातियां एक भूभाग से दुसरे भूभाग ले जाईं गयी और उन वांछित प्रजातियों के साथ तमाम अवांछित प्रजातियां भी आ गयी। ।कह्ते है वनस्पतियों के साथ क्वारंटाइन जैसी स्थिति नहीं होती, वे अपनी जमीन तलाश लेती है, और वो भी भूमंडलीकृत होकर। देशों की सीमाए उन्हें नहीं बाँध पाती। शायद इसलिए देशी विदेशी प्रजाति के मसले को मुद्दा न बनाकर वनस्पतियों के गुणों से रूबरू हो, जिस वनस्पति को आपकी जमीन ने अपना लिया उसके साथ आखिर विदेशी मूल का मुद्दा क्यों?

हमारी पीढ़ी के ग्रामीण बच्चों को जरूर याद होगा स्वर्ण क्षीरी यानि ऊँट कटैया के पीले पुष्पों की पंखुड़ियों से सीटी बजाना। …एक ग्रामीण खेल प्रकृति के खिलौनों के साथ ! जो अब नदारद है!


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com


Wednesday, May 19, 2010

दुधवा टाइगर रिजर्व में एक अनजानी वनस्पति!

 दुधवा टाइगर रिजर्व में एक अनजानी वनस्पति! - Calatropis acia-  कृष्ण कुमार मिश्र*
कुछ सुन्दर व दुर्लभ वनस्पतियां हमारे आस-पास मौजूद होने के बावजूद न चिन्हित होने के कारण काल के गर्त में समाती चली जा रही हैं, और हम उनके महत्व व लाभ से वछिंत रह जाते हैं। प्रकृति के इन रहस्यों में ही तो जीवन का सार है, यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे कितना जान ले- इसी खोज की एक झलक मैं आप सब के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं, जो मुझे आनन्दित कर गई!----------------
12 जून 2006 रिंगरोड झादीताल किशनपुर वन्य जीव विहार, इस प्राकृतिक जंगल में वन्य जीवो व वनस्पतियों के मध्य मै प्रकृति दर्शन करता हुआ रिंग रोड पर चला जा रहा था। घास के मैदान से होकर गुजरती इस रोड के दोनो तरफ कांस व अन्य जंगली घासों के घने झुरमुट थे, कि अचानक मेरी नजर इस हरी-भरी घास के झुरमुट से झाँकते रक्त-वर्ण का पुष्प गुच्छ दिखाई दिया, जैसे हरे रंग के घूघट में गुलाबी आभा लिए कोईं.......................................! कुछ ही पलों में मेरे कैमरे का लेन्स उस लाल रंग के पुष्प की तरफ था, बस मै इस अनजानी वनस्पति को हमेंशा के लिए अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहता था। वैसे यह पौधा मदार के पौधे की तरह ही था, बस फर्क था, तो उस लाल पुष्प की आकृति व रंग का क्योकि इससे पहले मदार का ऐसा पुष्प पहले मैने कही नही देखा था। अपनी जंगल यात्रा से वापस आने के बाद मैने इस प्रजाति की पहचान के मुमकिन प्रयास शुरू कर दिये लेकिन नतीजा कुछ भी नही निकला। इसकी वजह थी कि दुधवा टाइगर रिजर्व में अभी तक यह प्रजाति कही दर्ज ही नही थी। बावजूद इसके की यहा कई नामी वनस्पति शस्त्रियों ने यहाँ की वनस्पति का क्रमबद्ध अध्ययन किया था। तमाम पुस्तकों व स्थानीय वैज्ञानिकों से जब कुछ भी अवगत नही हो पाया। तो विश्व प्रकृति निधि व मौजूदा समय में आई आर एस के वनस्पति विज्ञानी डा कृष्ण कुमार ने बताया कि यह प्रजाति एक नई प्रजाति हो सकती है, जो कैलाट्रापिस प्रोसेरा की नजदीकी प्रजाति होगी। इसकी बिना रोम वाली पत्तियां व सुर्ख लाल रंग का पुष्प इसे इन प्रजातियों से भिन्न करता है ।
आखिर में इस पुष्प की तस्वीरे अमेरिका स्थित विश्व प्रसिद्ध स्मिथसोनियन संस्थान के वनस्पति विज्ञान के प्रमुख डा गैरी कृपनिक को भेजी, डा गैरी ने इसे दुनिया के तमाम वैज्ञानिको को यह फोटो भेजा, जो भारत या इस प्रजाति पर शोध कर रहे है। इनके विभाग के वरिष्ठ वनस्पति शस्त्री डैन निकोलस ने बताया, कि मानव आबादी में ज्यादातर  बैगनी व सफेद रंग के पुष्पों वाली प्रजाति कैलाट्रापिस गिगैंटिया होती है। संभवता यह कैलाट्रापिस प्रोसेरा हो। किन्तु वह अनिर्णय की स्थित में थे। सो उन्होने मुझे भारतीय वैज्ञानिक डा एम शिवादासन से सम्पर्क करने के लिये सलाह दी, तभी डा गैरी के एक मित्र डा डेविड गॉयडर की एक मेल आई उसमें लिखा था, कि यह एक अलग प्रजाति है, जो भारत व अन्य स्थलो पर पाये जाने वाली उन दो प्रजातियों से भिन्न है। इन्होने बताया कि मदार की दो विस्तारित प्रजातिया प्रचुरता में पाई जाती है, जिनमें कैलाट्रापिस प्रोसेरा में कटोरानुमा पुष्प पीला-लाल व किनारों पर बैंगनी रंग का होता है। और कैलाट्रापिस गिगैंटिया के पुष्प की पंखुड़िया पीछे की ओर मुड़ी हुई दो रंगों की होती है सफेद व बैंगनी रेग की। उपरोक्त दोनो तरह की प्रजातियों में पत्तियां डण्ठल रहित होती है। जबकि मेरे द्वारा भेजे गये फोटो में मदार की पत्तियां डण्ठल युक्त है, व पत्तियों के आधार संकुचित है। यह एक तीसरी प्रजाति है, जिसे  कैलाट्रापिस एसिया कहते है। कुल मिलाकर भारत में पहली बार व दुधवा टाइगर रिजर्व में इस प्रजाति का मदार पहली बार देखा गया है। जो अभी तक कही भी रिर्काडेड नही है। प्रकृति के रहस्यो में से एक और रहस्य सामने आया है। अब देखना है कि  इस अदभुत वनस्पति के औषधीय व अन्य गुणों पर कितनें रहस्य खुलते है। यह एक शोध का विषय है, क्योकि हर प्रजाति के अपने विशिष्ठ गुण होते है, जैसे सफेद पुष्पों वाला मदार! मदार जिसे आक, क्राउन फ्लावर, सूर्य पत्र, व अर्बर-ए-सोई आदि नामों से भी जाना जाता है, यह एक ऐसी औषधीय गुणों वाली वनस्पति है। जो भारत के अतिरिक्त श्री लंका, पाक्स्तान, नेपाल, सिंगापुर, मलय द्वीप और दक्षिण चायना में पाया जाता है। भौगोलिक आधार पर यह कहा जा सकता है, कि यह प्रजाति अयनवृत्त व उपअयनवृत्तों (क्रान्तिमण्डल) में प्रचुरता में पायी जाती है। जबकि ठण्डें प्रदेशों में यह दुर्लभ है। यह एस्क्लेपियाडेसिया परिवार का है, इसमें 280 जातियां और 2000 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती है। भारत में मदार कि मुख्यता दो प्रजातियां मिलती है। जिनमें सफेद-बैगनी व कभी-कभी सफेद रंग के पुष्प  वाला 8 फीट तक बढ़ने वाला कैलाट्रापिस गिगेंटिया व सफेद-गुलाबी रंग के खुसबूदार पुष्प वाला पौधा जो 3-6 फीट तक ऊचाई तक बढ़ने वाला कैलाट्रापिस प्रोसेरा भारतीय मदार की प्रजातियां हैं। इसकी नजदीकी उप-प्रजातियां सिल्क वीड (एस्क्लेपियाज सायिरियाका), बटरफ्लाई वीड (एस्क्लेपियाज टयूबरोजा) हैं। मदार 900 मीटर तक ऊचाई  वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगते है यह विभिन्न प्रकार की मिट्टी व वातावरण में उगने की क्षमता रखता है। प्रायः यह ऐसे स्थानों पर उग आता है, जहां किसी और वनस्पति का उगना मुमकिन नही होता। मदार के पौधें रोड के किनारों, तालाबों के आस-पास व नदियों एंव समुन्द्री किनारों पर पड़ी रेत में उग आते है, ये कमजोर मिट्टी में वहां जहां बहुत अधिक चराई होने के बाद अन्य देशी प्रजातियों की वनस्पतियां उगने लगती है, वहां पर मदार अधिकता में पाया जाता है। इनके  फलों के परिपक्व होने के बाद चिटक कर रूईदार बीजो का प्रर्कीरण हवा व जल के माध्यम से  दूर दूर तक होता है अमेरिका, फ्रांसए हवाई, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में मदार (आक) खेती के रूप में या फिर इनवैसिव यानी आक्रमणकारी विदेशी प्रजाति के तौर पर पाया जाता है।

भारत में इस प्रजाति का महत्व इसलिए विशेष है, कि यह भगवान शिव का प्रिय पुष्प माना जाता है। एक पौराणिक कहानी में कहा गया है, कि प्रेम के देवता कामदेव अपने तीर पर मदार के सुन्दर पुष्प को लगाकर ही लोगो के हृदय को बेंधते थे, ताकि वह व्यक्ति काम (वासना) के वशीभूत हो जाए ! वैसे भी भंयकर हवा के झोंकों सह लेने की क्षमता वाले व तितलियों व भौंरों को आकर्षित करने वाले इस वनस्पति के अतुलनीय पांच नोकदार पंखुड़ियों वाले पुष्पों की माला यदि आप के गले में हो तो भला कैसे कोई बिना मुग्ध हुए रह सकता है। किसी राजा-रानी के ताज की शक्ल वाला यह फूल सिर्फ सम्मोहन या आर्कषण का केंद्र नही है, बल्कि भारतीय समाज में इसे तांत्रिक साधना के लिए खास अहमियत मिली हुई है। और वह भी खसतौर से सफेद व लाल पुष्प वाले मदार को।
यदि हम इस विषाक्त गुणों वाले पौधें के औषधीय गुणों को देखे, तो इसके विषाक्त होने के अवगुण को नजरन्दाज कर देगें, क्योकि आयुर्वेद में मदार को आदिकाल से पारंपरिक औषिध के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है। और आज मार्डन साइन्स ने भी इस औषधीय गुणो से भरपूर वनस्पति को मान्यता दी है। मदार का प्रयोग अकेले या अन्य औषिधियों के मिश्रण का उपयोग बुखार,गठिया,अस्थमा,कफ,एक्जीमा,फाइलेरिया,उल्टी,डायरिया आदि बीमारियों में किया जाता है, आयुर्वेद के अनुसार मदार का एक सूखा पौधा एक टानिक के रूप में किया जा सकता है। इसका प्रयोग कफ व पेट के कीड़े निकालने में भी होता है  इसकी जड़ के बने पाउडर से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और डाइरिया का इलाज होता है पत्तियों से पैरालिसिस, ज्वर व सूजन को ठीक करने के लिये किया जाता रहा है मदार का कवकरोधी व कीटरोधी गुण कृषि में विषेष महत्व रखता है यदि इसके तने व पत्ती के रस से शोधित बीजो की बुआई की जाय तो उनमे अकुरण जल्दी व अच्छा होता है साथ ही कोई बीमारी व कीड़े लगने की गुजांइश बिल्कुल नही रहती। इस पौधे से निकाला गया फाइबर चटाई,कारपेट व मछली पकड़ने वाले जाल के तौर पर किया जाता रहा है साथ ही अतीत में इससे बने धागां से धनुष की न टूटने वाली मजबूत कमान भी बनाई जाती थी।


कृष्ण कुमार मिश्र
77, कैनाल रोड शिव कालोनी
लखीमपुर खीरी-262701
भारतवर्ष
फोन- 091-5872-263571
09451925997

Friday, November 13, 2009

यह सुन्दर रचना करने वाला कौन है?


इस रचना का रचनाकार कौन?


एक रात जब मेरी उंगलियां कीबोर्ड पर जिमनास्टिक कर रही थी तभी मुझे इस अंधेरी रात में एक अपरिचित सी तेज़ आवाज सुनाई दी .........कुछ समय सन्नाटा और फ़िर वही आवाज, मैने कमरे से बाहर झांक कर देखा पर कुछ मालूम नही कर सका । किन्तु अब ये आवाज रह-रह कर तेज़ हो रही थी आखिर में मैने तय कर लिया कि अन्वेषण पूरा करना है अगल-बगल के कमरों की तलाशी ली, स्म्पूर्ण घर के अवलोकन के बाद बाथरूम के दरवाजे पर एक छोटा सा सुन्दर प्राणी दिखा जो खालिश हरे रंग का था । उससे मेरा पहले से परिचय था और जब उसे देखा था अपने जीवन में पहली बार तो कौतूहल की स्थित थी एक महीना पहले मदार के पौधे पर वृक्ष कहू तो भी अनुचित नही है ! ये प्राणी ऐसा लग रहा था जैसे किसी दूसरी दुनिया से आया हो, पत्तियों जैसा रंग और पत्तियों जैसे हरे पंख जिनमे शिरायें भी पत्ती की तरह चमक रही थी, प्रकृति का अतुल्य निर्माण, मुझे ऐसा लगा कि इस अदभुत जीव को किसने बनाया होगा और वह कितना अदभुत होगा? यहां मै रूमानी हो गया और ईश्वरवादी भी।

Who creates it ? This is God, This is Mother Nature !

मदार की हरी पत्तियों के मध्य मुझे अचानक इस धरती के एक और रत्न से परिचय हुआ, अपने Analogue SLR camera जिसमें Sigma का 300 mm Zoom lens है से तस्वीरे खींची और सोचा Negative print आ जाने पर इसको आईडेन्टीफ़ाई करूगां नही होगा तो तो अपने अन्य जीवविज्ञानी मित्रों से मदद लूंगा । किन्तु बात आई गयी हो गई।

आज जब इस अदभुत और इसकी पराग्रही सी लगने वाली आवाज ने मुझे और रोमान्टिक कर दिया फ़िर क्या था इस जीव से मेरा प्रेम और बढ़ा और इसी रात मैने इस रहस्य को जान लिया कि आखिर ये कौन है! लेकिन इसके बनाने वाले का पता नही चल सका ? यदि आप सब को कोई जानकारी मिले इस वाबत तो मुझे जरूर सूचित करे ।

एक जीवविज्ञानी होने के नाते इसका वैज्ञानिक परिचय भी दिये देता हूं।

 कैटीडिड (माइक्रोसेन्ट्रम रेटीनेर्व)

इसे अमेरिका में कैटीडिड् के नाम से पुकारते है। और ब्रिटिश शब्दावली में बुश-क्रिकेट के नाम से पहचाना जाता है । यह टैटीगोनीडी परिवार से ताल्लुक रखता है और इस परिवार का दायरा इतना बड़ा है कि इसमें 64000 से ज्यादा प्रजातियां मौजूद है। वैसे इसको इन्सानी दुनिया में एक और नाम से बुलाते है "लान्ग हार्न्ड-ग्रासहापर किन्तु वास्तव में य जीव क्रिकेट से अत्यधिक नजदीक है बजाय ग्रासहापर के।

यह जीव और इसके रिस्तेदार मौका और हालात के मुताबिक अपनी रंग-रूप को ढ़ालने की क्षमता रखते है जैसे हरी पत्तियों के मध्य हरे, सूखे पत्तो के मध्य खाकी रंग के रूप में प्रगट हो जाते है है न जादूगर जैसा, पर बात फ़िर वही अटक गयी इसे बनाने वाला कितना बड़ा जादूगर होगा?

हां एक और बात यह जीव नर था। अब आप सोचेगे ये कैसे! दरअसल इस परिवार के नर ही इस अदभुत आवाज़ को निकालने की क्षमता रखते है । यह ध्वनि स्ट्रीडुलेशन अंगों द्वारा की जाती है और यह अंग नर में ही मौजूद होते है। इस परिवार की कुछ प्रजातियों की मादाओं में भी ये ध्वनि करने वाले अंग होते है।

हां यह परिवार ग्रासहापर से यूम अलग हुआ, कि इसके एन्टीना लम्बे लगभग शरीर की लम्बाई के मुताबिक व पतले होते है जबकि ग्रासहापेर में मोटे और छोटे।

टेरोफ़ाइला जीनस (पत्ती की तरह पंख वाला) में कैटीडिड्स शब्द  इस जीव की ध्वनि उत्पन्न करने की क्षमता की वजह से अमेरिका में प्रचलित हुआ, इसमें स्ट्रीडुलेशन अंग इस जीव की पीठ पर होता है जो आपस में रगड़ने से आवाज उत्पन्न करता है।

उत्तरी अमेरिका में इस परिवार की 250 प्रजातिया है किन्तु एशिया में इसकी अत्यधिक प्रजातियां मौजूद है।

नाना प्रकार के रूप बदलने की क्षमता वाले तमाम जीव है हमारी धरती पर, ऐसा मैने उसके बारे में भी सुना है कुछ ईश भक्तो से जिसने दुनिया बनाई!

 मेरी रूमानियत बढ़ रही है शने: शने: !

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारतवर्ष