Friday, April 25, 2008

एक और तेन्दुये की मौत का इन्तज़ाम कर रहा है वन विभाग




आज यानि २९ अप्रिल २००८ की सुबह से ही वन विभाग धौरहरा तह्सील के चौरा गांव में एक पुरानी बा़ग में तेन्दुये को घेर रखा है और उसे मारने की सभी कवायदें जा्री है सूत्र बताते है कि इनके पास बेहोसी की बन्दूक है पर दवा नही है तेन्दुये का क्या होना है यह भी स्पष्ट नही है पर आखिर में उसे मार देने का इरादा बना चुका वन विभाग अपनी संगीनें उस जन्वर पर ताने हुए है जो इस इलाके में तकरीबन ५ महीनें से है और अभी तक इसने ऐसी कोइ हरकत नही की जिससे यह वैग्यानिक आधार पर पुष्टि होती हो कि यह नरभक्षी है क्यो की ५ महीनों में यहां ग्रामीणों द्वारा दो तेन्दुयें और उनके बच्चे भी देखे गये साथ ही में एक बाघ की मौजूदगी की भी पुष्टि हुई है ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि दोषी कौन है? फिर अगर सभी घटी हुई चार घटनाओं पर नज़र दौड़ाये तो यह भी स्पष्ट होता है की इन ५ महीनों में जो चार मनव मौते हुई वह मात्र एक्सीडेंट थे क्यो की ये चारों मानव या तो बैठे हुए थे फिर जानवर की सी मुद्रा में थे फिर अगर ये जीव नर-भक्षी होते तो अभी तक ना जाने कितने लोगो का शिकार कर चुके होते और बाकायदा मनुष्य के मांस का भक्षण भी करते पर ऐसा नही हुआ बल्कि ये भूखे जीवों ने सियारों और कुत्तों को खाकर इन ५ महीनों तक अपनी भूख मिटाई क्यो कि यहां के जंगलों में इन मांसाहारी जानवरों का शिकार मनुष्य चट कर चुका है !! पूरे भारत में अगर बाघ व तेन्दुये द्वारा हुई मानव भक्षण की घटनाओं पर दृष्टि डालें तो नतीज़ सामने यह आता है की सभी मौते गरीब तबके के लोगों की होती है क्यो कि उनके घरों में दरवाज़े नही होते है और न ही चारदिवारी और न ही वह मोटर कारों से सफ़र करते है .......साथ ही उन्हे रात मे भी अमीरों के खेतों में काम करना पड़ता है बिना किसी सुरक्षा इन्तज़ामों के नतीजतन जानें उनकी ही जाती है और एक पुरानी कहावत भी हमारे भारत में कि " गरीब की जान सस्ती होती है" और यही वज़ह है कि इनकी मौतों पर सरकारी अमला भी जल्द ध्यान नही देता जब मीडिया शोर मचाता है और लोगों का दबाव बढता है तब तक देर हो चुकी होती है और ये सरकारी लोग बिना कुछ और प्रयास किये एक ही आसान विकल्प पर अमादा हो जाते है कि अब तो यह जानवर नर भक्षी हो गया है इसे तो मारना ही पड़ेगा......................आखिर ऐसा क्यो अगर हम पहले ही कुछ सोच ले तो शायद मनुष्य और जानवर दोनों ही बच सके।
ने आज यह विशाल वनों का जीव एक छोटे से बाग में वन-विभाग की संगीनों के ्साये में है किस वक्त उसकी एक आहट पर ढेर सारा बारूद उस जानवर के जिस्म में पैबस्त हो जायेगा................. और एक खूबसूरत और निरीह जीव इस धरती से विदा कभी जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ इनका ही राज था हम तो बहुत बाद में आये तब तो इन जानवरों हमारा कोई विरोध नही किया था और आज हम चाहते है कि सिर्फ़ हम ही इस धरती के मालिक है और हमारे सिवा यहां किसी का कोइ हक़ नही !!

अप्रिल २४ २००८ को लखीमपुर खीरी की धौरहरा तहसील में दो दो मानव मौतें हुई जिनका कारण एक तेन्दुआ है जो इस इलाकें में तकरीबन पिछले पांच महीनों से भटक रहा है बीच बी़च में एक बाघ की मौजूदिगी की पुष्टि होती रही है
मानव आबादी में ये जानवर अक्सर आ जाते है वजह साफ़ है कि जंगलों में अब इन जानवरों के खानें के लिये कुछ नही बचा और जंगलों की अवैध कटाई से इनके आवास भी नष्ट हो रहे है नतीज़ा ये है कि भोजन की तलाश में ये निरीह जीव मानव आबादी में आ जाते है और वहां इनका अनजानें में किसी न किसी मानव से टकराव होता है और यही से शुरू हो जाता है मनुष्य और जनवर के बीच संघर्ष और अन्ततोगत्वा ये जीव मौत के घाट उतार दिये जाते है नर भक्षी का तमगा पहनाकर.........!!!!
खीरी जनपद में सन २००५ की गणना के मुताबिक यहां सिर्फ़ सात तेन्दुये है किन्तु २००५ में एक तेन्दुआ वन विभाग ने नर-भक्षी घोषित कर मार दिया। अब हम ये कह सकते है कि हमारे खीरी के वनों में मात्र आधा दर्जन तेन्दुयें ही बचे है क्यो कि सड़क दुर्घटनाओं या फिर बड़े परभक्षियों द्वारा मार दिये गये। मानव की बढ़्ती आबादी वनों में आदम की आमद अवैध शिकार खासतौर पर इन बाघों व तेन्दुओं के शिकार यानी हिरन आदि ..........की वजह से अब ये जानवर आबादी में आने पर मजबूर हो जाते है पर यहां भी कुछ नही छोड़ा इस मानव प्रजाति ने क्योकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और विकास के इतने दावों के बाद भी यहां की ६०-७० फ़ीसदी आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है चाहे भोजन हो या फिर उर्जा के लिये लगातार प्रकृति का दोहन जारी है खेती का बदलता ढ़ाचा, अब इन जीवों के लिये यहां रहना दूभर हो गया है पहले इन जंगली जीवों को मानव आबादी में भी खरगोश जैसे जीव मिल जाते थे पर मनुष्य ने इनका भी शिकार कर कर इन्हे समाप्त कर चुका है जहां देखों वहां मानव और घटते प्रकृतिक संसाधन....................॥ कभी जंगली जीव और मनुष्य एक साथ रह लेते थे बिना किसी तकराव के!
खैर उत्तर प्रदेश का वन विभाग पिछली घटनाओं की तरह इस बार भी इस भूखे और भटके तेन्दुये द्वारा मारे जा रहे मनुष्यों का मुआवजा देने के अलावा कुछ नही किया है और इनज़ार करता रहा की कब राजनैतिक और पब्लिक का दवाव बढ़े और इसे नर-भक्षी करार कर इसे मार दिया जाय ताकि न रहे बांस और ना बजे बान्सुरी।
हालांकि इस बार भी वो सब नाटक हुए जो हमेशा होते है बेहोशी देने वाला डाक्टर बुलाया गया, पिंजरे रखे गये आदि आदि फिर संसाधनों की कमी का रोना रोकर बैठ जाना...................!!! अब इस तरह की चार महीने से हो रही घटनाओं के बाद आखिरी रास्ता तेन्दुये को नर-भक्षी बता कर मार दिया जाये।
अब आप बताइये कि इन भूखे और भटके हुए जीवों को नर-भक्षी कौन बना रहा है?
आप सब को ये बताने का मेरा एक उदेश्य है कि इस जीव को बेहोश कर जंगल में दोबारा भेज दिया जाये ताकि विलुप्त हो रही यह प्रजाति शायद बचायी जा सके!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
९४५१९२५९९७

Wednesday, April 23, 2008

प्रकृति की मार से छिन्न होती मानवता

किसी ने कहा है कि थर्ड वर्ल्ड वार पानी के लिये होगा तो यह बात बुन्देलखंड़ के हालातों में साफ़ परिलक्षित होती है

बुन्देलखन्ड जहां आदमजात अनियोजित विकास कि मार झेलने के लिये विबश है और सरकार राहत के नाम पर कुछ कर पाने में करीब करीब बेबश.................नतीजा मवेशी सडकों पर पानी के बिना दम तोड़ रहे है और आदमी घर बैठ कर ये सोच रहा है कि खाना और पानी लाया जाये तो कहां से............यहां लोगों ने अपने मवेसियों को बेदर कर दिय है ताकि ये जीव कही भूख और प्यास के मारे इन्के दरवाजों पर दम न तोड़ दे लेकिन यसे हालात में मौत तो निश्चित है ये मवेशी अब सड़्को पर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे है जमीन की छाती फट चुकी है अब इस वसुधा मां के पास कुछ नही बचा क्योकि हमनें इस मां की छाती नोच नोच कर दूध की आखिरी बून्द तक निकाल ली!!!!!!!!!!
चारों तरफ़ दरारे और सूख चुकी कटीली झाड़िया ही शेष है और दर्दनाक तथ्य ये है कि भूख से तड़पते जानवर इन कांटों को खा कर भूख मिटाने की नाकाम कोशिश कर रहे मैं बड़े यकीन से कह सकता हूं कि यदि आप में संवेदना का एक भी अंश मात्र है तो यह सब देख कर आप की छाती जरूर फ़ट जायेगी।
मेरे एक मित्र है अभिषेक दीक्षित जो रिलायशं कम्पनी मे अधिकारी है और बुन्देलखडं मे ही तैनात है और वे रोज मुझसे टेलफोन पर बात कर यही बताते है कि आज वह कौन से गांव में है और वहा मानवता पानी के बिना कैसे तार तार हो रही है आज उन्होंने हमीरपुर के पौथियां गांव के प्रेमशंकर से बात करवायी जो हार्टीकल्चर डेपार्ट्मेन्ट में कार्यरत है उनकी पीड़ा से सरोबार आवाज़ सुनने के बाद बस एक ही शब्द मेरे मुख़ से स्फ़ुटित हो सका---हे भगवान..........उन्होंने बताया कि बेतवा में सिर्फ़ एक फ़ुट पानी व यमुना में दो फ़ूट पानी बचा है जिसकी वजह मानव द्वारा लगातार प्रकृति का दोहन तो है ही किन्तु यहां कुछ और बात भी है बचा हुआ पानी भी लगातार अवैध उत्खनन से जमीन में धसता जा रहा है क्योकि जमुना से बालू और बेतवा से मौरंग भारत के विभिन्न हिस्सों मे भेजी जाती है और यह व्यापार जीवों की लाशों पर बद्स्तूर जारी है बिना रुके.......................................................

बेतवा मे २५ फ़ुट गहरायी तक मौरंग का उत्खनन किया जा रहा है मै नही जानता कानून क्या कह्ता है पर प्रेमशंकर के मुताबिक बेतवा का पानी इस उत्खनन से और नीचे जा रहा है और यह कहते हुए प्रेमशंकर की आवाज़ भर्रा गयी जैसे किसी कि कोइ प्रिय वस्तु य सगा सबंधी उससे दूर जा रहा हो वही दर्द था उनकी आवाज़ में.........आखिर यहां तो ये पानी की एक एक बूंद जीवों की खत्म होती सांसों का सहारा है।
वहां के लोगो का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो लोगों को यहा से विस्थापित करना पडेंगा और कोइ विकल्प नही है पर जब पूरी धरती को हम ऐसा कर देगें तो आखिर में कहां जायेगें......................???

तमाम बाते है पर मेरे पास उन परिवारों और उन बेसहारा जनवरों के हालातों को बयान करने के लिये माकूल शब्द नही है कि कैसे वें इस अकाल से जूझ रहे है आप खुद ही समझ लीजियेगा.................................!!!

भारत की विभिन्न भोगोलिक स्थितियां और यहां का बदलता मौसम तो सदियों से है पर आदमी खुश नही तो दुखी भी नही था लेकिन आज जो भी येह हो रहा है सब मानवजनित समस्यायें है और इनका निदान भी मनुश्य के पास है केवल वह प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन करना छोड़ दे और अपने इस बिना सोचे समझे अनियोजित विकास पर लगाम कस ले बहुत कुछ इतना करने से ही नियन्त्रित हो सकता है। इसका एक उदाहरण है मेरे पास ७०-८० के दशक मे जो लोग यह कह रहे थे कि खादों, कीटनाशक रसायनों, और संकर बीजो का प्रयोग करो आज वही यह कह रहे है कि इस सब को बंद करो नही तो जमीन अनुउपयोगी हो जायेगी इसका कारण तो समझ ही चुके होगें आप कि हमें ये पता हि नही होता है कि हमें क्या करना चाहिये और क्या नही बस कोई विदेशी कम्पनी ने कुछ लालच दिखाया और कुछ विदेशी दबाव और हम शुरू हो गये विकास कि बेनतीजा दौड़ में............खैर..................

आप को बताना चाहूंगा कि खीरी जनपद में १०० से आधिक गांव आग में जल चुके है और यहा एक भीषण त्राशदी ने जन्म ले लिया है मनुष्य जानवर फ़सल पेड़ पौधें सभी कुछ जलकर राख हो चुका है मेरी समझ मे एक बात आती है खीरी जहां कभी जमीन पानी कि वज़ह से गीी हि रहती थी चरो तरफ़ हरियाली कीचड़ पानी से डबडबायी नदियां, तालाब, पोखर, और कुयें इस बात को बहुत ज्यादा दिन नही हुये करीब पिछले २० साल पहले की ही बात है किन्तु आज जहां पानी का इतना भराव रहता था कि कहते है हाथी भी डूब जाये आज वहां रेत उड़ती है तालाब, नदियां कुयें सभी कुछ सूख चुका है पे्ड़ों की जगह मकान, कारखानें और कृषि भूमि ने ले ली नतीजा सामने है मैने अपनी दादी से सुना है कि अक्सर हमारे गांव मे आग लग जाती ्थी पर सब गांव वाले कुओं और तालाबों से पानी ला ला कर आग पर फ़ौरन काबू पा लेते थे पर क्या अब हैंड पम्प से बाल्टी भरभर कर आग की आसमान छूती लपटों को बस मे किया जा सकता है.................................................
चलो प्रकृति मां को एक बार फ़िर से सवांरें तभी मानव इस धरती पर अपना अस्तित्व बचा सकता है -एक चेतावनी.....................

कृष्ण कुमार मिश्र
९४५१९२५९९७

Tuesday, April 1, 2008

महात्मा गांधी और आज का भारत- गांधी को मारने की एक और कोशिश


और आज .....................३१ जनवरी 2008
===१२ फ़रवरी १९४८ बापू के नाम सारा देश === ...............................

भारत कि एक शर्मनाक घटना जिसे भुलाया नही जा सकता - बापू (बापू तो हमारे है ) नही राष्ट्र पिता कि देह भस्म विसर्जन और भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्र पति कि नामौजूदगी ऐसा सिर्फ़ शायद भारत में हो सकता है क्यो कि जिस महामानव कि बदौलत हमें तख्तो ताज मिला हम उसे ही नज़रंदाज़ करने की बेवकूफाना हरकत कर रहे है अरे उस दिन तो राष्ट्रीय दिवस की तरह पूरे भारत को उस महा मानव की पवित्र देह भस्म के विसर्जन मे हिस्सा लेना था जैसे हमारे पुरखो ने सन १८४८ में किया था महात्मा लोगो के दिलो में बसते है उन्हें किशी खिताब की जरूरत नही पर अगर भारत सरकार उन्हें राष्ट्र पिता मानती है और उनके नाम का सिक्का चलवाती है तो उसे यह मालूम होना चाहिए की राष्ट्र पिता के अन्तिम भौतिक अंश यानी देह भस्म विसर्जन को किस तरह आयोजित करना चाहिए.........क्या पंडित नेहरू, सरदार पटेल होते तो ऐसा होता यहा तक की कांग्रेस जो गांधी के नाम पर राजनैतिक लाभ लेती आयी है उस पार्टी का अध्यक्ष वहा मौजूद था मेरा मतलब हुकुमों से है या फिर सबने सभ्यता का दामन छोड़ दिया है .या फिर आफत में ही बापू याद आते है या फिर वोटों के लिए बापू..........अरे कब तक भुनाते रहोगे बापू को.............क्या रूस में लेनिन के साथ या चीन में माओ के साथ ऐसा होता (मान लेते है की वहा भी देह भस्म विसर्जन किया जाता तब ) मेरे मुताबिक तो उस रोज़ भारत में सरकारी उत्सव के तौर पर एक माहौल बनाना चाहिए था ताकि ने पीढी में एक संदेश जाता बापू के आदर्शों का उनकी प्रासिंगकता और मजबूत होती यहाँ एक उदाहरण देना चाहूँगा की एक व्यवसायिक फ़िल्म ने गांधीगिरी को हमारें आज के समाज में जिस तरह स्थापित किया उसका कोई जवाब नही है यदि सरकार उस रोज आल इंडिया रेडियो से बापू के प्रिया भजनों गीतों बापू की आवाज को पूरे दिन ब्राडकास्ट करती टेलीविजन पर दिन भर बापू को दिखाया जाता तो हमारे समाज में यकीनन बापू की प्रासिंगकता बढ़ती और पूरा देश लाभान्वित होता खासतौर पर युवा पीढी पर टेलीविजन पर अपराध सी दी कांड रैप कांड और नर्तकियों के अर्धनग्न जिस्म दिखानें से ही फुर्शत नही बापू का मान बापू के असूलों को समाज में स्थापित करने की चिंता किसे !! वह समाज सबसे गरीब है जिसका कोई गौरवशाली इतिहास नही है और हम अपने इस संघर्षशील अतीत को भुलाने पर तुले है जब दुनिया के तमाम मुल्क अपने अतीत को दुहराने में संघर्सरत है जब समाज को दिशा देने की अवाश्यक्ताए मालूम होगी और हम इतिहास के पन्नों से लक्ष्मी बाई राणा प्रताप गांधी सुभाष को खोजें गे तो वह सब मिलेंगें जरूर पर समाज में उनकी प्रासिंगकता समाप्त हो चुकी होगी तब हम क्या बच्चों को सदी का नायक किसी नर्तक को या फिर नर्तिका को या फिर विदेशी धनी व्यक्तियों के नाम बताएँगे जिन्हें हमारे युवा बहुत ढंग से जानते होंगे और इन नामों के सहारे क्या हम इन १०० करोड़ भारतीयों को किसी लक्ष्य की तरफ़ उन्मुख कर पायेंगे नही विल्कुल नही तब तक हमारी पीढी अमेरिकन कम्पनियों की गुलाम हो चुकी होगी वह सिर्फ़ कॉल सेंटर या फिर विदेशी वस्तुवों के नाम जानते होंगे भारतीयता का तड़का समाप्त हो चुका होगा .................

आजादी के ६० वर्षों के उपरांत मोहनदास करमचंद गांधी यानी अपने बापू की अन्तिम भौतिक निशानी यानी उनके शरीर की भस्म जो अभी तक दुबई में बसे एक भारतीय व्यवसायी भरत नारायण के पास थी उन्होनें इसे मणि भवन गांधी संग्रहालय मुम्बई को दे दिया किंतु तुषार गांधी, महात्मा गांधी के पोते को ऐसा लगा की भविष्य में राजनैतिक दल इसका फायदा उठा सकते है या फिर बापू के भक्त उस स्थल को जहाँ बापू के शरीर की भस्म रक्खी है को पवित्र धार्मिक स्थान में परवर्तित की जा सकते है जबकि बापू एक धार्मिक हिंदू परिवार से थे और धर्म की परम्परा यह कहती है की मृत देह को अग्नि देने के बाद बची अस्थिया व राख को पवित्र नदी खासतौर से गंगा में प्रवाहित किया जाना चाहिए इसी विचारधारा से उन्होंने सन १९९७ में एक प्राइवेट बैंक में रक्खी बापू की देह भस्म को कोर्ट द्वारा प्राप्त कर प्रयाग में संगम में विसर्जित कर दिया था अब यदि कही बापू की देह भस्म बची है टू वह स्थान है पुणे के आगा खान के महल में जहाँ बापू १९४२ से १९४४ तक राजनैतिक बंदी के तौर पर रहे थे और दूसरा स्थान है कैलीफोर्निया के लोस अन्जेल्स शहर में योगेन्द्र आश्रम जहाँ बापू की देह भस्म मौजूद है पर ना जाने कितने घरों मी बापू होंगें कौन जाने उन आजादी के दीवानों में किस किस नें अपने महानायक की देह भस्म को उनकी निशानी के रूप में रख रक्खा हो !!

३० जनवरी १९४८ जब बापू भौतिक रूप से हमसे अलग हुए और उसके १४ दिनों बाद १२ फरवरी १९४८ जब बापू की देह भस्म को हिंदू धार्मिक परम्पराओं के अनुसार और हवाई जहाजों से हिंद्माहसागर से लेकर भारत वर्ष की सभी नदियों में विसर्जित किया गया इन १४ दिनों तक पूरी दुनिया शोकाकुल थी दुनिया के सभी मुल्कों के राष्ट्र अध्यक्षों ने शताब्दी के इस महानायक की मृत्यु पर शोक प्रगट किया बल्कि पूरी मानव आबादी में एक शोकलहर व्याप्त थी
हुआजिस साम्राज्य की जड़े गांधी ने हिला दी उस साम्राज्य को भी गांधी की नामौजूदगी का दुःख हुआ भारतीयों को ही नही वरन ब्रिटिश अमेरिकन रुस्सियन सभी हतप्रभ थे की राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को उन्ही के मुल्क में कोई गोली मार देगा जिस व्यक्ति के एक इशारे पर ३३ करोड़ भारतीय उठ खड़ा होता हो जिससे बर्तानिया हुकूमत हर व्यक्ति खौफ खाता हो जिसकी एक आवाज पर ब्रिटिश सरकार की मजबूत नीवं हिलने लगती हो और बंकिम्घम पैलेश थरथरा जाता हो उसे उसके ही देश मी मारा जाएगा .....................!!

किंतु ३१ जनवरी २००८ को जब मणी भवन में रक्खी बापू की देह भस्म को अर्बियन सी अरब महासागर में विसर्जित किया गया तो मुझे बहुत दुःख हुआ यह पुनीत कार्य महत्मा की प्रपौत्री श्रीमती नीलम बेन पारेख ने किया वहां सिर्फ़ बापू के परिजनों व कुछ अन्य लोगो के अतिरिक्त भारत सरकार के नुमाइंदों में गृह मंत्री महारास्त्र के गवर्नर व उप मुख्यमंत्री ने ही शिरकत की ?.................!!

अब आप सोचिए की भारत के राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जिनकी आवाज पर ३३ करोड़ भारतीय ही नही बल्कि दुनिया के तमाम देशो के लोग एक साथ उठ खड़े होते थे जिस महामानव के आगे पूरा विश्व झुक गया जिसे दुनिया में देवताओं के बाद सबसे ज्यादा मान्यता मिली हो जो अरबों लोगों के आदर्श हो जिनकी तस्वीर हमने अपनी नोटों पर छापी हो जिन्होंने हमे ही नही पुरी दुनिया को क्रांती का एक नया ढंग समझाया हो हमारी सोई हुई या यूं कह ले की मर चुकी आत्माओं में जान डाली हो और हम गुलामी से आजादी की तरफ़ चल पड़े हो ...............................
इन्ही बापू की जब अश्थिया व देह भस्म सन १२ फरवरी १९४८ को विसर्जित की गयी थी तो तमाम देशों के राष्ट्र अध्यक्षों के अलावा दुनिया के हजारों लोगो के अलावा भारत के ३३ करोड़ भारतवासी जिनमें मई प्रधानमंत्री राष्ट्र पति और तमाम ऊँचे ओहदों पर बैठे भारतीयों को शामिल करता हूँ। उस हुजूम और उसकी भावनाओं का जिक्र मई शब्दों में नही कर सकता किंतु आज जब हमें आजाद हुए ६० वर्ष हो गए और हम कुछ सीखने के बजाये अपनी परम्परा आदर्श, व्यवहार और सदाचरण जैसी बातों को ही भूल गए की बापू की बदौलत जो लोग आज बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठे है उन्हें बापू की देह भस्म विसर्जित किए जाने पर वहाँ मौजूद रहने की फुर्शत नही मैं कहता हूँ कि क्या लेनिन(उदाहरण के तौर पर) की देह भस्म विसर्जित करनी होती तो क्या रूस के राष्ट्र पति पुतिन वहाँ मौजूद नही होते या फिर अब्राहम लिंकन या जार्ज वाशिंगटन की देह भस्म विसर्जित करनी होती तो जार्ज बुश वहाँ मौजूद नही रहते या फिर माओ की अस्थिया प्रवाहित करनी होती तो क्या चीन के मौजूदा राष्ट्र अध्यक्ष वह मौजूद न रहते पर भारत में ऐसा नही हुआ आज यदि पंडित नेहरू होते तो क्या ऐसा होता या फिर नेहरू, पटेल, डाक्टर राजेंद्र प्रसाद मौलाना आजाद यह तक कि लोहिया जयप्रकाश नारायण कि आत्माएं यह देख कर क्या खुश हो रही होगी ?

गांधी को नाथूराम गोडसे ने नही मारा गांधी को हम मारने कि कोशिस कर रहे है पर ये असम्भव है ....ये एक शर्मनाक सच है जिसे मैंने बयान करने कि कोशिश की है आप की प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा ............

कृष्ण कुमार मिश्र

Friday, February 8, 2008

सड़क हादसे में एक और वाघ की मौत


सात तारीख की रात में मैलानी रेंज की मुरेहना बीट में आसाम रोड के किनारे एक वाघ सम्भवता किसी भारी वाहन से टकरा गया जिसमें उसकी मृत्यु हो गयी आठ फरवरी २००८ की दोपहर में जब वनकर्मियों को पता चला तो इलाक़े के तमाम नागरिक उस वाघ को देखने के लिए जमा हो गए सड़क पर ट्राफिक जैम हो गया मीडिया और वनविभाग का अमला भी मौक़े पर पहुंचा लेकिन दुधवा नेशनल पार्क का कोई बड़ा अफसर वहा नही पहुंचा और ना ही जिला प्रशासन का कोई अफसर जबकि जिले के तमाम आला अफ़सरान को वन्य जीव प्रतिपालक का अखितियार हासिल होता है और उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी ! यहाँ पर गौर करने वाली बात यह है कि वन्य जीव अधिनियम १९७२ के अंतरगत वन्य जीव विहारों व अन्य संरक्षित क्षेत्रों में जहाँ वन्य जीवन मौजूद है वाहन से गुजरानें वाले वाहनों की गति नियंत्रित होनी चाहिए किन्तु यहाँ एसा बिल्कुल नही है क्यो कि इन नियमो को सामान्यता कोई जानता नही है और इंतजामिया द्वारा इनके पालन पर कोई विशेस बल भी नही दिया जाता नतीजा यह है कि आये दिन कोई न कोई निरीह वन्य पशु इन भारी वाहनों की चपेट में आ जाते है खेरी बहरैच व पीलीभीत जनपदों में जहाँ जंगल व जंगली जीवों की अधिकता है वहाँ ये घटनाएँ अक्सर घटती रहती है एक तरफ तो प्रोजेक्ट टाइगर के तहत सरकार करोडों रुपयों को खर्च कर रही है और वैश्विक समुदाय तमाम अनुदानों द्वारा धरती पर बाघ की इस ख़ूबसूरत प्रजाति को बचाने के प्रयास कर रहा है तो दूसरी ओर हमारे देश का राष्ट्रीय पशु होने का दर्जा प्राप्त यह जीव अपने अस्तित्वा को खोता जा रहा है अभी हाल में ही कतारानिया घाट वन्य जीव विहार में एक बाघ रोड एक्शिदेंत में मारा गया ...................!!!!
कुल मिलकर इस विकट समस्या के समाधान में जल्दी प्रयास न किये गए तो बाघों को बचा पाना मुश्किल होगा वन विभाग और पुलिस कि सहायता से वन्य जीवन वाले इलाकों में वाहनों कि गति पर सकती के साथ प्रतिबंध लगाया जाय और ग़ैर सरकारी संगठनों को चाहिए कि इमानदारी से इन इलाकों में जागरूकता अभियान चलायें ताकि लोग अपने देश कि अतुल्य प्राकृतिक संपदा के मूल्य को समझ सके! क्यो कि हम मानव बिना इन जीवों के अकेले इस धरती पर नही रह सकते यह बात हमें ढंग से समझ लेनी चाहिए !!!!!!!!!!!!!!!



कृष्ण कुमार मिश्र
9451925997

Tuesday, January 8, 2008

मोंगली मारा गया.......्नही मोंगली मारें गयें.........!!




एक मानुष द्वारा किया गया अमानवीय कृत्य ..........!

सियार जो हमारे पारिस्थितिकी तन्त्र का एक अहम हिस्सा है और द्वितीयक श्रेणी का प्रीडेटर इसका जिक्र जातक कथाओं से लेकर विलियम स्लीमैन के दस्तावेजों में मिलता है और इन्ही दस्तावेजों से प्रभावित हो कर रुडियार्ड किपलिन्ग ने जन्गल बुक की रचना की, और इन्हे इसी किताब पर नोबल प्राइज़ मिला, इज़िप्ट में सियार को मॄत्यु के देवता के रूप मे स्थापित किया गया है इन्हे अनुबिस के नाम से जाना जाता है अनुबिस को हमेशा काले सियार के रूप में दिखाया जाता है जबकि प्रकृति में काला सियार नही पाया जाता, यह सिर्फ़ भुरे रन्ग के होते है। इजिप्ट में काले रन्ग को रात्रि, पुनरनिर्माण, व मृत्यु का प्रतीक माना जाता है। और यह रन्ग इस लिये और प्रासन्गिक है कि मृत शरीर की ममी बनने के बाद शरीर का रन्ग काला ही होता है इस कहानी के पीछे और सियारों के कारण ही इज़िप्ट में विश्व प्रसिध पिरामिड व विशाल मकबरें बन सके कारण यह था कि रेगिसतानी इलाकों मे रहने वाले लोग जब अपने पूर्वजों को दफ़नाते तो ये सियार उनकी लाशों को खोदकर खा जाते और यही कारण बना पिरामिडों के अविश्कार का कहते है आवस्यकता अविशकार की जननी होती है...................!!! ग्रीक के देवता हेओमेस और मोन्स्तेर सेर्बरौस भी गोल्डेन जैकाल के प्रतीक है।
भारत के ग्रामीण अचंलों में मान्यता है कि सियार सिन्घी जैसी चीज सियार के माथे मे होती है और जिसे भी यह प्राप्त हो जाये उसके जीवन में सुख संमृदध्ता आती है!!!!!!!!!!!!!!!!
बाइबिल में सियार को सिनिस्टर क्रियेचर माना गया है और कहा गया है कि यदि कोई धरती पर अन्धविश्वासी है उसे ये जीव का भोजन बनना होगा।
किन्तु हमारी जातक कथाओं में सियारों कि सह्रदयता के कई किस्से है जैसे कीचड़ में फ़न्से शेर को बचाना, एक मानव के बच्चे का अपने बच्चों की तरह पालना जो आज हमारें बीच मोगली के नाम से जाना जाता है...................... इस घटना में सियार नही मरें मोंगली मारा गया है और एक दो तीन .........नही पचासों मोंगली मारें गये है...........!!! हमने अपनी सभ्यता का हनन तो किया ही है लेकिन सियारो की सभ्यता का अपमान भी...............मोंगली वाली सभ्यता..............!!

जिला खीरी की धौरहरा तहसील के केशवापुर-कलां में तीन-चार तारीख की रात में एक ऐसी घटना घटी जिसे मानवता के मापदडं के मुताबिक कभी माफ़ नही किया जायेगा ! एक मानुष की खाल में अमानुष ने इस कृत्य को अन्जाम दिया यह आदमी एक बेल ( मिनी सुगर प्लान्ट)का मलिक है इसके इस कुटीर उद्य़ोग में गुड़, प्रेसमड(मई),मोलैसेस(सीरा), बगास आदि चीजों का उत्पादन होता था और इन्ही मीठी वस्तुओं के लालच में सियार यहां आते जाते रहते थें ये निरीह जीव नुकसान के नाम पर बस मई(प्रेसमड) व बेकार पड़े सीरें व अन्य उत्पादों को खा लेते थे लेकिन इस व्यक्ति को यह भी बर्दास्त नही हुआ और एक रात इसने इन्ही खाद्य पदार्थों में खतर्नाक जहर मिला दिया नतीजा यह हुआ कि एक एक कर यह निरीह सियार (जैकाल) आते रहे और उस जहर मिले प्रेसमड व सीरे को खाकर मरते गये यह सिलसिला दो दिन तक लगातार चला जब ग्रामीणों ने अपने खेतों में यहां वहां सियार मरे हुए पड़े देखे तो बात फ़ैलना शुरू हुई बात पत्रकारों तक पहुन्ची तब वन विभाग ने घटना को संग्यान में लिया और मौके पर पहुन्च कर उस व्यक्ति के विरुद्द वन्यजीव अधिनिअम के अनुसार विधिक कार्यवाही की किन्तु अभी तक वह व्यक्ति फ़रार है






इस घटना में तकरीबन ५० सियार (कैनिस अरिअस इडिंकस) के अलावा तमाम कौएं, चील व कुत्ते भी मारे गये, कारण जब इन सियारों ने जहर खाया तो कुछ तो उसी स्थान पर जहर की तीव्रता के कारण मर गये और कुछ दूर खेतों में जाकर मरे और इन के जहरीले मांस को खाने वाले जीव जैसे कुत्ते, चील, कौये भी मर गये! इस ह्र्दय विदारक द्रश्य को देख कर कोइ भी द्रवित हो जाये अब आप बताये कि जिस भारतीय सभ्यता में बिल्ली मौसीं कौआ मामा व हर जीव में पुर्वजों की आत्मा के वास होने की बात कही गयी हो जहां ८४ लाख योनियों (स्पेसीज) में आत्मा के एक ही स्वरूप की बात कही गयी हो वहा पर ऐसी वीभत्स व क्रूर घटनायें मानवों द्वारा घटायी जा रही हो तो हम कैसे अपनी धरती मां की इन सन्ततियों को बचा पायेगे जो हमारे सहोदर भी है ...............धर्म के अनुसार भी और डार्विन के विग्यान के अनुसार..............!!!






Saturday, December 8, 2007

रोड एक्सीडेन्ट में एक वाघ की मौत







तारीख ४ दिसम्बर २००७, दिन मंगलवार सुबह कतरनिआघाट वन्य जीव प्रभाग की मोतीपुर रेन्ज में नौनिहा गांव के लोगो ने एक वाघ को सड़क के नजदीक घायल अवस्था में देखा जो रात में किसी तेज रफ़्तार से आ रहे वाहन से टकरा गया था ग्रामीणो के मुताबिक वनविभाग को खबर करने के बाद वनाधिकारी एक घन्टे के उपरान्त वहा पहुचे वाघ "टाइगर" वही झाड़ियों में पड़ा असहनीय पीड़ा से कराह रहा था वह ना तो चल पाने की स्थित में था और ना ही बैठ पाने की बस वह जीव दर्द की पराकास्ठा को सहने की व सैकड़ो मानवों की भीड़ को देखकर खिसट खिसट कर अपने को तमाशबीनों से दूर प्रकृति की गोद में छिपा लेने की नकाम कोशिश कर रहा था दोपहर तक लखनऊ ज़ू के डाक्टर को बुलाया गया बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में यहीं जंगली जानवरों को बेहोशी की दवा देने में पारन्गत है । फिर उस घायल वाघ को बेहोश करने व उसके इलाज़ की प्रक्रिया शुरू ए हुई जो ४ दिसम्बर की दोपहर से शुरू होकर ५ तारीख की सुबह तक चली इन २४ घंटों में वाघ का इलाज़ तो नही हो पाया हां किसी तरह से इसे बेहोश जरूर कर लिया गया फिर एक नया खेल शुरू हुआ बेहोश घायल बाघ को पिजंरे में कैद करने का पहले तो इस घायल व बेहोश बाघ पर ज़ाल डाला गया फिर इसकी घायल टांग में रस्सी बान्धकर इसे घसीटते हुए पिज़ड़े में लाया गया इस समय तक बाघ को घायल हुए तकरीबन ३० घंटे हो चुके थे अब निण॑य यह लेना बाकी था कि आखिर इस बाघ को इलाज़ के लिये कहा ले जाया जाय आई वी आर आई बरेली या लखनऊ फिर इसे आई वी आर आई ले जाने का निर्णय लिया गया किन्तु बाद में इन अधिकारियों को मालूम हुअ कि वहा इलाज़ नही हो सकता अन्ततोगत्वा बाघ को लखनऊ ले जाने का निश्चय हुआ अब तक बाघ को घायल हुए लगभग ३६ घंटें से अधिक बीत चुका था अब आप बताये कि किसी भी जीव के भयंकर चोट पहुन्चने के ३६ घंटें के पश्चात भी इलाज़ न मिले तो उसकी परिणिति क्या होगी और तब जब वह जीव हमारे देश का नेशनल एनीमल हो और जिसके संरक्षण मे भारत सरकार करोड़ों रुपये खर्च कर रही हो साथ हई विदेशी अनुदान भी मिलता हो और एक पूरा विभाग उस जीव की सुरक्षा के तैनात तब इस तरह की अनियमितता हुई हो तो आप सोच सकते है कि क्या हम अपनए देश की वन्या सम्पदा बचा पायेगें।
तराई के जंगल अपनी जैव सम्पदा के लिये पूरी दुनिया में जाने जाते है यह भूमि सदियों से बाघ तेन्दुआ गैंडों हाथी भालू व तमाम तरह के दुर्लभ जीव जन्तुओं की है जहां मानव ने अतिक्रमण कर इन्हें इनके ही घरों से बेघर कर रहा है इसके बावजूद इन जीवों के संरक्षण की जिम्मेदारी तो हमारी ही है तराई के खीरी व बहराइच जनपदों के जन्गलों को सरकार ने सरंक्षित क्षेत्र घोषित कर नेशनल पार्क व वन्या जीव विहार वनाये तकि ये निरीह जीवों को सुरक्षा मिल सके पर विभागीया लपरवाही के चलते ये जीव विलुप्ति की राह पर है। सरंक्षित क्षेत्रों में सवेन्दन्हीन मानव वन्यजीव सरंक्षण अधिनियम को तो ताक पर रख ही देता है मनवीया मूल्यों दया करुणा जैसी आदम प्रवत्तियों को भी नज़रन्दाज़ कर चुका है किन्तु वनविभ&#