Showing posts with label तेंदुआ. Show all posts
Showing posts with label तेंदुआ. Show all posts

Monday, January 4, 2010

आज सुहेली ठहर गयी थी

KK Mishra at Tiger Haven
Originally uploaded by manhan2009



03-01-2010---आज़ सुहेली नदी की जल धारा शिथिल हो गयी थी, जंगल मुरझा गये थे, पक्षियों का चहकना बन्द हो गया था, जंगल के जानवर मानों कही गायब हो गये थे........बिल्कुल ऐसा ही मंजर था टाइगर हावेन का, ये वो जगह है जिसे सारी दुनिया जानती है। भारत-नेपाल सीमा पर घने जंगलों में स्थित ये जगह जो रिहाइशगाह थी तेन्दुओं, बाघों और उनके संरक्षक बिली अर्जन सिंह की। जहां कभी बाघ और तेन्दुए दहाड़ते थे, हज़ारों पक्षी यहां के खेतों में बोई फ़सलों से दाना चुगते और प्रकृति की धुन में गाते, सुहेली की जलधारा अपने घुमावदार किनारों से होकर कुछ यूं गुजरती थी कि आप उस सौन्दर्य से मुग्ध हो जाते। लेकिन आज सबकुछ शान्त और बोझिल सा था!


क्यों कि अब वह जंगलों का चितेरा कभी न खत्म होने वाली निंद्रा में है। जिसने इन सब को एक स्वरूप दिया था किसी चित्रकार की तरह।और इस रचनाकार की यह अदभुत रचना मानो जैसे अपने रचने वाले के साथ ही नष्ट हो जाना चाहती हो!

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत बिली अर्जन सिंह ने ब्रिटिश-भारतीय सेना का दामन छोड़ खीरी के विशाल जंगलों को अपना मुस्तकबिल बना लिया और उसे एक खूबसूरत अंजाम भी दिया, जिसे आज हम दुधवा नेशनल पार्क के नाम से जानते है। शुरूवाती दिनों में पलिया से सम्पूर्णानगर जाने वाली सड़क पर अपने पिता जसवीर सिंह के नाम पर एक फ़ार्म हाउस का निर्माण किया, और खेती को अपना जरिया बनाया। कभी शिकारी रह चुके बिली जब एक दिन अपनी हथिनी पर सवार हो जंगल में दाखिल हुए तो सुहेली और नेवरा नदियों के मध्य भाग को देखकर स्तब्ध रह गये, अतुलनीय प्राकृतिक सौन्दर्य से आच्छादित थी ये धरती जिसके चारो तरफ़ शाखू के विस्तारित वन। यही वह घड़ी थी जिसने टाइगर हावेन के प्रादुर्भाव का निश्चय कर दिया था ।

सन १९६९ ई० में यह जंगल बिली ने खरीद लिया, जिसके दक्षिण-उत्तर में सरितायें और पश्चिम-पूर्व में घने वन।


इसी स्थान पर रह कर इन्होंने दुधवा के जंगलों की अवैतनिक वन्य-जीव प्रतिपालक की तरह सेवा की, फ़िर इन्दिरा सरकार में बिली के प्रयास सार्थक होने लगे। नार्थ खीरी के जंगल संरक्षित क्षेत्र का दर्ज़ा पा गये और बिली सरकार की तरफ़ से अवैतनिक वन्य-जीव प्रतिपालक बनाये गये।


अर्जन सिंह के निरन्तर प्रयासों से सन १९७७ में दुधवा नेशनल पार्क बना और फ़िर टाइगर प्रोजेक्ट की शुरूवात हुई, और इस प्रोजेक्ट के तहत सन १९८८ में दुधवा नेशनल पार्क और किशनपुर वन्य जीव विहार मिलाकर दुधवा ताइगर रिजर्व की स्थापना कर दी गयी। टाइगर हावेन से सटे सठियाना रेन्ज के जंगलों में बारहसिंहा के आवास है जिसे संरक्षित करवाने में बिली का योगदान विस्मरणीय है।


जंगल को अपनी संपत्ति की तरह स्नेह करने वाले इस व्यक्ति ने अविवाहित रहकर अपना पूरा जीवन इन जंगलों और उनमें रहने वाले जानवरों के लिए समर्पित कर दिया।


टाइगर हावेन की अपनी एक विशेषता थी कि यहां तेन्दुए, कुत्ते और बाघ एक साथ खेलते थे। बिली की एक कुतिया जिसे वह इली के नाम से बुलाते थे, यह कुतिया कुछ मज़दूरों के साथ भटक कर टाइगर हावेन की तरफ़ आ गयी थी, बीमार और विस्मित! बिली ने इसे अपने पास रख लिया, यह कुतिया बिली के तेन्दुओं जूलिएट और हैरियट पर अपना हुक्म चलाती थी और यह जानवर जिसका प्राकृतिक शिकार है कुत्ता इस कुतिया की संरक्षता स्वीकारते थे । और इससे भी अदभुत बात है, तारा का यहां होना जो बाघिन थी, बाघ जो अपने क्षेत्र में किसी दूसरे बाघ की उपस्थित को बर्दाश्त नही कर सकता, तेन्दुए की तो मज़ाल ही क्या। किन्तु बिली के इस घर में ये तीनों परस्पर विरोधी प्रजातियां जिस समन्वय व प्रेम के साथ रहती थी, उससे प्रकृति के नियम बदलते नज़र आ रहे थे।


विश्व प्रकृति निधि की संस्थापक ट्रस्टी व वन्य-जीव विशेषज्ञ श्रीमती एन राइट ने बिली को पहला तेन्दुआ शावक दिया, ये शावक अपनी मां को किसी शिकारी की वजह से खो चुका था, लेकिन श्रीमती राइट ने इसके अनाथ होने की नियति को बदल दिया, बिली को सौप कर।


बिली को श्रीमती इन्दिरा गांधी के द्वारा दो तेन्दुए प्राप्त कराये गये जिनका नाम जूलिएट और हैरिएट था। बाद में तारा नाम की बाघिन का बसेरा बना टाइगर हावेन। फ़िसिंग कैट, रीह्सस मंकी, भेड़िया, हाथी और न जाने कितने जीव इस जगह को अपना बसेरा बनायें हुए थे। और इन सभी बिली से एक गहरा रिस्ता था जो मानवीय रिस्तों के सिंद्धान्तों और उनकी गन्दगियों बिल्कुल जुदा था। इन रिस्तों को नियति या प्रकृति ने तय किया था।



आज बिली की इच्छा के मुताबिक उनका अन्तिम संस्कार उसी जगह पर किया गया जहां इली, जूलिएट और प्रिन्स को दफ़नाया गया था। इस जगह से कुच दूरी पर अर्जन सिंह की मां मैबेल का भी अन्तिम संस्कार किया गया था। मैने जब श्रीराम (बिली के ड्राइबर या यूं कहूं कि परिवार का सदस्य) से पूंछा कि बिली साहब की अस्थियां प्रयाग राज ले जायेंगें या कही और, तो जवाब आया साहब सुहेली है न, इससे साहब को बहुत प्रेम था।

श्रीराम ने ही बताया कि बिली की मां की अस्थियां भी सुहेली में प्रवाहित की गयी थी।


जगदीश उर्फ़ हपलू जिसके नाना जैक्सन नें बिली के बाघ और तेन्दुओं को पालने में अपना पूरा जीवन लगाया था, जब बात की तो...............टाइगर मैन की इच्छा थी कि जब मर जाऊ तो किसी बाघ के आगे डाल देना कम से कम उसका पेट भर जायेगा!


पदम भूषण, पदम श्री, कपूरथला रियासत के कुंअर बिली अर्जन सिंह आज अकेले सोये हुए थे चिर निंद्रा में वहां कोई मौजूद था तो सिर्फ़ उनके नौकर जिनके आंखे अश्रुधारा छोड़ रही थी और चेहरों पर शोक के सारे चिन्ह शक्लों को बेरौनक किए जा रहे थे। इनके अलावा अगर कोई था तो वनधिकारी, कर्मचारी और स्थानीय लोग।

इतनी बड़ी शखसियत लेकिन आंसू बहाने वाला अपना कोई नही। लेकिन यकीन मानिए जो लोग थे वही उनके थे ! जसवीर नगर से जब बिली को अन्तिम विदाई दी गयी तो वन-विभाग गार्ड आफ़ आनर देकर बिली से अपने लम्बे व गहरे रिस्तों का कर्ज़ चुका दिया। खीरी जनपद के लोगों और वन-विभाग ने इस अन्तर्राष्ट्रीय शख्सियत को सम्मान जनक विदाई दी ।

किन्तु अफ़सोस इस बात का है कि प्रदेश सरकार और देश की इन्तज़ामियां की तरफ़ से अब-तक कोई सरकारी शोक संदेश जारी नही हुआ। बात सिर्फ़ बिली अर्जन सिंह की नही है, बात हमारे उन हीरोज़ की जो अपना जीवन समर्पित करते है राष्ट्र सेवा में, फ़िर वह समर्पण चाहे देश की सुरक्षा का हो या पर्यावरण की रक्षा का, यदि हम उन्हे सम्मान नही देगे तो पीढ़िया क्या सबक लेगी, और कौन चलेगा इन दुरूह पथों पर जहां कागज़ के टुकड़ों पर सम्मान लिख कर दे दिया जाता है बस पूरी हो गयी जिम्मेदारी। जब कभी जरूरत पड़ी जनता को दिशा देने की तो आदर्श स्थापित करने के लिए हेरोज़ को इतिहास की किताबों में तलाशा जाता है...............



दो वर्षों से आ रही भयानक बाढ़ ने दुधवा के वनों व टाइगर हावेन को क्षतिग्रस्त करना शुरू कर दिया है यदि जल्दी कोई हल न निकाला गया तो बिली का यह घर जो अब स्मारक है हम सब के लिए के साथ-साथ हमारी अमूल्य प्राकृतिक संपदा भी नष्ट हो जायेगी।

बिली अर्जन सिंह के संघर्षों का नतीज़ा है दुधवा टाइगर रिजर्व और टाइगर हावेन, और इन दोनों को सहेजना अब हमारी जिम्मेदारी।

Monday, December 21, 2009

दुधवा के जंगल




भारत का एक राज्य जो नेपाल की सरहदों को छूता है, उन्ही सरहदों से मिला हुआ एक विशाल जंगल है जिसे दुधवा टाइगर रिजर्व के नाम से जाना जाता है। यह वन उत्तर प्रदेश के खीरी जनपद में स्थित है यहां पहुंचने के लिए लखनऊ से सीतापुर-लखीमपुर-पलिया होते हुए लगभग २५० कि०मी० की दूरी तय करनी होती है। दिल्ली से बरेली फ़िर शाहजहांपुर या पीलीभीत होते हुए इस सुन्दर उपवन तक पहुंचा जा सकता है।
एक फ़रवरी सन १९७७ ईस्वी को दुधवा के जंगलों को नेशनल पार्क का दर्ज़ा हासिल हुआ, और सन १९८७-८८ ईस्वी में टाईगर रिजर्व का। टाईगर रिजर्व बनाने के लिए किशनपुर वन्य जीव विहार को दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में शामिल कर लिया गया । बाद में ६६ वर्ग कि०मी० का बफ़र जोन सन १९९७ ईस्वी में सम्म्लित कर लिया गया, अब इस संरक्षित क्षेत्र का क्षेत्रफ़ल ८८४ वर्ग कि०मी० हो गया है।
इस वन और इसकी वन्य संपदा के संरक्षण की शुरूवात सन १८६० ईस्वी में सर डी०वी० ब्रैन्डिस के आगमन से हुई और सन १८६१ ई० में इस जंगल का ३०३ वर्ग कि०मी० का हिस्सा ब्रिटिश इंडिया सरकार के अन्तर्गत संरक्षित कर दिया गया, बाद में कई खैरीगढ़ स्टेट के जंगलों को भी मिलाकर इस वन को विस्तारित किया गया।
सन १९५८ ई० में १५.९ वर्ग कि०मी० के क्षेत्र को सोनारीपुर सैन्क्चुरी घोषित किया गया, जिसे बाद में सन १९६८ ई० में २१२ वर्ग कि०मी० का विस्तार देकर दुधवा सैन्क्चुरी का दर्ज़ा मिला ये मुख्यता बारासिंहा प्रजाति के संरक्षण को ध्यान में रख कर बनायी गयी थी। तब इस जंगली इलाके को नार्थ-वेस्ट फ़ारेस्ट आफ़ खीरी डिस्ट्रिक्ट के नाम से जाना जाता था किन्तु सन १९३७ में बाकयदा इसे नार्थ खीरी फ़ारेस्ट डिवीजन का खिताब हासिल हुआ।


उस जमाने में यहां बाघ, तेंदुए, गैंड़ा, हाथी, बारासिंहा, चीतल, पाढ़ा, कांकड़, कृष्ण मृग, चौसिंघा, सांभर, नीलगाय, वाइल्ड डाग, भेड़िया, लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, हिस्पिड हेयर, रैटेल, ब्लैक नेक्ड स्टार्क, वूली नेक्ड स्टार्क, ओपेन बिल्ड स्टार्क, पैन्टेड स्टार्क, बेन्गाल फ़्लोरिकन, पार्क्युपाइन, फ़्लाइंग स्क्वैरल के अतिरिक्त पक्षियों, सरीसृपों, एम्फीबियन, पाइसेज व अर्थोपोड्स की लाखों प्रजातियां निवास करती थी।


कभी जंगली भैसें भी यहां रहते थे जो कि मानव आबादी के दखल से धीरे-धीरे विलुप्त हो गये।  इन भैसों की कभी मौंजूदगी थी इसका प्रमाण वन क्षेत्र में रहने वाले ग्रामीणों पालतू मवेशियों के सींघ व माथा देख कर लगा सकते है कि इनमें अपने पूर्वजों का डी०एन०ए० वहीं लक्षण प्रदर्शित कर रहा है।


मगरमच्छ व घड़ियाल भी आप को सुहेली जो जीवन रेखा है इस वन की व शारदा और घाघरा जैसी विशाल नदियों मे दिखाई दे जायेगें। गैन्गेटिक डाल्फिन भी अपना जीवन चक्र इन्ही जंगलॊ से गुजरनें वाली जलधाराओं में पूरा करती है। इनकी मौजूदगी और आक्सीजन के लिए उछल कर जल से ऊपर आने का मंजर रोमांचित कर देता है।
यहां भी एक दुखद बात है कि इन नदियों को खीरी की चीनी मिले धड़ल्ले से प्रदूषित कर रही है जिससे जलीय जीवों की मरने की खबरे अक्सर सुनाई देती है किन्तु अफ़सरों के कानों तक इन मरते हुए दुर्लभ जीवों की कराह नही पहुंचती, शायद इन दर्दनाक ध्वनि तंरगों को सुनने के लिए उनके कान संक्षम नही है जिन्हे इलाज़ की जरूरत है और आखों की भी जो नदियों खुला बहते गन्दे नालों को नही देखपा रही है। प्रदूषण कानून की धज्जियां ऊड़ाते हुए मिलॊं के गन्दे नाले..........!


किन्तु उस समय राजाओं और अंग्रेजों ने अपने अधिकारों के रुतबें में न जाने कितने बाघ, तेन्दुए, हाथी व गैंड़ों को अपने क्रूर खेल यानी अपना शिकार बनाया फ़लस्वरूप दुधवा से गैंड़े व हाथी विलुप्त हो गये, इसके अलावा दोयम दर्ज़े के मांसाहारी जीवों को परमिट देकर मरवाया जाता था, इसका परिणाम ये हुआ कि हमारे इस वन से जंगली कुत्ते विलुप्त हो गये। जंगल के निकट के ग्रामीण बताते है उस दौर में हुकूमत उन्हे चांदी का एक रुपया प्रति जंगली कुत्ता मारने पर पारितोषिक के रूप में देती थी।

परमिट और भी जानवरों को मारने के लिए जारी होता था, उसका नतीजा ये हुआ कि अब  चौसिंघा, कृष्ण मृग, हाथी भी दुधवा से गायब हो चुके है। कभी-कभी हाथियों का झुंड नेपाल से अवश्य आ जाता है खीरी के वनों में,

इन सरकारी फ़रमानों ने और अवैध शिकार ने दुधवा के जंगलों की जैवविविधिता को नष्ट करने में कोई कसर नही छोड़ी, लेकिन मुल्क आज़ाद होते ही सरकारी शिकारियों का भी अन्त हो गया और तमाम अहिंसावादियों ने जीव संरक्षण की मुहिम छेड़ दी नतीजतन खीरी के जंगलों को प्रोटेक्टेड एरिया के अन्तर्गत शामिल कर लिया गया और प्रकृति ने फ़िर अपने आप को सन्तुलित करने की कवायद शुरू कर दी।

अफ़सोस मगर इस बात का है कि आज़ भी अवैध शिकार, जंगलों की कटाई, और मानव के जंगलों में बढ़ते अनुचित व कलुषित कदम हमारे जंगलों को बदरंग करते जा रहे है।




पक्षियों की लगभग ४०० प्रजातियां इस जंगल में निवास करती है, हिरनों की प्रज़ातियां, रेप्टाइल्स, मछलियों की और बाघ, तेन्दुए, और १९८४-८५ ई० में पुनर्वासित किए गये गैन्डें अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे है, लालची मानव प्रजाति से।


दुधवा के डाक बंग्लों जिनमें सोनारीपुर, सलूकापुर, सठियाना, चंदन चौकी, किला घने जंगलों के मध्य अपनी ब्रिटिश-भारतीय शैली की बनावट की सुन्दरता से किसी का भी मन मोह ले।


इतने झंझावातों के बावजूद दुधवा की अतुल्य वन्य संपदा जिसका एक भी हिस्से का अध्ययन नही हो पाया है ढ़ग से, उस सुरम्य प्राकृतिक वन को देखकर किसी का भी ह्रदय पुलकित हो उठेगा।


कृष्ण कुमार मिश्र
७७-शिव कालोनी लखीमपुर खीरी
उत्तर प्रदेश, भारत

Friday, April 25, 2008

एक और तेन्दुये की मौत का इन्तज़ाम कर रहा है वन विभाग




आज यानि २९ अप्रिल २००८ की सुबह से ही वन विभाग धौरहरा तह्सील के चौरा गांव में एक पुरानी बा़ग में तेन्दुये को घेर रखा है और उसे मारने की सभी कवायदें जा्री है सूत्र बताते है कि इनके पास बेहोसी की बन्दूक है पर दवा नही है तेन्दुये का क्या होना है यह भी स्पष्ट नही है पर आखिर में उसे मार देने का इरादा बना चुका वन विभाग अपनी संगीनें उस जन्वर पर ताने हुए है जो इस इलाके में तकरीबन ५ महीनें से है और अभी तक इसने ऐसी कोइ हरकत नही की जिससे यह वैग्यानिक आधार पर पुष्टि होती हो कि यह नरभक्षी है क्यो की ५ महीनों में यहां ग्रामीणों द्वारा दो तेन्दुयें और उनके बच्चे भी देखे गये साथ ही में एक बाघ की मौजूदगी की भी पुष्टि हुई है ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि दोषी कौन है? फिर अगर सभी घटी हुई चार घटनाओं पर नज़र दौड़ाये तो यह भी स्पष्ट होता है की इन ५ महीनों में जो चार मनव मौते हुई वह मात्र एक्सीडेंट थे क्यो की ये चारों मानव या तो बैठे हुए थे फिर जानवर की सी मुद्रा में थे फिर अगर ये जीव नर-भक्षी होते तो अभी तक ना जाने कितने लोगो का शिकार कर चुके होते और बाकायदा मनुष्य के मांस का भक्षण भी करते पर ऐसा नही हुआ बल्कि ये भूखे जीवों ने सियारों और कुत्तों को खाकर इन ५ महीनों तक अपनी भूख मिटाई क्यो कि यहां के जंगलों में इन मांसाहारी जानवरों का शिकार मनुष्य चट कर चुका है !! पूरे भारत में अगर बाघ व तेन्दुये द्वारा हुई मानव भक्षण की घटनाओं पर दृष्टि डालें तो नतीज़ सामने यह आता है की सभी मौते गरीब तबके के लोगों की होती है क्यो कि उनके घरों में दरवाज़े नही होते है और न ही चारदिवारी और न ही वह मोटर कारों से सफ़र करते है .......साथ ही उन्हे रात मे भी अमीरों के खेतों में काम करना पड़ता है बिना किसी सुरक्षा इन्तज़ामों के नतीजतन जानें उनकी ही जाती है और एक पुरानी कहावत भी हमारे भारत में कि " गरीब की जान सस्ती होती है" और यही वज़ह है कि इनकी मौतों पर सरकारी अमला भी जल्द ध्यान नही देता जब मीडिया शोर मचाता है और लोगों का दबाव बढता है तब तक देर हो चुकी होती है और ये सरकारी लोग बिना कुछ और प्रयास किये एक ही आसान विकल्प पर अमादा हो जाते है कि अब तो यह जानवर नर भक्षी हो गया है इसे तो मारना ही पड़ेगा......................आखिर ऐसा क्यो अगर हम पहले ही कुछ सोच ले तो शायद मनुष्य और जानवर दोनों ही बच सके।
ने आज यह विशाल वनों का जीव एक छोटे से बाग में वन-विभाग की संगीनों के ्साये में है किस वक्त उसकी एक आहट पर ढेर सारा बारूद उस जानवर के जिस्म में पैबस्त हो जायेगा................. और एक खूबसूरत और निरीह जीव इस धरती से विदा कभी जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ इनका ही राज था हम तो बहुत बाद में आये तब तो इन जानवरों हमारा कोई विरोध नही किया था और आज हम चाहते है कि सिर्फ़ हम ही इस धरती के मालिक है और हमारे सिवा यहां किसी का कोइ हक़ नही !!

अप्रिल २४ २००८ को लखीमपुर खीरी की धौरहरा तहसील में दो दो मानव मौतें हुई जिनका कारण एक तेन्दुआ है जो इस इलाकें में तकरीबन पिछले पांच महीनों से भटक रहा है बीच बी़च में एक बाघ की मौजूदिगी की पुष्टि होती रही है
मानव आबादी में ये जानवर अक्सर आ जाते है वजह साफ़ है कि जंगलों में अब इन जानवरों के खानें के लिये कुछ नही बचा और जंगलों की अवैध कटाई से इनके आवास भी नष्ट हो रहे है नतीज़ा ये है कि भोजन की तलाश में ये निरीह जीव मानव आबादी में आ जाते है और वहां इनका अनजानें में किसी न किसी मानव से टकराव होता है और यही से शुरू हो जाता है मनुष्य और जनवर के बीच संघर्ष और अन्ततोगत्वा ये जीव मौत के घाट उतार दिये जाते है नर भक्षी का तमगा पहनाकर.........!!!!
खीरी जनपद में सन २००५ की गणना के मुताबिक यहां सिर्फ़ सात तेन्दुये है किन्तु २००५ में एक तेन्दुआ वन विभाग ने नर-भक्षी घोषित कर मार दिया। अब हम ये कह सकते है कि हमारे खीरी के वनों में मात्र आधा दर्जन तेन्दुयें ही बचे है क्यो कि सड़क दुर्घटनाओं या फिर बड़े परभक्षियों द्वारा मार दिये गये। मानव की बढ़्ती आबादी वनों में आदम की आमद अवैध शिकार खासतौर पर इन बाघों व तेन्दुओं के शिकार यानी हिरन आदि ..........की वजह से अब ये जानवर आबादी में आने पर मजबूर हो जाते है पर यहां भी कुछ नही छोड़ा इस मानव प्रजाति ने क्योकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और विकास के इतने दावों के बाद भी यहां की ६०-७० फ़ीसदी आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है चाहे भोजन हो या फिर उर्जा के लिये लगातार प्रकृति का दोहन जारी है खेती का बदलता ढ़ाचा, अब इन जीवों के लिये यहां रहना दूभर हो गया है पहले इन जंगली जीवों को मानव आबादी में भी खरगोश जैसे जीव मिल जाते थे पर मनुष्य ने इनका भी शिकार कर कर इन्हे समाप्त कर चुका है जहां देखों वहां मानव और घटते प्रकृतिक संसाधन....................॥ कभी जंगली जीव और मनुष्य एक साथ रह लेते थे बिना किसी तकराव के!
खैर उत्तर प्रदेश का वन विभाग पिछली घटनाओं की तरह इस बार भी इस भूखे और भटके तेन्दुये द्वारा मारे जा रहे मनुष्यों का मुआवजा देने के अलावा कुछ नही किया है और इनज़ार करता रहा की कब राजनैतिक और पब्लिक का दवाव बढ़े और इसे नर-भक्षी करार कर इसे मार दिया जाय ताकि न रहे बांस और ना बजे बान्सुरी।
हालांकि इस बार भी वो सब नाटक हुए जो हमेशा होते है बेहोशी देने वाला डाक्टर बुलाया गया, पिंजरे रखे गये आदि आदि फिर संसाधनों की कमी का रोना रोकर बैठ जाना...................!!! अब इस तरह की चार महीने से हो रही घटनाओं के बाद आखिरी रास्ता तेन्दुये को नर-भक्षी बता कर मार दिया जाये।
अब आप बताइये कि इन भूखे और भटके हुए जीवों को नर-भक्षी कौन बना रहा है?
आप सब को ये बताने का मेरा एक उदेश्य है कि इस जीव को बेहोश कर जंगल में दोबारा भेज दिया जाये ताकि विलुप्त हो रही यह प्रजाति शायद बचायी जा सके!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
९४५१९२५९९७