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Friday, November 13, 2009

हमें नेता नही प्रबन्धक चाहिये!


एक कविता जो मैने अपने बचपन में लिखी थी और आज मुझे एक टुकड़ा मिला है उसका जो फ़टा हुआ था बचे हुए अंश................

नेताओं के इस जंगल में
नेताओं के इस दंगल में


तिल-तिल जलता है इंसान (शोषित होता है इन्सान)


नेताओं के इस दलदल में
फ़ंसता रहता है इन्सान


नेताओं की इस नगरी में
फ़ीका है हर इक इन्सान


आपस में ये लड़ते-झगड़ते                                                                                पिसता है ये इन्सान                           
नेताओं को कौन सुधारे...............कागज फ़ट चुका है!

भाई हम आज़ाद मुल्क के बाशिन्दे है जहां प्राकृतिक संसाधन के साथ-साथ औद्योगिक विकास भी खूब हुआ है ।
नेता का पर्याय है नेतृत्व करने वाला, मुद्दों पर अटल रहकर जनहित में कार्य करना पर क्या आप को लगता है हमारे यहां अब कोई नेता बचा है जिसमे वास्तविक नेतृत्व की क्षमता है सिवाय राजिनीति करने के!

हमारे मुल्क में सहकारिता भी भृष्टाचार की भेट चढ़ गयी तो अब हम शासन को प्राईवेट लिमिटेड की तरह क्यो न ट्रीट करे जिसमे हमारे मुल्क का हर नागरिक शेयर धारक हो और नेता उस कम्पनी के प्रबन्धक हो जो सबकी भागीदारी सुनश्चित कर उनके रोज़गार और नागरिकों की जिम्मेदारी सुनिश्चित करे! यथायोग्य सभी को काम मिले । जबकि इसकी जगह पर जनता को भड़काकर अभी भी क्रान्ति और परिवर्तन की बेहुदा बाते करते है ये नेता और पांच साल के लिये बेवकूफ़ बनाते है हमें। जब सत्ता में बैठा शासक मालिकाना हक रखता है मुल्क पर तो उसे नागरिकॊं के लिए अपनी जिम्मेदारी से क्यो मुह फ़ेर लेता है ।

मुझे तो जनता शब्द में राजतन्त्र की बू आती है और शासन जैसे शब्द में तानाशाही........................

आम सहभागिता सुनिश्चित हो और अनियोजित विकास बन्द हो! और भारत के सभी प्रान्तों के लोगों को एक ही मुख्यधारा में समाहित किया जाय!

Tuesday, November 10, 2009

हिन्दी को हिन्दुस्तानी बनाये !


Photo & Text by Krishna Kumar Mishra


हिन्दी को हिन्दुस्तानी बनाये


भाषा की लोकप्रियता के लिये उस भाषा का शब्दकोष और उस लिपि में लिखा गया ज्ञान इस बात के लिये उत्तरदायी होता है कि वह भाषा कितना राष्ट्रीयकृत या ग्लोबल होगी ।


अग्रेजों ने अपनी भाषा में संसार के सम्पूर्ण ज्ञान को समेटा और परोसा आज आप जिस मुल्क की सभ्यता, ज्ञान व विज्ञान की खिड़की खोलना चाहे खोल ले और देख ले उस देशकाल की परिस्थित बिना अटके और उलझे।
लेकिन हम वैश्विक स्तर की बात छोड़ दे तो हम अपने देश का ही साहित्य जो तमाम अन्य भारतीय भाषाओं में है उसे ही हिन्दी के रंग में नही रंग पाये। आप सोचिये मास्को प्रकाशन ने हमारे लोगो को रूस का बेहतरीन साहित्य पढ़ने का जो मौका दिया था वह सराहनीय है.रूसी का हिन्दी में सुन्दर अनुवाद !

नतीजा ये है कि हमारे लोग तमिल एवं उड़िया के उम्दा साहित्य व साहित्यकारो को नही जानते लेकिन यहां हर युवा पर लेनिन, टाल्स्टाय, गोर्की और दोस्तोविस्की की छाप पड़ी और साम्यवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार भी !

अग्रेजॊं ने हमारे संस्कृत, और अन्य क्षेत्रिय भाषाओं में लिखे प्राचीन ग्रन्थों का अनुवाद कर उन्हे सुरक्षित रखने का अपरोक्ष तौर से एहसान तो किया ही , और अपनी अग्रेजी भाषा को भारतीय जान से और अधिक ओत-प्रोत कर संमृद्ध कर लिया। नही तो हम...............
जब तक हम भाषा को समाज, देश की मुख्य धारा से नही जोड़ेगे तब तक हम इस बात का इल्जाम किसी पर थोप नही सकते कि फ़ला व्यक्ति या संस्था  ्हिन्दी को मान्यता नही दे रहा है ।
दिल्ली की गलियों से लेकर सिनेमा तक में बोली जाने वाली हिन्दुस्तानी जो पारसी, अरबी, तुर्की, अग्रेजी, अवधी, ब्रज, बुन्देली, व राजपूताना की भाषाओं का संगम थी वही सर्वमान्य हुई हमारे समाज में न कि क्लिष्ट संस्कृत प्रधान हिन्दी !

आज जब अग्रेजी का शब्दकोश दुनिया की तमाम भाषाओं के शब्दों से अमीर हो रहा है हम तब भी अपने क्षेत्रीय शब्दों को साहित्य में शामिल करने से गुरेज करते है।

शैव, नागा, ये दो शब्द दुनिया के प्राचीन भारतीय सम्प्रदाय के शब्द है किन्तु अग्रेजी शब्दकोष ने इन्हे अपनाया और अब जब कोई भारतीय बच्चा इन्हे विदेशी भाषा के शब्द कोष में पढ़ेगा तो क्या वह इन शब्दो को भारतीय मान सकेगा । नितान्त कमी है हमारे देश में एक बेहतर हिन्दी-शब्दकोश की जो प्रचलित हो और सर्वसुलभ हो

६० बरस बहुत होते है किसी देश की सरकार और वहां के निवासियों के लिये कुछ बेहतर करने के लिये । इस लिये कोई बहाना नही चलेगा!
सारे जहां के इल्म का हिन्दी में  तरजुमा  हो। इन्ही शुभकामनाओं के साथ

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारतवर्ष