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Tuesday, May 20, 2008

आखिरकार तेंदुआ मार ही डाला गया

इस तेंदुए को ग्रामीणों ने प्रशासन की मौजूदगी में कातें बल्लम व लाठियों से मार डाला फिर उसे आग में बड़ेइत्मिनान से ऐसे भूना जैसे ........................................!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!





८ मई सन २००८ की शाम को जैसी कि आशंका थी वही हुआ खीरी जनपद के नष्ट हो रहे जंगलों व आहार के चलते बाहर निकले जंगली जानवरों के साथ वही हुआ जिस का डर था इस तेंदुए पर दो दिनों तक सैकड़ों राउंड गोलियाँ चलायी गयी किंतु इस जानवर की किस्मत इसका साथ एक दिन तो दे गयी लेकिन हजारों मानवों के बर्बरता पूर्ण आक्रोश ने इसे दूसरे दिन की शाम ढलने से पहले मार कर जला डाला और वन विभाग व स्थानीय इन्त्जामिया देखता रह गया भारत में तेंदुओ और बाघों को घेर कर मार डालना कोई नयी बात नही है पर इस तरह की निर्दयता से मारने का रिवाज़ जल्द ही विकसित हुआ है आदम सभ्यता में कभी शिकारी जब इन जानवरों का शिकार किया करते थे तो उनके कुछ वसूल होते थे जैसे की मादा बाघिन व इनके बच्चों का शिकार नही किया जाता था ऐसी तमाम बातें होती थी जिनमे हिंसक निर्दयता के बावजूद दया का कुछ पुट अवश्य मिला रहता था किंतु अब जब हम मानव अपने को विकसित व अति समर्थवान बताते है बावजूद इसके की अभी भी हम प्रकृति पर पूरी तरह से निर्भर है और इससे जुदा रह कर इस ग्रह पर जिंदा रहने की कल्पना भी नही कर सकते और ख़ास बात यह की हम सबसे बाद में आए और आज हम वहाँ रह रहे है जहाँ कभी इन जानवरों के घर यानी जंगल हुआ करते थे मजे की बात ये की पहले पहा हम इनके ही घरों में रहे किंतु इन्होने हमें कभी नुकसान नही पहुचाया और अब जब हम इनकी जमीनों पर घर व खेत बनाते चले जा रहे है और गलती से कभी ये हमारे बीच आ गए तो हमे इतना भी सब्र नही की हम संयम से काम ले आखिरकार ये जानवर है और हम आप तो विवेक शील .................शायद..................
आगे भी कुछ भावनाए है जो आप सब को बतानी है ...........................
हाँ उस रोज़ की उस भयावह घटना का जिक्र शुरू ए कर रहा हूं ग्रामीणों ने तेंदुए को सात मई से आठ मई तक एक गन्ने के खेत में घेर रखा था और तकरीबन २४ घंटें तक उस जानवर पर गोलियां चलायी जाती रही ऐसा नही की जनता ने प्रशासन की नामौजूदिगी में ला एंड ऑर्डर अपने हाथ में लिया था बल्कि वहां पुलिस वन विभाग व जिला प्रशासन के अफसरान भी मौजूद थे किंतु वे सब मूक दर्सक की तरह इस विलुप्त होती प्रतिबंधित प्रजाति को मौत के मुहं में जाते हुए देख रहे थे सवाल ये नही है कि प्रशासन कुछ नही कर पा रहा था या नही किया सवाल ये है कि अब कि बार यदि कोई बाघ तेंदुआ इस इलाके में भटक आया तो उसकी खैर नही क्यो कि ग्रामीण अब जान गए है कि प्रशासन कुछ नही कर सकता न तो उन्हें तेंदुए के भय से मुक्त कर सकता है और न ही तेंदुए को मारने से उन्हें रोक सकता है अब वह निरंकुश है और गर्वान्वित भी ............................................
एक बात और है तेंदुए ने जिस को भी मारा उस के परिवार का दुःख और दहशत विचारणीय है और उनके लिए इस जानवर कि कोई कीमत नही रह जाती सिर्फ़ आक्रोश ही आक्रोश ..................और ये आमादा हो जाते बदला लेने के लिए एक जानवर से जिसका कोई प्रयोजन नही होता किसी मनुष्य को मारने में सिवाय भूख और सुरक्षा के अतिरिक्त ?
पर हालत ऐसे ही रहेंगे क्योकि ये बाघ और तेंदुए सिर्फ़ गरीबों को ही मारते है क्यो की इनके घरों में दरवाजें नही होते चारदिवारिया नही होती इन्हे पैदल चलना पड़ता है और रात बिरात खेतों मी काम भी तो मरना तो इन्हे ही है कोई अमीर व सरकार में पैठ रखने वाला व्यक्ति तो कम से कम नही ...........जाहिर है गरीब की मौत की कोई कीमत नही होती यहाँ तो क्यो सरकारी अमला इस भटके हुए बाघ व तेंदुए को पकड़ने की जहमत उठाये जब चार पाँच मौते हो जायेगी तो ख़ुद बी ख़ुद वन्य जीव अधिनियम के तहत ये जीव नरभक्षी करार कर दिया जायेगा और फिर एक बाघ व तेंदुए का शिकार नरभक्षी होने के सर्टी फिकाट के आड़ में जो आसान है और जनता भी खुश की आख़िर कर उसे भयमुक्त किया जा रहा है हाँ यदि एक भी अमीर व प्रतिष्ठित व्यक्ति को बाघ व तेंदुआ खा जाए तो यकीन मानिए उसे तुरंत पकड़ा जायेगा और उसमें असफलता हाथ लगी तो मार दिया जायेगा ताकि किसी दूसरे अमीर व्यक्ति की जान न जाए ...............................और ऐसा कई बार होता है .........क्या गरीब होने पर व्यक्ति के सवेंधानिक मौलिक अधिकार कुछ कम हो जाते है ?




कृष्ण कुमार मिश्र
+919451925997