Showing posts with label mitauli. Show all posts
Showing posts with label mitauli. Show all posts

Monday, March 9, 2015

महिला अर्थात जिसमें महान शक्तियां निहित हैं..


एक दिन औरत के नाम-

आदम की कहानी में स्त्री पुरुष का यह राजनैतिक, सामाजिक, एवं वैक्तिक भेद के अफसानों से पहले "दिन" की परिभाषा पर बात करना चाहूंगा, सूरज के निकलने और डूबने के मध्य का वक्त, तारीखों से पहले की बात है, जब आदमी को दिन के अतरिक्त समय की कोइ गणित नहीं मालूम थी, जब तारीख नहीं थी तो तवारीखों की बात करना बेमानी होगा, और तब आज के साइबेरिया कहे जाने वाले जैसे किसी इलाके में किसी जगह कोइ औरत हाथ में पत्थरों के औजार लेकर अपने अन्य स्त्री-पुरुष व् पुत्रों और पुत्रियों के साथ अपने कुटुंब की भूख मिटाने के लिए निकलती थी, उन बर्फीले पहाड़ों में, उसे यह नहीं पता होता था की इस शिकार यात्रा के बाद लौटते हुए उसमे से कितने अपने प्रवास स्थल पर वापस लौटेंगे, और उस नेतृत्व करने वाली औरत की पूरी जिन्दगी, जब तक उसकी हड्डियों में इतना बल रहता की वह जंगली जानवरों से लड़ सके, मौसम की मार को सहन कर सके तब तक वह अपने कुटुंब का भरण पोषण करती रहती और उसके बाद उसकी पुत्री इस नेतृत्व को आगे बढाती....पिता जैसी किसी परिभाषा ने अब तक जन्म ही नहीं लिया था...एक मातृ सत्ता के सरंक्षण में जीवन संघर्ष में रचा बसा आदमी...

कहानी आगे बढ़ती है, स्त्री नेतृत्व में शिकार दल जब मांस के अतिरिक्त जंगलों से फल फूल लाता और अपनी गुफाओं के आस पास खाए जा चुके फलों के बीजों को फेक देता तो कुछ समय बाद वहां पौधे उगते दिखाई देते, और उनमे उन्ही फलों की तरह फल, जिन्हें वह जंगलों से खोज कर लाते थे, बस यही वक्त था कृषि के आविष्कार का, और शायद इस आविष्कार की जननी भी कोई नेतृत्व करने वाली स्त्री ही रही होगी,...वक्त गुजरने के साथ ही आदमी की संख्या भी बढ़ने लगी और शिकार के लिए आपसी संघर्ष भी,...इलाके बांटे जाने लगे समुदायों के...आवश्यकताओं ने जब अपना असर जोर किया तो आदमी खेती और पशु-पालन की जुगत में लग गया, फिर क्या था आदमी प्रवासी से निवासी बन गया, साथ ही जमीन और पशुओं पर मालिकाना हक़ भी...स्त्री अभी भी स्वन्त्रत थी किन्तु जमीन और पशुधन पर अधिकार के भावों का प्रादुर्भाव हो चुका था, अभी जो बाकी था वह, धातुओं की खोज और आदम समुदायों में उनकी बढ़ती मांगों ने पूरा कर दिया, अभी तक जो जमीन जंगल जानवर और जरूरी हथियार मानव के पास अपनी जीविका चलाने के लिए ही थे, वह अब संपत्ति के  रूप में तब्दील हो गए...आवश्यकता व्यापार में बदल गयी.....और धन का प्रादुर्भाव हो गया.....बस यही वह छड थे इतिहास में जब आदमी की स्वाभाविक स्वछंदता में भय उत्पन्न हुआ संपत्ति के सरंक्षण और अधिकार के खो जाने का.....जो मानव धरती पर प्रकृति की सत्ता में खुद को आनन्दित पाता था बिना तेरा-मेरा के, वही आदमी अब खुद स्वामी बनने को आकुल हो उठा, यही पहला चरण था स्त्री के संपत्ति बनने का...जमीन, पशुधन को तो आदमी पहले ही अपने अधिकार क्षेत्रों में ले चुका था, बस उसे इस संपत्ति का वारिस चाहिए था! और संपत्ति के  दाखिल खारिज के पश्चात उसका मालिक कौन हो? इस बात के लिए आदमी को अब स्त्री को भी अपने अधिकार क्षेत्र में लाने की कवायदे करनी थी....अंतत: हुआ भी ऐसा, जो स्त्री नेतृत्व करती थी अपने समुदाय के भरण पोषण के लिए, जो स्वछंद थी आदेशित करने के लिए वह अब एक पुरुष के संसर्ग में आने वाली थी जीवन पर्यंत के लिए...अतीत की इस घटना ने एक मौजूदा कहावत को चरितार्थ कर दिया था...जर जोरू और जमीन..!

स्त्री पुरुष के इन स्थाई? संबंधों ने सभ्यता को एक नया रूप दिया, पिता और बंधु-बांधवों के रिश्तों का प्रादुर्भाव हुआ, घर बने, नगर विकसित हुए, व्यवसाय में क्रान्ति आई, और साथ ही संघर्ष बढ़ा आदमी और आदमी के बीच, जो आज भी अनवरत जारी है, इतिहास के कालखंडों में इसी जार जोरू जमीन के लिए बड़ी बड़ी क्रांतियाँ हुई जिन्हें महाभारत जैसे तमाम महा-काव्यों में पढ़ा जा सकता है, ...हालांकि इस मातृ सत्ता से पितृ सत्तात्मक व्यवस्था के बीच के समय में सभ्यता में बहुत से संक्रमण हुए....आदमी जंगलों अर्थात प्रकृति से दूर होता गया भौतिकता के पथ पर चलते चलते उसने कई कीर्तिमान गढ़े...तकनीक और विज्ञान के आज तक के सफ़र में ये वही सदियों पुराना मानव अब भी बिना पीछे मुड़ कर देखे हुए आगे बढ़ता जा रहा है, अब माता-पुत्र के संबंधों के बजाए  पिता-पुत्र के रिश्तों की सामाजिक पहचान होने लगी, समुदायों में, परिवारों में और सरकारों में, पिता के नाम से उसकी अगली पीढी जाने जानी लगी और दर्ज भी होने लगी, सरकारी तौर पर तो माता अप्रासंगिक ही हो गयी, गाँव का पटवारी व् जिले का कलेक्टर या अस्पताल का डाक्टर अपने दस्तावेजों में पुरुष का ही नाम दर्ज करता स्त्री की यदि बात आती तो कोइ भी नाम दर्ज कर दिया जाता, क्योंकि जर और जमीन पर स्त्री का कही कोइ अधिकार नहीं था, बस वह कथित गृह स्वामिनी और समाज में कथित तौर पर जानी पहचानी जाने वाली किसी की पत्नी या माता के रूप में स्थापित होती रही, यहाँ तक की मताधिकार के लिए मत सूचियों और परिवार रजिस्टरों में भी फर्जी नामों से जानी जाती रही ये स्त्रियाँ, यदि इन्हें मताधिकार प्रयोग करने के लिए जाना होता तो पति के नाम से ही इनकी पहचान होती...विडम्बना के क्षण थे ये और वजह थी संपत्ति में मालिकाना हक़ का न होना, पता नहीं इतिहास के उन कैसे क्षणों में स्त्री ने अपनी सत्ता को पुरुषों के हवाले किया और साथ ही अपने उन सारे हुनर भी हवाले कर दी पुरुषों के, स्त्री अब यदि कलाकार होती तो उसके उस हुनर को तमाशा मान लिया जाता, चाहे फिर वह नृत्य कला में पारंगत हो या गायन में या फिर घुड़सवारी में और या हथियारों के चलाने में, स्त्री की इन तमाम खूबियों को राज दरबारों से लेकर धर्म के गलियारों तक तमाशबीनों के मध्य तमाशा बनाया जाता रहा, पर कहानी के दूसरे पहलूँ में यह स्त्री बंधू बांधवों, पुत्र-पुत्रियों, नाते-रिश्तेदारों के मध्य सम्मानित व् गरिमामयी भी रही, इस घरेलू स्त्री के अपने कुछ विशेषाधिकार भी रहे.....कन्या के रूप में भी और देवी के रूप में भी यह तमाम सभ्यताओं में पूज्य रही...मानव प्रजाति के यह दो रूप विघटित कब से होने लगे यह जरूर शोध का विषय है, समाज की किन मनोदशाओं ने यह अलगाववादी मानसिकता को जन्म दिया? कब ये टकराव सामने आये, उस एक ही मानव में ...स्त्री पुरुष के अलाहिदा हक व् हुकूक के ....

कही न कही मताधिकार के प्रयोग से वंचित रखना, युद्ध व् खेल के मैदान में सिर्फ पुरुषों का होना, तथा लेखन आदि कलाओं में पुरुषों को ही महत्त्व मिलना, ये सब का कारण एक ही लगता है की व्यवस्था की पूरी जिम्मेदारी  पुरुष के हाथ में होना, प्रासंगिक भी वही होता है जिसके हाथ में जिम्मेदारिया होती है और जो उन्हें पूरा करता है, जाहिर है की तमाम अच्छे बुरे दोनों हालातों से स्त्रियाँ वंचित रही जिनसे पुरुष को ही दो चार होना था..आज वक्त बदला रहा सामाजिक व्यवस्थाएं भंग हो रही है, और स्त्री पुरुष के मध्य क़ानून की रेखाएं भी खींची जा रही है, एक पूर्णतया सरकारी व्यवस्था का अंग हो रहा है यह स्त्री पुरुष, और अब जब स्त्री पुरुष के बराबर दुनियाबी सभी कामों में शिरकत कर रही है, तो उसे भी दो चार होना पड़ रहा है उन कठिनाइयों से, जिनसे अभी तक पुरुष ही सामना करता आ रहा था, फिर चाहे वह आफिस में किया जाने वाला बुरा बर्ताव या फिर जंग के मैदान में दुश्मन की गोली, अब जो स्त्रियाँ इन कार्य क्षेत्रों में है जहां सिर्फ पुरुष ही थे कभी तो उन्हें भी उन सबसे गुजरना पड़ रहा है, कुलमिलाकर व्यवस्था में स्त्री पुरुष के समावेश से दोनों को को अब वह लाभ और हानि उठाने पड़ रहे है जिन्हें अभी तक पुरुष ही भोगता और झेलता आया है, फिर यह हल्ला क्यों....जब एक सी जिम्मेदारियां होगी तो जाहिर है टकराव होगा, जिम्मेदारियां जब बांटी गयी थी तब ये टकराव नहीं थे फिर चाहे वह माता की सत्ता की व्यवस्था हो या पिता की, हाँ स्वीकार्यता थी यहाँ पर स्त्री और पुरुष दोनों की एक दूसरे की सत्ता की......

आदि मानव से चलकर आदमी का कारवां जब देवत्व की अवधारणा तक पहुंचा, देव-भाषाएँ गढ़ी गयी और उनमे देवी देवताओं की महिमा का गुणगान भी, वहां भी देवी अर्थात स्त्री सर्व-पूज्य रही, इसी देव भाषा अर्थात संस्कृत का एक शब्द है "महिला" जिसका पर्याय होता है "जो तमाम शक्तियों से विभूषित हो" बिनोवा भावे ने अपनी पुस्तक "स्त्री शक्ति" में इस ब्रह्मचारी ने प्रकृति में महिला तत्व की बहुत सुन्दर व्याख्या की...किन्तु यदि आज के अंतर्राष्ट्रीय मंच पर मनाये जा रहे दिवसों की तरफ दृष्टी डाले तो यह सिर्फ दुनिया का सारा जिम्मा अपने ऊपर लेने वाली कुछ संस्थाओं की एक राजनैतिक कवायद है, बहुत से फंड को खर्च कर विभिन्न कार्यक्रमों द्वारा खुद की प्रासंगिकता सिद्ध करना ज्यादा जाहिर होता है इनमे, हालांकि इसी बहाने कुछ लाभ अवश्य मिल जाता है उस विषय वस्तु को जिस पर यह कथित दिन आधारित होते है ! 

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस आठ मार्च मुख्यता योरोप में सन २००९ में महिलाओं द्वारा किये गए आन्दोलन जो कि कपड़ों के व्यवसाय में सलग्न कामगार महिलाओं ने किया था, की स्मृति में मनाया जाता है, यह आन्दोलन भी सोशियालिज्म से प्रभावित था, बाद में सन २०१४ में जर्मनी में मताधिआर के लिए महिलाओं ने आन्दोलन किए और रूस में भी तमाम कामगार महिलाओं ने आवाज बुलंद की, सच्चाई ये थी की ये आन्दोलन दरअसल पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ थे और साम्यवाद के उद्भव की यह शुरूवात थी. बस २६ फरवरी और आठ मार्च के मध्य जो असमंजस है वह जूलियन कैलेण्डर व्  ग्रेगेरियन कैलेण्डर के बीच की गणनाओं की रस्सा-कसी का नतीजा है....अब भारत ने भी पिछले वर्ष से सरोजनी नायडू के जन्म दिवस पर राष्ट्रीय महिला दिवस मनाना शुरू ए किया है ....भारत में ही नहीं दुनिया में तमाम जीव जंतुओं के लिए दिवस घोषित किए है, सयुक्त राष्ट्र में बड़ी बड़ी योजनाए और कार्यक्रम बनते है, किन्तु बाघ दिवस हाथी दिवस आदि दिवसों की जगह पर उनके दिवसों को लिंग के आधार पर दिवस मनाने की परम्परा अभी नहीं शुरू हुई, यहाँ लिंग भेद नहीं है, प्रजाति पर फोकस है!...

फिर मौजूदा वक्त में ये दिवस उल्ल्हास का प्रतीक नहीं रहे, जिस भी जीव पर संकट मँडराता है, उसके नाम से दिवस घोषित कर दिए जाते है, यह दिवस प्रतीक है उस विषय के लिए जिसके लिए दिवस मनाया जा रहा है, तो फिर संस्कृत का यह शब्द क्या झूठा जिसमे स्त्री को महिला शब्द से चिन्हित किया गया, जो शक्तियों से विभूषित है, जिसकी सत्ता घर और समाज दोनों में है, नजरिया बदलने की आवश्यकता है समाज को संस्कार देने की भी, क्योंकि कोई भी क़ानून किसी के अधिकार पूर्णतया नहीं दिला सकता जब तक उसकी सामाजिक मान्यता नहीं और न ही अपराधों को रोक सकता है, स्त्री या पुरुष दोनों की पहचान समाज में उसके कुल जाति  धर्म से होती थी, अब सरकारी दस्तावेजों में सामान्य पिछड़ी और अनुसूचित जाति  में होती है, बस हमने पुराना तानाबाना ख़त्म कर एक नई व्यवस्था लागू कर दी, किन्तु क्या इन सभी अगड़ों या पिछड़ी जातियों में एकता आ गयी ..एक जगह नाम दर्ज कर देने से ...खैर सरकारी अधिकार महिला पुरुष दोनों के बराबर हो यह जरूरी है किन्तु इनके बीच सरकारी लकीर न खींची जाए और न ही इन्हें सामाजिक व्यवस्था से अलाहिदा किया जाए....क्योंकि क़ानून समाज के बाद का मुद्दा होता है....और सामाजिक न्याय सरकारी न्याय से बड़ा ...

दिवसों के पीछे छुपी बेचारगी और आडम्बर युक्त करुणा से दूर ही रहे तो अच्छा है, क्रान्तियाँ  हो पर मुद्दों पर फिर वो चाहे महिला के मताधिकार की हो यह उसके नौकरी या व्यवसाय से जुडी हो, तभी शायद मैंने कही लिखा था की "अब पुरुष दिवस कब मनाया जाएगा" उसके पीछे भी यही वजह थी ! एक व्यंग जिसके पीछे वो तथ्य है जो कमजोरी बयान करते है दिवसों को आक्षेपित करने वाले जीव या वस्तु की !

प्रकृति को सब मालूम होता है तभी तो उसने विद्धुत ऊर्जा के आविष्कार से करोड़ो वर्ष पहले पक्षियों के पंजों को रक्तहीन बनाया ताकि बिजली के तारों में दौड़ते करंट से वह बच सके, और एकलिंगी पुष्पों के अलावा द्विलिंगी  पुष्प भी ताकि महिला पुरुष जैसे पुष्प अलाहिदा होने लगे कानून की किताबों से लेकर यथार्थ में भी तब भी प्रकृति की गति यूं ही चलती रहे....!!

शुभकामनाएं और महिलाओं से क्षमा यदि कुछ यथोचित न लगे मेरे लेखन में !


कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com





Friday, June 24, 2011

चन्द्रग्रहण- मेरी नज़र से...

चन्द्रग्रहण 15/16 जून 2011- 


लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश भारत


- कृष्ण कुमार मिश्र









Krishna Kumar Mishra
krishna.manhan@gmail.com

Thursday, July 29, 2010

जो रईंसों के घर-आँगन में खिलने का गरूर रखते थे!

Kachnar: Photo courtsey: Wikipedia.com
पुष्पवाटिकायें जिनसे महरूम रहा आम आदमीं!

बात फ़ूलों की करना चाह्ता हूं, चूंकि मसला खूबसूरती और खुशबुओं का है, तो थोड़ा हिचक रहा हूं! प्रकृति की अतुलनीय सुन्दरता का बखान करना वर्तमान में मुश्किल और पिछड़ेपन  की निशानी है..इन महान साहित्य पुरोधाओं के मध्य…क्योंकि वह समाज की गन्दगी जो उनकी नज़र में पहले से मौजूद है, रिस्तों की कड़वाहट जो उनके घरों में विद्यमान है…दुखों, करूणाओं और प्रेम के तमाम विद्रूप आकार-प्रकारों को (जो उनके मन शाम-सबेरे हर वक्त उपजते रहते हैं) बेचते ये बुद्धि-विद्या के स्वयंभू अब प्रकृति की बात करने में शर्मसार होते है..कारण स्पष्ट है कि रेलवे स्टेशनों, बसड्डों बुक स्टालों पर प्रकृति प्रेम! नही खोजते यात्री! और राजिनीतिक गलियारों में वोट और गोट में प्रकृति समा ही नही सकती!…फ़िर कौन बेवकूफ़ इन्हे फ़ूल, पत्तियों पर लेखन के लिए पुरस्कृत कर देगा! खैर..मैं लिए चलता हूं कालीदास और उस दौर के तमाम…. प्रकृतिकारों का नाम भूल रहा हूं!!!!…..  जब सरोवरों में कमल-कमलिनियां पुष्पित होते थे और राज-कन्यायें उनमें स्नान करने आया करती थी…तो घोड़े पर सवार राज-पुरूषों के घोड़ो को अक्सर उन्ही सरोवरों पर पानी पिलाना आवश्यक होता था !! महलों और बगीचों में युनान,  मंगोलिया, अरब देशो से लाये गये वृक्षों, झाड़ियों, और लताओं की सुनहरी छटाओं का जिक्र रामायण काल से लेकर राज महलों व बौद्ध मठों तक विस्तारित था! मुगलों ने भी दुनियाभर से प्रकृति के विविध रूपों को अपने बगीचों में खूब इकट्ठा किया….फ़ुलवारियों के रूप में!…हाँ हमें अंग्रेजों को कतई नही भूलना हैं जिन्होंने दुनिया में मौजूद अपने साम्रराज्य के प्रत्येक भू-भाग पर उगने वाली सुन्दरता को भारत के विविधता पूर्ण  मौसम व जमीन में रचा-बसा दिया, जिसकी कुछ झलकें अभी भी कुछ सरकारी आवासों में दिखाई दे जाती हैं!…

मैं आप को याद दिला दूं एडविन लैंडसीयर लुटियन की जिसने नई दिल्ली का निर्माण किया और गवर्नर हाउस, रायसीना हिल जैसी जगहों को प्रकृति के इन रंगो से सरोबार….!! भारत के वन विभाग के पुराने डाक बंग्लों में कुछ योरोपीय व अफ़्रीकी वनस्पतियां अभी भी मिल जायेंगी जिन्हे अंग्रेज सुन्दरता और सुगन्ध के लिए इन जगहों पर लगाया था!….एक बात कहना चाहूंगा कि धरती पर कोई प्रजाति देशी-विदेशी नही होती…बशर्ते उसे धरती का वह हिस्सा उस प्रजाति को अपना ले…..!

अब भूमिका शायद लम्बी व निरर्थक हो रही तो चलिए आप को ले चलते है उत्तर भारत के मैनहन ग्राम में जहा सरोवर भी है और आम-जामुन व पलाश के बगीचे भी, जो धीरे-धीरे पतन की राह पर अग्रसर किए जा रहे हैं! १९८०-९० के भारत में बचपन में मैनें उन्ही गांवों में फ़ुलवारियां देखी जहां कोई मन्दिर मौजूद हुआ और उसके आस-पास पुजारी प्रवृत्ति के लोग…उन्हे रोज जो भगवान को पुष्प अर्पित करने होते थे! सो पुष्प की उप्लब्धता की व्यवस्था  भगवान की मौजूदगी पर निर्भर थी! इन फ़ुलवारियों के रूप में! नही तो पुष्प व पुष्प-वाटिकायें आदि भारत में राजा-महराजाओं, मध्य भारत में नवाबों और माडर्न ईंडिया में अफ़सरों का विषय ही रहे, एक आम व औसत हिन्दुस्तानी रोटी के जुगाड़ में ही दिन काट रहा होता था उसे तो पेट भरने के लिए रोटी की सुगन्ध ही दरकार रही बेचारा पुष्प और उनकी खुशबुओं से बावस्ता हो, इसका न तो उसे कभी मौका मिला और न ही खयाल आ पाया। हाँ इतिहास के पन्नों में जमींदारों और राजाओं की जो फ़ुलवारियां हुआ करती थी, उनमें न तो आम हिन्दुस्तानी को जाने की इजाजत थी और न ही उस फ़ुलवारी के किसी पौधें का बीज या कलम किसी अन्य को मिल सकती थी..कारण स्पष्ट था कि आम हिन्दुस्तानी के घर में पुष्प खिला, तो उन जमींदार महाशय के रसूख में धब्बा लग जायेगा….

एक वाकया याद आ गया है, सुन ले….मेरे जनपद की तहसील मोहम्मदी जो कभी बरतानिया सरकार में  जिला होने का गौरव रख चुका है, वहां दिल्ली सरकार (मुगल) के समय डिप्टी कमिश्नर  टाइप की हैसियत से रहने वाले जनाब ने एक बगीचा लगाया था, उसमें केतकी (केवड़ा) का पुष्प कहीं से लाया गया, जो इस इलाके भर में अदभुत व अप्राप्त वनस्पति वन कर सैकड़ों सालों तक गौरवान्वित होता रहा…आम हिन्दुस्तानी जिसकी आज भी आदत क्या खून में यह पैबस्त है, कि राजा के घर की घास-पूस भी कुछ अतुलनीयता अवश्य रखती है…और वह मूर्ख उस सामान्य बात या वस्तु को असमान्य ढंग से पेश करता हुआ अपने को गौरवान्वित करता आया है….हाँ तो वह साधारण सा केवड़ा केतकी वन सिर्फ़ उसी बाग में खिलता रहा और हमारे लोग यहाँ तक की मीडिया गौरवगीत गा गा कर भरार्ने लगा….लेकिन सिलसिला नही टूटा….आदत में है जो…..कभी भारत की विविधिता का खयाल भी नही किया कि जहां हर देवता के सहस्र नाम हो, जहां की भाषा पर्यावाचियों से लबालब ठसी हुई हो..जहां एक कोस पर चीजों के नाम बदल जाते हों…इस बारे में भी नही सोचा…केतकी ही केवड़ा है जो हमारे गांवों में भी खिलता है!..बस केतकी जो वर्ष में एक बार  खिलती है!….दुनिया में सिर्फ़ मोहम्मदी में…संसार में नही होती…फ़लाने हसन द्वारा लाई गयी..केतकी….यह डाकूमेन्टेशन है हमारे मुल्क में…..बहुत जल्दी जहां चीजे बिना सोचे समझे अदभुत हो जाती है…और सरकार व पढ़े लिखे लोग उसे पढ़ते जाते है…बिना सोचे…जाने….साल दर साल केतकी खिलती रही….अभी भी खिलती है…….पूरे संसार में सिर्फ़ खीरी जिले को यह गौरव प्राप्त है…..आखिर फ़िर वह लाये कहां से थे इस केतकी को?..जब संसार में सिर्फ़…..मजा तो तब आया जब मेरे एक परिचित बुजर्ग ने गर्जना करते हुए मुझसे कहा कि केतकी उनके यहां खिला…..उनकी गर्जना में सदियों से गुलाम रहे हिन्दुस्तानी के भीतर चेतना व आत्म-गौरव का झरना स्फ़ुटित हो रहा था…जैसे वह तोड़ देना चाहते हो उन जंजीरों को जो सिर्फ़ यही कहती हो कि यह पुष्प सिर्फ़ राजा या नवाब के बगीचे में खिलता हो….उन्हे मैं सलाम करता हूं उनके इस जज्बे के लिए….काश…फ़िर सराहनीय है उनका प्रयास!
दरसल वो कही से केतकी का सम्पूर्ण (!) पौधा लाये और उसे रोप दिया…इसमें एक टेक्निकल मामला है, मोहम्मदी वाले केतकी का पौधा जमींदारी रहते तो आम आदमी को अपने घर लगाने की गुस्ताखी नही कर सकता था, लेकिन आजादी के बाद उसने जरूर प्रयास किए..किन्तु इस प्रजाति में नर व मादा पौधे अलग-अलग होते हैं ..इसलिए जिसने भी एक पौध उखाड़ कर अपने घरों में लगाई तो नर व मादा में से एक की अनुपस्थिति उसमे पुष्पं के पल्लवन में बाधक बनी रही। अंतत: यह मान लिया गया कि यह पौधा उसी बाग में खिल सकता है….नवाब साहब …के बाग …कोई कहता वह पौधे के साथ उस जगह से मिट्टी भी लाये थे..इसीलिए यह उसी बगीचे में खिल सकता है!….या कोई कहता भाई आदमी आदमी की बात होती है, उसके हाथों में…..
मौजूदा हालातों में अनिभिज्ञता व चलन में न होने के कारण वाटिकाओं से फ़ासला रहना जाहिर है, हमारें लोगों का, पर सबसे बड़ी दुश्वारी है, जमीन के हर टुकड़े पर खेती करने की होड़, या जमीन की कमी, जिसमें पेट पालना पहली जरूरत होती है! गाँवों का बदलता परिवेश, किन्तु मौके फ़िर भी है, हम थोड़ी सी ही जगह से सुवासित कर सकते है, गाँव की धरा को, और मौका दे सकते हैं, उन्हे जो अब हमारे आँगन व द्वारे पर नही दिखते...रंग बिरंगी तितलिया, गुनगुनाते भौरें, मकरन्द खाती चिड़ियां......वो सभी कुछ जो अब किताबी है वापस हो सकता है! इन्ही सब बातों के दरम्यान हम वापसी की तैयारी में उन सबकी जो राजाओं के घर-आँगन में खिलने का गरूर रखते थे! 
खैर अब चलिए मैनहन में जहाँ मैने अपने पूर्वजों के घर के पुनर्निर्माण के साथ-साथ दुआरे पर फ़ुलवारी की परिकल्पना पर काम कर रहा हूं..आखिर आजाद भारत का बाशिन्दा हूं और फ़िजाओं में खुसबूं और सुन्दरता तलाशने का मुझे पूरा हक है! तो मैने पहले चरण में…हरसिंगार, चम्पा, चमेली, रात के रानी, अलमान्डा, बेला, मालती,  के पौधे रोपे हैं, दूसरे चरण में मैं गन्धराज, मौलश्री, जूही, कचनार, बेल का रोपन करूंगा, साथ ही बरगद, सागौन जैसे विशाल वृक्ष भी मेरी कार में सुसज्जित है….जिन्हे कल रोपित किया जायेगा….फ़िलहाल मेरा अगला कदम गाँव के हर व्यक्ति कों तमाम खुशबुओं वाले पौधें भेट करने का निश्चय है!…लेकिन क्रमबृद्ध तरीके से…शायद रात की रानी मिशन…बेला…..चमेली….या फ़िर गन्धराज मिशन…एक वर्ष में प्रत्येक सगन्ध पुष्प वाले पौधों  में एक सुगन्धित पौधा वितरित करूंगा…जो हर घर में पल्ल्वित हो…..इसी इरादे के साथ.. पुष्पवाटिकाओं के चलन की शुरूवात करने की कोशिश…शायद रिषियों, और राज-कन्याओं और राज-पुरूषों के शैरगाह की जगहें आम हो सके आम आदमी के मध्य…जमींदारों, नवाबों और नौकरशाहों के बगीचों का मान तोड़ती ये पुष्पवाटिकायें एक औसत हिन्दुस्तानी को अपनी परेशानियों व तंगहालियों की गन्ध के मध्य विविध सुगन्धों का एहसास करा सके…और सुगन्धों व नवाबों के मध्य रिस्तों का मिथक टूट पाये….!

कृष्ण कुमा्र मिश्र
मैनहन-262727
भारतवर्ष

Saturday, September 6, 2008

रेल पथ पर हुई एक और बाघ की मौत - दोषी कौन ?


५/६ सितम्बर २००८ की रात को दुधवा टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने वाले रेल पथ पर एक और जी्व की मौत हो गई इस जीव को भारतीय वन्य जीव अधिनियम मे से्ड्युल वन मे रखा गय है और पूरी दुनिया इस नायाब जानवर को बचाने मे अपन सहयोग दे रही है इसे हिन्दु मन्यताओं में दे्वी दुर्गा का वाहन माना गया है तो जिम कार्बे्ट जैसे शिकारी ने इसे बिग हरटेड जेनटल मैन कहा, भारत ही नही पूरी दुनिया कुदरत की इस बेह्तरीन कृति की एक झलक पाने को लालायित रहती है और यह पारिस्थिति्की तन्त्र के सर्वोच्च स्थान पर विराजमान जीव उस तन्त्र के सन्तुलन और सवंर्धन मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर्ता है शिकार करने के पूर्व इसकी शान्त मन: स्थित और शिकार के वक्त इसका विकराल रूप हमें शिव अर्थात रुद्र का अहसास कराता है जैसे विनाश के पूर्व की शान्ति !॒! तो इसे आप जंगल का कुशल कूतिनीतिक चाणक्य भी कह सकते है ये जन्गल में जीवों का शिकार भी करता है और उनकी वृ्द्धि और संरक्षण में भी सहायक है ये जंगल का रक्षक भी है और इसकी शक्ति एवं सुन्दरता का जिक्र मै शब्दो में तो कर ही नही सकता जिसे आप स्वमं महसूस कर सकते हो किसी अभयारण्य मे इसे देखकर ! टाइगर ! टाइगर !

किन्तु अब ये अपने घरो से बेदखल किये जा रहे है मानव जाति के स्वार्थों के कारण जंगलों कॊ खॆतिहर जमीनों में तब्दील कर या मानव आबादी बसा कर या फिर शिकार ऐसे तमाम कृत्य है मानव जाति के जिनका पूरा पूरा बयान करना मेरे लिये मुश्किल है पर मानव जाति को इतना तो मालूम ही होना चाहिये और शायद पता भी है कि प्रकृति के साथ उनका मौजूदा बर्ताव वैसे ही है जैसे जिस डाल पर हम बैठे हो और उसी को काट रहे हो !!

हां अब सरकार को भी ये तय कर लेना पडेगा कि उसे किसके हितो को प्राथमि्कता देनी है और किसे प्राथमिकता देने से दोनों यानि मनु्ष्य और अन्य जीवों को लाभ पहुंचेगा खाली प्रोजे्क्ट बना देने से और कागज़ों पर तसवीरें छापनें से इन वन्य जीवों को हम नही बचा पायेगे और अगर ये नही होगे तो हम अपने वजूद को भी न समझे इस ग्रह पर यह निश्चित है।

दुधवा टाइगर रिजर्व मे आये दिन कोइ न कोइ वन्य जीव इन बेलगाम और वन्य जीव अधिनियम के सारे नियमोम को ताक पर रखकर चलने वाली रेलगाड़ियों से टकराकर मरता है और थोड़ा बहुत हल्ला मचने के बाद सब कु्छ फिर जस का तस आखिर कोइ तो विकल्प होगा कि आइन्दा से कोइ निरीह वन्य जीव मानव जनित कारणों से न मरे ! बीती रात एक नर बाघ गोंडा पलिया रेलमार्ग पर मझरा पूरब के आस-पास तेजगति से आती हुइ ट्रेन से टकरा कर छत-विछत हो गया उसके शरीर के तमाम अंग गायब हो गये सूत्र बताते है कि यह जवान बाघ शायद ट्रेन से टकराने के बाद मीलों पटरियों और ट्रेन के मध्य फंसकर घिसटा है नतीजतन इसके सारे अंग भंग हो गये ।
अब ये सुनिश्चित होना चाहिये कि हम या तो बाघ बचाये या अभयरण्यों से होकर गुजरने वाले रेलपथों पर ट्रेन चलाये खासबात यह है कि इन जंगलों में ये रेलपथ ब्रिटिश हुकूमत में लकड़ी कटान के लिये बिछाये गये थे और अब इन्हे अगर उखाड़ भी दिया जाय तो कोई खास फर्क नही पड़ने वाला न तो भारतीया रेल विभाग के रेवेन्यू पर और न ही यातायात पर क्यो कि तमाम अन्य विकल्प मौजूद है साथ ही वन्य जीवों कि अमूल्य कीमत के वनस्पति रेल मार्ग को विस्थापित करना अधिक आसान है और सस्ता है जिससे हम अपने इस अमूल्य वन्य संपदा को बचा सकते है
यहां मै एक सुझाव देना चाहूगा कि ट्रेन के इंजन के अगले हिस्से में एक मुलायम रबड़ य प्लास्टिक का चौकोर वाइपर नुमा टुकड़ा लगा सकते है जिससे चलती ट्रेन के आगे जो भी जीव आयेगा वह उस मुलायम वस्तु से टकराकर पटरियों से अलग किनारे हट जायेगा और उसे कोइ नुकसान भी नही होगा इसके साथ साथ ट्रेन की गति जंगली इलाको में सख्ती के साथ सुनश्चित करनी होगी और उसका पालन हो रहा है या नही इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा क्यो कि दुधवा अभयारण्य से गुजरती ये ट्रेनें धड़धड़ाती हुई गति निर्धारण के सभी नियमों की खिल्ली उड़ाती वन्य जीवों को कुचलती हुई चलती है जिनमे सिर्फ़ कुछ मामले ही प्रकाश मे आते है !

अंत मे एक बात और ट्रेन जैसी विशाल और गर्जना करने वाली वस्तु से ये जंगल का राजा कैसे टकरा जाता है क्यो कि ट्रेन के आने से मीलो पहले पटरिया झनझनाने लगती है नजदीक आते आते ट्रेन की आवाज़ की गर्जना बढ़ती है साथ में रात मे तेज़ रोशनी करने वाली हेड लाइट और हार्न की आवाज़ क्या ये अति संवेदनशील जीव इन सब को नही भांप पाते साथ ही ब्रिटिश इण्डिया मे ये ट्रेने इन्ही रेलपथो से गुजरती थी तब ये जंगल और घने थे जाहिर है बाघ तेन्दुआ हाथी आदि जानवरों की तादाद भी ज्यादा थी फिर ये घटनाये क्यो नही घटती थी जैसा कि आज घट रही है एक बात और कि हमारे दुधवा के बाघों का इस रेल पथ से तकरीबन १०० साल पुराना रिश्ता है हाँ इन हाथियों के साथ जो घटनाए दुधवा में घटी उन्हें तो एक्सीडेंट माना जा सकता है क्यो कि दुधवा में आज से लगभग १०० वर्ष पहले ही हाथियों ने अलविदा कह दिया था और तब इस जंगल में से होकर रेल भी नही गुजराती थी आज जो भी जंगली हाथी दुधवा आते है वो नेपाल के है और मालुम हो कि नेपाल में रेलवे नही है और वहां के जंगली जीव रेल से परिचित नही है शायद इसी लिए ये हाथी अपने जैसे भीमकाय रेल इंजन को देखकर भी पटरियों से नही हटते होगे खैर इन बेशकीमती वन्य जीवों की मौत के पीछे कोई रहस्य तो नही छुपा है !!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
९४५१९२५९९७