Friday, June 20, 2008

एक मां और उसका मातृत्व


फोटो: अज़गर का अण्डा जिसमे से बच्चा निकल चुका है ।फोटो: लकड़ी के बक्शे में अज़गर के बच्चे ।
फोटो: लकड़ी के बक्शे में अज़गर के बच्चे ।
फ़ोटो: अज़गर का बच्चा |
फ़ोटो: २७/६/२००८ को अण्डों से अज़गर के बच्चे निकलना शुरू हुए। ७ जुलाई २००८ को इन नन्हे अज़गरो को बेलरायां के जंगलों में छोड़ दिया गया जहा़ं १७ जून २००८ को इनकी मां को छोड़ा गया था।


एक अज़गर मां की कहानी: कैपिटीविटी में पाइथन के अण्डों से निकले नन्हे अज़गर--------

अपडेट ३०/६/२००८ को "डी एफ़ ओ के के सिंह को अजगर के 2५ अण्डों को कृत्रिम इन्कुबेसन द्वारा २३ नन्हे अजगरों के जन्म में सफ़लता मिली------------"

१७ जून २००८ जालिम नगर पुल धौरहरा तह्सील जिला लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश भारत, मै अपने एक पत्रकार साथी की सूचना पर इस स्थान पर पहुंचा कुछ अन्य साथियों के साथ जिसमे एक जन्तुविज्ञान प्रवक्ता भी थे जो मेरे शोध में मेरे सुपरवाज़र भी है खबर ये थी कि एक अजगर () यहां पर तकरीबन एक महीने से मौजूद है और यहां के कुछ साधू इस जीव को शेषाअवतार बताकर रकम पैदा कर रहे है भोली भाली और हालातों से परेशान जनता से। मै भी चल दिया उस सर्प को लोगो के चुंगल से छुड़ाने के लिये मेरे उस मित्र ने तब तक उस स्थान का पता ठीक से नही बताया जब तक हम उस स्थान बिल्कुल करीब नही पहुंच गये शायद उसे डर था की हम सब कही अन्य पत्रकारों को सूचित न कर दे और उसकी एक्सक्लूजिव खबर सामान्य न हो जाये खैर हम सब जब उस पुल पर पहुन्चे जो बहराइच रोड पर विशाल घाघ्ररा नदी पर बनाया गया था उसके नीचे नदी के किनारे बा़ग लगी हुई थी और एक अर्धनिर्मित मन्दिर कुछ झोपडियां और एक हवन कुन्ड इन सब के अलावा कुछ महिलायें, पुरुष व बच्चे इधर उधर चहलकदमी कर रहे थे पुल काफी उंचाई पर था सो हम लोग एक उंची ढलान से धीरे धीरे नीचे की तरफ़ बडे फिर नहर विभाग द्वारा बनाई गयी सीढियों से हम घाघरा नदी के तट पर पहुंचे जहां यह भयंकर नदी उफ़नाती हुई अपने जल को एक पूरब दिशा में बहाये लिये जा रही थी हम लोगों की निगांहे उस अजगर को तलाश रही थी जिस लिये हम यहां आये थे, मैने देखा कि पुल के नीचे के भाग के एक किनारे पर एक कोठरी नुमा स्थान पर एक राम नामी लाल झंडा गड़ा हुआ है और एक युवक तिलक लगाये बैठा है जो आने जाने वालो से मुखातिब हो रहा है उस स्थान तक पक्की सीड़ियां थी मै उस ओर बड़ा और वहां पहुंच कर भौचक्का रह गया ये क्या एक अज़गर कुंडली मारे चुपचाप बैठा हुआ था और लोग उसके करीब आ जा रहे थे प्रसाद बांटा जा रहा था और दान दक्षिणा का दौर जारी था।
अज़गर को मनुष्य की मौजूदगी में इतना शान्त देखकर मै हतप्रभ हो गया किन्तु उस पर और अधिक गौर करने पर मै भाउक हो उठा क्यों कि उसकी सांसे उखड़ती हुई मालूम दे रही थी और उसके शरीर की खाल सिकुड़ सी गयी थी ऐसा लग रहा था जैसे यह अपने प्राण अभी त्यागने वाला है, मैने उस युवा पुजारी से पूछा की भाई यह सांप कितने दिनों से यहां पर है उसका जवाब था की तकरीबन डेढ़ महीने से यानी ४५ दिन और वह बोला की ये बाबा का अवतार है कुछ खाते पीते नही है कई बार दूध आदि दिया पर नही खाया ( उसे क्या मालूम कि सापं दूध नही पीते) लेकिन यहां पर एक बात बड़ी मजेदार है मेरे मित्र को जिन क्षेत्र वासियों ने यह बात बताई थी उन्होने कुछ दिन पहले एक राय व्यक्ति की थी कि इस सांप को चूहा या मुर्गा खिलाओ, यहां पर किन्तु उन्हें बड़ा अजीब जवाब भी मिला था जिसकी कोई काट मेरे पास भी नही है अबतक, साधू और अन्य व्यक्तीं बोले अरे बेवकूफ़ हो क्या बाबा कही मुर्गा-चूहा खायेगे !! तुम अवतार धारी बाबा का अपमान कर रहे हो।
अब मै उस सांप की दशा देख देख कर विचलित सा हो रहा था क्यो कि वह धीमी व झटके मे सांसें ले रहा था और उसका उदर पिचका हुआ था मुझे क्रोध भी आ रहा था कि ४५-५० दिनों का भूखा यह जीव इन अंधविश्वासियों के चक्कर में फ़सा है ! हां उस पुजारी ने एक बाबा का फोटो भी वही पर रख रक्खा था जो इस स्थान पर रहे थे और अपने चेलों को दीक्षित किया था अब उनकी समाधि यहां पर बनाई गयी है बाबा तस्वीर में हाथ उठाये हुए थे और उन्के पीछे क द्र्श्य किसी पहाड़ी इलाके का था जिसे कम्प्युटर से बनाय गया था किन्तु वह पुजारी बोला की बाबा शिमला में थे तब की यह तस्वीर है और वही इस सर्प के रूप मे अवतरित हुये है।
उस स्थान से मै नीचे आ गया हम सब को फ़ारेस्ट अफ़सर का इंतजार था उन्हे हम सब ने पहले ही सूचित कर दिया था सो अब हमें यहां समय गुजारना था तो यहां मौजूद एक भड़कीले अवघड़ टाइप के बाबा से भेट हुई जो अपने सर्प के रूप में अवतार ले चुके बाबा का असली शिष्य बता रहा था, वह कुछ सशंकित भी था हम सब को और हमारे बड़े बड़े कैमरों को देखकर किन्तु वह साथ में डींगें भी हांके जा रहा था जैसे की अब यह अज़गर यानी बाबा आकार मे बढ़ रहे है जब आये थे तो बहुत पतले थी और अगर यही रहा तो बाबा १०० फ़ुट ऊंचा पुल तोड़ कर ऊपर निकल जायेगे, फिर कुछ डर कर बोला मै किसी को नही डरता यह सांप पास के इलाके से आया है जो किसी दूसरे बाबा का इलाका है लोग कहते है कि उसने इस सांप पर मंत्र मार दिया है इस लिये ये चल फिर नही पा रहे है लेकिन हो सकता है किसी ने इनकी रीढ़ तोड़ दी हो आदि आदि मै उसके भय मिश्रित बयानों को महसूस कर रहा था।
तभी मैने देखा कि मेरा पत्रकार मित्र एक दूसरे बाबा से बातचीत कर रहा है उस अज़गर के निकट वह बाबा पूरे जोश में तड़क तड़क कर अजीब नाट्कीय मुद्राये करता कही जमीन पर लेट जाता तो कही अचानक उठ खड़ा होता हो भी क्यो ना क्योकि उसके सामने कैमरा लगा हुआ था उसे टेलीविज़न पर दिखाया जाना है।
अब डी एफ़ ओ नार्थ खीरी आ चुके थे इस डिवीजन के सबसे आला अफ़सर किन्तु उनके साथ कोइ स्टाफ नही था सिवाय उनके दो छोटे बच्चो के एक बेटी व एक बेटा जो निडर थे "शायद एक फ़ारेस्ट अफ़सर के घर जन्म लेने कि वजह से वह वन्य जीवों के प्रति जागरूक थे", वह स्टाफ को फोनकर चुके थे पर काफी देर बाद वनकर्मी वहा पहुंचे अब शुरू होता है ओपरेशन रेस्क्यू पाईथन यानी अज़गर की तस्वीरे ली गयी और इसे यहां से उठाने के लिये कहां गया बाबाओ को अबतक पता चल चुका था और ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया था बाबाओ ने अपनी पूजा की थाली और अन्य सामग्री उठा ली थी किन्तु वहा से जाने से पहले उस तड़क तड़क कर इंटरव्यु दे रहे बाबा ने अज़गर से ऐसे बात की जैसे वह इसकी बातें सुन सकता हो शायद बाबा का यह आखिरी नाटक हो या फिर आमदनी का जरिया चले जाने का लोभ, या फिर ५० दिन साथ बिताने का प्रेम !! जो बिछड़ने के भय से उत्पन्न दुख का कारण बन रहा हो मै उपरोक्त बातों मे क्य सच है यह ठीक ठीक नही कह सकता क्यो कि यह द्र्श्य बड़ा ही ह्र्दय स्पर्शी था !
अब माजरा बिल्कुल अलग था स्टाफ तो था किन्तु निहत्था यानी रस्सी, बोरियां, आदि आदि जो भी इस अज़गर को पकड़ने में काम आता वह कुछ भी नही अखिरकार डिप्टी रेन्जर ने साहब का गुस्सा भांप कर अपने गले में पड़ी तौलिया ही फाड़ डाली ताकि इससे रस्सी का बिकल्प हो सके फिर एक बोरी कही से आयी और अज़गर को पकड़ने का अभियान शुरू किन्तु इस अज़गर के नज़दीक जाने को कोइ तैयार नही हो रहा था वन कर्मी तो साहब के बुलाने पर भी नज़दीक आने से डर रहे थे अब तक सांप को भी यह महसूस हो चुका था कि मसला गम्भीर है सो वह भी अपना उठा कर इधर उधर जहं भी चहल कदमी हो रही थी अपना फ़न उठा कर देखने लगा था यह देखकर बड़ा अजीब लग रहा था कि वनकर्मी साहब के डर से आ तो रहे थे पर सांप दूर दूर से और कांपते हुए मै वही सांप के पास खड़ा ये सब देखे जा रहा था तब मैने मसविरा दिया कि पब्लिक के लोगो को बुला लिया जाय वो ज्यादा बेहतर मदद कर सकते है क्यो कि अभी तक वह बाबा के साथ इस सर्प के नजदीक से दर्शन करते आये है और अशिर्वाद भी लिया है इस लिये उन में मैने भय नही देखा है साहब ने पुब्लिक को आवाज़ लगायी कुछ लोग बिना किसी संकोच व भय के मदद के लिये आ खड़े हुये, अब बात आयी की इस सांप पर बोरा कौन डालेगा प्लान ये था कि बोरे को पलट कर उस अज़गर को ढक लिया जाये और यह सांप अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप बोरी में अपने आप घुसता चला जायेगा फिर बोरे के मुंह को रस्सी से बाम्ध दिया जायेगा ऐसा ही हुआ किंतु बड़ी मशक्कतों के बाद डी एफ़ ओ सहब तस्वीरें लेने में व्यस्त थे और कर्मचारी डर के मारे कांप रहे थे यहां मैने नाटकीय ढग से उन सब का हौसला बढ़ाते हुए आगे बढा और बोरी को पकड़ कर उन के काम में मदद करने की कोशिस करने लगा ताकि उनका डर समाप्त हो जाये पुब्लिक के लोग अपना काम बिना डरे हुए डी एफ़ ओ के निर्देर्शो का अनुपालन कर रहे थे जैसे ही बोरे में अज़गर ने अपन फ़न उठाया तो उसका धड़ उपर की तरफ़ उठा तो वहां करीब २५-३० अण्डें दिखाई दिये (यहां पर एक बात महत्वपूर्ण है हमारे साथ आये जन्तुविज्ञानी व वन्य जीव विशेषज्ञ ने कहा था कि अज़गर में पैरेन्टल केयर नही होता यानी ये सांप बच्चो की देखभाल नही करते लेकिन ३०-३५ अण्डों को अपने शरीर से ढके यह अज़गर मां ने उनके ज्ञान पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया, आगे हम सब एक जंगल से बाहर निकल कर भटक आये चीतल जिस के खाल पर सफ़ेद चित्तिया होती है उसे देखने गये जो वन विभाग की रेन्ज पर था जिसके सीघ घायल थे और वन विभाग ने उसका इलाज़ कराया था को देककर इन्होने कहा कि यह हाग डीयर का क्रास ब्रीड है यह बात भी हम किसी के गले से नही उतरी ) अब सब अवाक रह गये क्यो कि इसकी किसी को कोई आशा नही थी, मैने भी अपने जीवन में पहली बार किसी अज़गर के य यूं कह ले कि सर्प के अण्डें देखे थे सफ़ेद मटमैले रंग के ये अण्डें आपस में चिपके हुए थे ये अण्डे चिड़ियों के अण्डों की तरह कठोर व गोलाकार नही थे बल्कि पिचके व रबड की तरह थे ये मेरे जीवन का एक और नवीन अनुभव था। अण्डों को देखकर मैने डी एफ़ ओ से कहां कि अब आप इस अज़गर को यही छोड़ दे और इसे गार्ड करने के लिये किसी को तैनात कर दे साथ ही यहां के लोगो के हिदायत भी दे कि कोई इसे नुकसान न पहुचाने पाये वैसे भी ये लोग पूजा पाठ के अलावा इस अज़गर को कोइ नुकसान नही पहुंचा रहे है किन्तु उन्होने हमारी बात नही मानी और अण्डों को भी एक डलिया में रखवा लिया साथ ही अपने मतहतों को आदेश दिया की इस अज़गर को रामनगर बीट के जंगलों में( निघासन तहसील) जो इस स्थान से लगभग १५० कि०मी० है में छुड़वा दिया जाय और अण्डों को अपनें आवास लखीमपुर ले चलने का हुक्म दिया जो इस स्थान से लगभग ७० कि०मी० है ये दोनो बाते मेरी कतई समझ में नही आयी क्यो कि अज़गर वन्य जीव अधिनियम के अन्तर्गत सेड्यूल वन का जीव है जिसके तहत इसके सरक्षण का प्राविधान है साथ ही यह एक एन्डैजर्ड (विलुप्त होती प्राजाति) स्पेसीज है यह उसी श्रेणी में रखा गया है जिसमे बाघ तेन्दुआ हाथी आदि है अब इस महत्वपूर्ण प्रजाति के ये ३०-३५ अण्डे जो कल को एक खूबसूरत अज़गर मे विकसित होने वाले थे का अस्तित्व खतरे मे था कारण ये कि लखीमपुर जनपद में न तो कोई रेस्क्यू सेंटर है और न ही रेप्टाइल्स का प्रजनन केंद्र यहां तक कि कोइ वेट्नरी डाक्टर भी नही है जिसे वन्य जीवो के बारे में कोइ ज्ञान हो ऐसे में डी एफ़ ओ साहब कैसे इन अपरिपक्व अण्डों से अज़गर के बच्चों को विकसित कर लेगे यह एक सवाल है? साहब का प्लान ये है कि अब एक लकड़ी के बक्से में इन अण्डों को रखा जायेगा और गर्मी के लिये जो इन अण्डों को अपनी मां के शरीर से प्रप्त हो रही थी उसके विकल्प में दो बिजली के बल्ब उसी बक्से में लगाये जायेगे, मैने इस पर भी अपत्ति दर्ज़ कराई बिना किसी खास अनुभव के कि श्रीमन क्या बल्ब की रोशनी इन अण्डों को नुकशान नही पहुंचायेगी क्योकि जहांतक तापमान का सवाल है ठीक है शायद बल्ब को आप विकल्प बना सके पर अण्डों को जो अंधेरे मे इन्कुवेट (सेये जा रहे थे) हो रहे थे अज़गर द्वारा तो क्या बल्ब की रोशनी उन्हे नुकसान नही पहुंचा सकती उन्होने हमारी बात को समान्य तरीके से टाल दिया और मुझे भी बहुत अनुभव न होने के कारण मैने कोइ बहस करना उचित नही समझा।लेकिन मै कुछ नही कर सकता था।
अब यहां यहां पर मै एक अलग मुद्दे पर कुछ कहना चांहूगा वह मुद्दा है मातृत्व का, इसे ईश्वर का वरदान कहे या प्रकृति द्वारा हमारे जीवनद्रव (जीन) मे फ़ीड किया हुआ पूर्वनिश्चित सूचनाओं का डाटा इसे जीवनविज्ञान में हम इंस्टिक्ट भी कह सकते है प्रकृति हमे सब कुछ सिखा कर भेजती है और हम उसी केर अनुरूप कार्य करते है किन्तु मानव ने अपने आप को प्रकृति द्वारा बताई गयी बातों से अलग हट कर कार्य करने की क्षमता विकसित कर ली जिसका नतीजा बहुत बेहतर नही है…………………………………..
जब मै किसी भैस को अपने बच्चे के पीछ पीछे दौड़ते देखता हूं तो मेरे मन में अजीब सी अनुभूति होती है चूंकि मै गांव का रहने वाला हूं तो यह द्र्श्य मेरे सामने अक्सर आता है गांवों में गाय या भैस जब दुधारू होती है तब उसकी खरीद फ़रोख्त ज्यादा होती है जाहिर है दूध देने वाली गाय या भैस का नवजात शिशु होगा और खरीदने वाला जब भैस खरीद कर अपने घर ले जाता है तो उसका सामान्य तरीका होता है जानवर के बच्चे को टोकरी मे बिठा कर साइकिल या बैलगाड़ी में रखकर ले जाता है और भैस अपने बच्चे के मोह में अपने पूर्व मालिक जहां उसने न जाने कितने वर्ष बिताये हो को छोड़ कर अपने बच्चे के पीछे पीछे चल देती है जब साइकिल या अन्य वाहन जिसमे उसकी संतान होती है तेज गति से चलती है तो वह भैस भी उसी रफ़्तार से दौड़ने लगती दौड़ते उसके मुंह से झाग तक आने लगता और वह बेहाल होने लगती पर फ़िर भी वह थक कर भी वह नही थकती क्यो कि वह मां है और मां का अपने पुत्र के प्रति स्नेह संसार में सर्वश्रेस्ठ और अर्वणनीय है जिसे शब्दों से बखान करना मुश्किल है ऐसे तमाम उदाहरण है जिन्हे आप सब ने कभी न कभी महसूस किया होगा। अब आप कल्पना करिये कि जिस सर्प मां यानी उस मादा अज़गर को उसके अपरिपक्व बच्चों से अलग कर दिया गया हो जिन्हों ने अभी इस दुनिया में अपनी आखें भी ना खोली हो जिनके पैदा होने के इंतजार में वह मां ५० दिनों से बिना कुछ खाये पिये हिले डुले एक ही स्थान पर बैठी हो भूख से बेहाल जिसकी सांसें मानो थमने को हो पर वह अपने अण्डों से निकलने वाली संतानों के इंतजार में चुपचाप सबकुछ झेल रही हो यहां तक कि तमाम ढोंगी बाबाओं के नाटकीय क्रियाकलाप और वहां आती भीड़ को पर वह अण्डों के ऊपर से कभी नही उठती, कही कोई इन्हें देख न ले या कोई इन अण्डों को हानि न पहुचा दे शायद इन्ही सब वजहो से ये जंगली जीव सब कुछ सहता रहा जबकि यह ताकतवर सांप जो हिरन जैसे जीव को जिंदा निगलजाये जिसे आदम की आहट से ही सतर्क हो जाने और हमलाकर देने की तैयारी कर लेने की आदत हो वह मां थी इस लिये सब कुछ सहती रही उसने अपनी समझ में तो पुल के नीचे एक सुरक्षित स्थान चुना था अपनी सतंति के लिये जहां न तो धूप आ सकती थी और न ही बरसात पर मनुष्य ने उसे वहां भी डूढ लिया और वह ५० दिनों तक सहती रही यह अप्रत्यासित कृत्य!
किन्तु अन्त तो बहुत ही बुरा हुआ कम से कम ढोगी बाबाओ ने उसे उसके अण्डों से तो अलग नही किया शायद कुछ दिनों बाद अण्डों से बच्चे निकल आते और वह वहां से चली जाती ५० -६० दिनों के कष्ट के पश्चात उसे सुख की अनुभूति होती किन्तु ऐसा नही हुआ उसे उसके पैदा होने वाले बच्चों से अलग कर दिया गया या दूसरे चिरपरिचित वाक्यों में कहें तो उसकी संतान को गर्भ में ही मार दिया गया उस जानवर की मनोदशा क्या होगी? जिसे उसके बच्चो से १५० कि०मी० दूर अनजानें जंगल मे छोड़दिया गया………………………………….
क्या ऐसा नही हो सकता था कि उसे उसी स्थान पर उसके अण्डों के साथ छोड़ दिया जाता और समय पर निगरानी रखी जाती जब तक उसके अण्डों से बच्चे न निकल आते?
क्या उसे यदि उस स्थान से हटा देना जरूरी हो गया था तो किसी दूसरे स्थान पर उसे अण्डों के साथ नही छोड़ा जा सकता था ताकि वह अपने बच्चो को से सके?
क्या यह वन्य जीव अधिनियम के कानून का उलघ्घंन नही है कि किसी जन्तु को जब वह ब्रीडिगं कर रहा हो तो उसके घोसलें को उजाड़ दिया गया हो उसके अण्डे उठा ले जाये गये हो क्या इसे ही वन्य जीव सरंक्षण कहते है?
यदि वह मादा अज़गर मर चुकी होती तो मै मान सकता हूं कि अण्डों को वैकल्पिक तरीके से सेया (इन्कुबेट) जा सकता था।
मुझे इस बात का अफ़सोस सदैव रहेगा कि मै भी उन सरकारी लोगो के इस कृत्य में शामिल था, मुझे अपने इन हालातो पर एक बात याद आती है
आये तो हरि भजन को ओटन लगे कपास……………………!!!

नोट: यदि इन अण्डों से सफलता पूर्वक बच्चे निकल सके तो उनके आगे जीवित रहने की संभावनायें न के बराबर होगी पर फिर यदि यह ब्रीडिंग सफ़ल रही तो मेरे लिये बड़ी खुसी की बात होगी। और मै आप सब को सूचित भी करूगां



कृष्ण कुमार मिश्र
७७ शिव कालोनी लखीमपुर खेरी-२६२७०१
उत्तर प्रदेश भारत
सेलुलर : ९४५१९२५९९७

1 comment:

प्रभाकर पाण्डेय said...

रोचक। बहुत ही उपयोगी एवं तार्किक लेख। सादर आभार। लिखते रहें।