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Friday, November 13, 2009

राष्ट्रवाद या विश्ववाद या फ़िर पृथ्वीवाद ! अगर दुनिया एक मुल्क हो जाये तो !

राष्ट्रवाद या विश्ववाद या फ़िर पृथ्वीवाद!





अगर दुनिया एक मुल्क हो जाये तो क्या होगा राष्ट्रवादियों, भाषावादियों, जाति-धर्मवादियों और क्षेत्रवादियों का  क्या होगा!?


ख़ुदा नहीं न सही आदमी का ख़्वाब सही|


कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए|

विचारों का क्या जहां तक मन जाये वहां तक पींगें बढ़ाइये!आज़ मेरा मन भी पींगों पर पींगें ब़ढा़ रहा है! कुछ अजीब किन्तु तार्किक खयालात् के बोझ तले दबा जा रहा है सोच रहा हूं कुछ विचार आप सब भाई लोगों के फ़ौलादी कन्धों पर टांग दू।

राष्ट्रवाद जिसके लिये तमाम मुल्कों के तमाम लोगों ने अपनी जाने कुर्बान की, संघर्ष गाथायें बनी, और पाठयक्रमों मे शामिल हुई नतीजतन आने वाली पीढ़ियों ने भी उन गाथाओं से सबक लिया और नई राष्ट्रवादी खेपे वजूद में आई, इससे इतर हज़ारो, लाखों की तादाद में क्षेत्रवादी विचारधारायें पनपी और लोग मरते-कटते गये, कही किसी भौगोलिक टुकड़े के नामकरण पर तो कही अलग राज्य के नाम पर और कही-कही तो जाति के नाम पर भी लोग क्रान्ति करते रहे है और संघर्ष आज भी बदस्तूर जारी है। धर्म का जिक्र इस लिये नही किया क्योकि यह तो विस्फ़ोटक तत्व रहा ही है इतिहास में।

भाषाई दंगों के बारे में जिक्र करना मुनासिब नही समझता क्योकि हमारे अपने मुल्क में इस मुद्दे पर कटाजुज्झ जारी है और तमाम लेखनियां स्याही पोक रही है कागज़ और डिजिटल उपकरणों पर बिना रुके।

विचारधारा बर्ड फ़्लू, चिकनगुनिया,(अतीत में हैज़ा, कालरा, और चेचक)की तरह एपीडेमिक होती है बसर्ते समय-काल और परिस्थित अनुकूल हो! लेकिन हमारे मुल्क में सैकड़ों खेमों ने विचारों की फ़ैक्ट्री लगा रखी है और रोज़ ही वह इनकी लाखों प्रतियां छापते है किन्तु इन्हे पाठक नही मिलते वजह साफ़ है कि व्यक्ति सकून से अपने परिवार गांव घर में दो वक्त की रोटी खाना चहता है न कि विना वजह क्रान्ति करना! पर हमारे लोग मानते ही नही सब के सब एक तरफ़ से चेग्वेरा, लेनिन, हिटलर, मुसोलिनी, महात्मा, भगत सिंह, और नेहरू बनना चाह्ते है मगर क्यो किस वजह के लिये, वोट बटोरने के लिये ! या हथियारॊ के दम पर राज करने के लिए? ये नेता बेवक्त के भिखारी बन कर हर भले आदमी का दरवाजा खटखटाने लगते है, कोई दहाड़ कर शेर-कविता कह कर क्रान्ति की राह में ढ़केलने की कोशिश करता है तो कोई रिरियाता है, भाई बड़ी जरूरत है, बदलाव लाने की आप सब के बिना नही हो सकता आदि आदि।

सोचिये आज वैश्विक वातावरण में जहां दुनियां के हर मुल्क का बसिन्दा अपनी रोज़ी-रोटी के लिये गैर-मुल्कों मे नौकरियां कर रहा है धन और सुख दोनो ही उसके आगोश में है। हर वैश्विक समस्या पर हम एक साथ खड़े होते है धीरे-धीरे एक वक्त आ जाये जब सत्ता और शासक जैसी बाते समाप्त हो जाये कारपोरेट जगत की तरह सिर्फ़ उम्दा प्रबंधन हो और ये तमाम प्रबंधन एक साथ यू०एन०ओ० जैसी कोई साझा संस्था द्वारा संचालित हो तो फ़िर सीमा विवाद, प्रादेशिक मसले, भाषा पर हो हल्ला और इस तरह के सभी ही गैर-जरूरी वादॊं का कोई क्या करेगा। फ़िर लोग क्या सोचेगे उन नेताओं के बारे में या और क्रान्तिकारियों के बारे में जिन्होने राष्ट्रवाद के नाम पर वषों संघर्ष किये, खून बहा ! क्या वो प्रासंगिक रह जायेगें? एक उदाहरण है हमारे पास हिन्दुस्तान की जंगे आजादी का जिसमें बापू के योगदान का, फ़िर पाकिस्तान बना किन्तु वहां बापू प्रासगिक नही रहे, कुछ इसी तरह जिन्ना को ही ले भले ही उनका रोल कम रहा हो पर वह व्यक्ति भी तो इस पूरे भू-भाग की स्वतंत्रता में भागीदार थे लेकिन आज हमारे यहां उनका नाम ले लेने पर बवा; खड़ा हो जाता है!

शायद इस तरह के राष्ट्रवादी लोग न होते तो भारत का विभाजन नही होता दुनिया एक मुल्क होती और हम सब उसके बाशिन्दे!

हम अब वैश्विक सोच के दायरे में है हम शान्ति से रहना चाहते है! हमें राजिनीति का दखल नही चाहिये!

जीवन की उत्पत्ति और विकास वाद को देखे तो हम सब एक ही पूर्वज की सन्तान है और इस धरती पर जितने प्रकार के जीव मौजूद है सभी से हमारा रिस्ता है। 
 "we are from same kinship"

प्रासंगिकता न हो तो इस तरह के विचार गैर-जरूरी लगते है। परिवर्तन को बर्दाश्त करने की माद्दा होनी चाहिये, नही कर सकते तो कबूल कर लो, अगर कुछ कर सकते है तो समाज की नब्ज को हासिल कर उनके मुताबिक खयालातों के साथ निकल पड़िये मशाल लेकर यकीन मानिये लोग आप के साथ होगें और आप हीरो होगें उस समाज़ के लिये इतिहास में जितने भी लोग महान कहे जाते है उन्हो ने समाज की जरूरतो के मुताबिक काम किये और जिन्होने इनके खिलाफ़ अपने खालिश व गैर जरूरी विचारो को लादने की कोशिश कि वह खत्म हो गये दुनिया से भी और दिलों से भी..........................

कुछ ऐसा ही हो रहा है हमारे यहां हिन्दी को लेकर कुछ इसके खिलाफ़ मोर्चा बांधे हुए है तो कुछ इसके पक्ष में ढो़ल पीट रहे है पर इन दोनो के कुछ करने से हिन्दी नही प्रभावित होती है, यदि लोगो को इस भाषा की जरूरत है तो इसके फ़ैलाव को कोई नही रोक सकता और यदि यह प्रासंगिक नही है वर्तमान में तो इसे विलुप्त होने से कोई बचा नही सकता!

प्रत्येक वाद की जरूरत पर उपस्थित ठीक लगती है किन्तु हर वक्त लाऊडस्पीकर लगा कर जनता को गुमराह किया जाय ये काबिले बर्दाश्त नही है।

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारतवर्ष

Wednesday, May 20, 2009

संविधान निर्माताओं में से एक मेरे घर से भी- पं० बंशीधर मिश्र


१६ राजा बनाम पं०वंशीधर मिश्र- अपने समय के बेहतरीन राजनीतिज्ञ

संविधान निर्मात्री सभा के लखीमपुर खीरी से पं० बंशीधर मिश्र जी सद्स्य थे , जब गुलाम भारत के नेताओं ने ब्रिटिश कैबिनेट मिसन के नेताओं ने एक निगोसिएसन के तहत संविधान सभा का चुनाव प्रदेशीय विधान सभाओं के सदस्यों द्वारा किया गया उसमे भारत की तमाम रियासतों के राजा महराजाओं को भी हक था अपने वोट का प्रयोग करने का इस प्रकार संविधान सभा की प्रथम बैठक ९ दिसम्बर १९४६ को दिल्ली में हुई ब्रिटिश राज़ में, तब पाकिस्तान की विधान सभायें भी इसमे सम्मलित थी और वहां के राजा महाराजा भी कान्ग्रेस बहुमत मे थी, १५ अगस्त १९४७ के बाद जब पाकिस्तान भारत से अलग हुआ तब संविधान सभा में कुल २०७ सदस्य थे जिनमें २८ सदस्य मुस्लिम लीग़ के, १५ महिला सदस्य और ९० नामित विभिन्न रियासतों के नामित राजा-महाराजा, शेष कान्ग्रेस के सदस्य कांग्रेस पूर्ण बहुमत में थी ८२ % वोट कांग्रेस के पास थे। १५ अगस्त १९४७ को भारत (डोमेनिअन)की आज़ादी के बाद यही संविधान सभा लोकसभा के रूप में जानी गयी इस लिहाज़ से पं० बंशी धर मिश्र खीरी से पहले संसद सदस्य भी थे। खीरी के लोगों को फ़क्र होना चाहिये की यहां से किसी व्यक्ति ने भारत के संविधान पर हस्ताक्षर किये।
इस तरह से लखीमपुर खीरी का संविधान निर्माण में योगदान होने का गौरव हम सभी को होना चाहिये और इस गौरव को देने वाले व्यक्ति का पर इसे विडंबना ही कहेगे कि पं० जी की कोई फ़ोटो या प्रतिमा खीरी के किसी भी यथा उचित स्थान पर नही है और अब न ही लोग उन्हे जानते हैं यह दुखद है कि हम अपने गौरवशाली अतीत को भूलते जा रहे है तो फ़िर भविष्य कैसे बेह्तर होगा!

राजनीति का महारथी- पंडित वंशीधर मिश्र
आज भारत के चुनावी महापर्व पर मुझे कुछ पुराने समय के बेह्तरीन महापुरषों का स्मरण बरबस होता है जो मैने अपने पिता से दादा से, नाना से और मां से सुना आप सभी को बताता हूं!
सन १९५२ के प्रथम चुनाव जब लोकसभा और विधान सभा के चुनाव साथ साथ हुआ करते थे आजादी की लडाई का ताजा ताजा खुमार अभी बाकी था लोगो मे देश प्रेम के जज्बे अभी बाकी थे और इस प्रथम उत्सव में लोग बड़ चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे ......एक आज़ाद मुल्क के आज़ाद लोग !!
कांग्रेस जो प्रतीक थी आज़ादी की और भारत का गरीब तबका शायद राजा महाराजाओं को छोड कर धन के मामले में सभी गरीब थे। और ये सभी कांग्रेस के साथ थे उस समय खीरी से पण्डित वन्शीधर मिश्र विधान सभा का चुनाव लड रहे थे और लोक सभा से कुंवर खुसवक्त राय ! वंशीधर मिश्र असल में वह नाम था जिसके नाम से कांग्रेस और कांग्रेस के नाम से पंडित जी, उनकी तस्वीर देख कर ऐसा मालूम पड़्ता है वो नेता जी से प्रभावित थे उनका ऎनक सुभाष बाबू की तरह और उनका पहनावा भी सु्भाष जैसा और क्यो ना हो नेता जी पूरे भारत के हीरो थे भले वह कांग्रेस की राजनैतिक व्यवस्था से अलग रहे हो!
लक्ष्मीपुर यानी लखीमपुर खीरी जहां वन संपदा बहुतायात में थी तो वंशीधर जी के १९५२ के चुनाव जीतने के उपरान्त उत्तर प्रदेश सरकार का वन मंत्री बनाया गया, राजनीति में माहिर यह व्यक्ति किताबों के भी शौकीन थे और खीरी में इनसे ज्यादा किसी पुस्तकालय में भी पुस्तकेंनही थी कांग्रेस के बडे़ नेता कमलापति त्रिपाठी जैसे लोग इन्हे भेट में पुस्तके दिया करते थे पंडित जी के स्वर्गवास के पश्चात् इनकी बहुमूल्य किताबे अब लखीमपुर के गांधी विद्यालय में मौजूद है इन्होने कई पुस्तके लिखी जो अब गुमनामी में है|
शिव प्रकाश शुक्ल जी एडवोकेट बताते है कि सन १९५२ के प्रथम चुनाव मे पंडित जी के खिलाफ़ १६ स्थानीय कथित राजा चुनाव लड़ रहे थे (क्यो कि वे सिर्फ़ नाम के राजा थे अंग्रेजों ने सब को अपना नौकर बना रखा था ठेकेदार या तालुकेदार या छोटे जमींदार) और सभी राजाओं की जमानत जब्त हो गई। वजह साफ़ थी पंडित जी ने आज़ादी की लड़ाई मे अपनी उम्र के तमाम वर्ष जेल मे गुजारे और वह नेहरू के करीबी थे, अंग्रेजी राज में राजाओं और जमींदारो के जुल्मों से लहुलुहान हो चुका जनमानस अब आज़ाद भारत की प्रणेता कांग्रेस के साथ परिवर्तन चाहती थी ।
१९५७ के द्वतीय चुनाओ में कुछ स्थानीय राजशाही मानसिकता के लोगों ने वंशीधर जी पर चारित्रिक आरोप लगाये और इन संदेशों को पं नेहरू तक पहुचाया नतीजा ये हुआ कि ५७ के चुनाव में मिश्र जी को कांग्रेस ने टिकट नही दिया, इसका परिणाम ये हुआ कि ५७ में खीरी में कांग्रेस का लगभग सफ़ाया हो गया और प्रज़ा सोसियालिस्ट पार्टी की जीत हुई। मात्र शिकायत करने पर इस महान नेता का टिकट काटा गया पर आज नेताओं पर सैकड़ों मुकदमें लदे होने के बावजूद टिकट भी दिया जाता है और वह जीतते भी है।
उस दौर के चुनाव में जनता और नेता जिस चाव और इमानदारी से हिस्सा लेते थे जिसका पता मुझे मेरी मां की बातॊ से लगता है "मेरे नाना पं० रामलोटन मिश्र शास्त्री निवासी मुरई ताजपुर जो उस समय के कांग्रेस के बडे़ लीडरों मे से एक थे सहकारिता की राजिनीति में उनका सानी नही था वो छोटे जिमींदार की हैसियत रखते थे और बहुत ही मह्त्वाकाक्षी उनकी मह्त्वाकाक्षा इससे पता चलती है कि वह रसियन ट्रेक्टर तब रखते थे जब यहां के राजाओं के पास ट्रेक्टर नही थे हरगांव चीनी मिल के कई वर्षो डाइरेक्टर रहे, एक संस्मरण वंशीधर जी के भतीजे शिवप्रकाश शुक्ल जी बताते है कि मेरे नाना और मिश्र जी चुनाव प्रचार के दौरान लईया और चना साथ साथ बैठकर खाया करते थे और यही तब नेताओं का फ़स्ट फ़ूड हुआ करता था।
और कांग्रेस पार्टी के नेता, अम्मा बताती है जब पं० वंशीधर मिश्र घर आते थे तो मेरे नाना जी घर की महिलाओं से बडे़ वर्तनों मे लगातार पानी गर्म करने को कहते ताकि नेता जी और उनके समर्थकों को तुरन्त चाय पिलाई जा सके, अम्मा कहती है कि तब वह सिर्फ़ सात-आठ वर्ष की थी उन्हे याद है मेरे नाना जी माला पहनाकर स्वागत करते मिठाई खिलाते फ़िर चाय!! उन दिनों के चुनाओं मे मेरे नाना जी खेती के सारे पैसे जनता की सेवा में लगाते और पार्टी के प्रचार - प्रसार में उनकी इस आदत से घर मेम हमेशा दिक्कते रहती थी।
खीरी की राजिनीति में पं० वंशीधर मिश्र का नाम आज भी सर्वोपरि है और पूराने लोग उन्हे आज भी याद करते है इस दूषित राजिनीति के दौर में।
संविधान निर्माताओं में से एक मेरे घर से भी- पं० बंशीधर मिश्र
कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन