Tuesday, November 10, 2009

हिन्दी को हिन्दुस्तानी बनाये !


Photo & Text by Krishna Kumar Mishra


हिन्दी को हिन्दुस्तानी बनाये


भाषा की लोकप्रियता के लिये उस भाषा का शब्दकोष और उस लिपि में लिखा गया ज्ञान इस बात के लिये उत्तरदायी होता है कि वह भाषा कितना राष्ट्रीयकृत या ग्लोबल होगी ।


अग्रेजों ने अपनी भाषा में संसार के सम्पूर्ण ज्ञान को समेटा और परोसा आज आप जिस मुल्क की सभ्यता, ज्ञान व विज्ञान की खिड़की खोलना चाहे खोल ले और देख ले उस देशकाल की परिस्थित बिना अटके और उलझे।
लेकिन हम वैश्विक स्तर की बात छोड़ दे तो हम अपने देश का ही साहित्य जो तमाम अन्य भारतीय भाषाओं में है उसे ही हिन्दी के रंग में नही रंग पाये। आप सोचिये मास्को प्रकाशन ने हमारे लोगो को रूस का बेहतरीन साहित्य पढ़ने का जो मौका दिया था वह सराहनीय है.रूसी का हिन्दी में सुन्दर अनुवाद !

नतीजा ये है कि हमारे लोग तमिल एवं उड़िया के उम्दा साहित्य व साहित्यकारो को नही जानते लेकिन यहां हर युवा पर लेनिन, टाल्स्टाय, गोर्की और दोस्तोविस्की की छाप पड़ी और साम्यवादी विचारधारा का प्रचार प्रसार भी !

अग्रेजॊं ने हमारे संस्कृत, और अन्य क्षेत्रिय भाषाओं में लिखे प्राचीन ग्रन्थों का अनुवाद कर उन्हे सुरक्षित रखने का अपरोक्ष तौर से एहसान तो किया ही , और अपनी अग्रेजी भाषा को भारतीय जान से और अधिक ओत-प्रोत कर संमृद्ध कर लिया। नही तो हम...............
जब तक हम भाषा को समाज, देश की मुख्य धारा से नही जोड़ेगे तब तक हम इस बात का इल्जाम किसी पर थोप नही सकते कि फ़ला व्यक्ति या संस्था  ्हिन्दी को मान्यता नही दे रहा है
दिल्ली की गलियों से लेकर सिनेमा तक में बोली जाने वाली हिन्दुस्तानी जो पारसी, अरबी, तुर्की, अग्रेजी, अवधी, ब्रज, बुन्देली, व राजपूताना की भाषाओं का संगम थी वही सर्वमान्य हुई हमारे समाज में न कि क्लिष्ट संस्कृत प्रधान हिन्दी !

आज जब अग्रेजी का शब्दकोश दुनिया की तमाम भाषाओं के शब्दों से अमीर हो रहा है हम तब भी अपने क्षेत्रीय शब्दों को साहित्य में शामिल करने से गुरेज करते है

शैव, नागा, ये दो शब्द दुनिया के प्राचीन भारतीय सम्प्रदाय के शब्द है किन्तु अग्रेजी शब्दकोष ने इन्हे अपनाया और अब जब कोई भारतीय बच्चा इन्हे विदेशी भाषा के शब्द कोष में पढ़ेगा तो क्या वह इन शब्दो को भारतीय मान सकेगा । नितान्त कमी है हमारे देश में एक बेहतर हिन्दी-शब्दकोश की जो प्रचलित हो और सर्वसुलभ हो

६० बरस बहुत होते है किसी देश की सरकार और वहां के निवासियों के लिये कुछ बेहतर करने के लिये । इस लिये कोई बहाना नही चलेगा!
सारे जहां के इल्म का हिन्दी में  तरजुमा  हो। इन्ही शुभकामनाओं के साथ

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारतवर्ष

Wednesday, November 4, 2009

मिठ्ठू लाल जी और प्रवासी पक्षी


ये चिड़िया भी मेरी बेटी से कितनी मिलती-जुलती है
कहीं भी शाख़े-गुल देखे तो झूला डाल देती है|

"मुनव्वर राना"


४ नवम्बर २००९ मै शाह्जहांपुर पहुंचा कार की मरम्मत करवाने किन्तु मेरे इरादे और भी थे जिसमें एक था मिठ्ठू लाल जी से मुलाकात करना, अब पूछिये ये मिठ्ठूलाल कौन है ?

ये ७५ वर्ष के बुजुर्ग है जो अपनी रिवाल्वर "Webley & Scott" डालकर प्रत्येक सुबह उस बगीचे में आ जाते है जिसके ठीक सामने एक तालाब है जो मिठ्ठूलाल जी द्वारा ही निर्मित है और इसी जगह कुछ कमरे भी निर्मित है और बगल में एक शिवाला, यानी मिठ्ठूलाल जी महादेव की शरण में भी है !आप कभी राइस मिल और ईट भट्टा मालिक थे, इसी भट्टे से ईट के लिये निकाली गयी मिट्टी से बना गढ्ढा अब तालाब में तब्दील हो गया है, और प्रवासी पक्षी  वर्ष के चार महीने के बसेरे के लिये हजारों मील दूर से यात्रा करके मिठ्ठू लाल के इस तालाब को अपना घर बनाते है------"ईट भट्टे का यह गढ्ढा अब तब्दील हो गया है रंग-बिरंगे पक्षियों का स्वर्ग"

गौर तलब बात यह कि मानव बस्ती के निकट हज़ारों विदेशी चिडियों का प्रवास स्थल सुरक्षित है जहां कोई इन्हे हानि नही पहुंचा सकता। क्योकि मिठ्ठूलाल जी जो है ।
यहां रह रहे मिठ्ठूलाल जी के नौकर भी इनके सरंक्षण में अपना योगदान देते है!
एक वाकया मिठ्ठूलाल जी ने बताया कि एक दरोगा इन पक्षियो का शिकार करने आया उनके मना करने पर बोला ये तो "आवारा चिड़ियां" है मिठ्ठूलाल बोले अच्छा ! ये आवारा है ! ये मेरी चिड़िया है ! ये तालाब मेरा है ! तो वह दरोगा बोला अच्छा जब ये उड़ेगी तब इन्हे मै मार दूंगा, मीठ्ठूलाल् ने रिवाल्वर निकालकर कहा मै तुम्हे मार दूंगा !
देखिये अब आप लोग ही देखिये ये मनुष्य कितना बेवकूफ़ व जालिम हो चुका है वह प्रकृति की हर वस्तु को अपना गुलाम बनाना चह्ता है और खुद उस वस्तु का मलिक चाहे वह सजीव क्यो न हो उसे वस्तु ही लगती है!
इस धरती पर जितना मनुष्य का हक है उतना किसी और जीव का भी फ़िर चाहे वह हिरन हो चिड़िया हो या सांप किन्तु हम सबके मालिक बनना चाह्ते है या किसी न किसी के अधिकार में उस जीव को स्वीकार करना चाहते है तभी तो मिठ्ठूलाल को दरोगा से कहना पड़ा कि ये मेरी चिड़ियां है! तब जा के इस स्वंतंत्र पक्षियों की जान बच सकी !!
खैर मीठूलाल जैसे व्यक्तियों से प्रेरणा लेनी होगी समाज़ को, तभी प्रकृति के विनाश को रोका जा सकता है और सरकार को भी ऐसे लोगो को प्रोत्साहन देना होगा " पक्षी मित्र" जैसे पुरस्कारों से अलंकृत करके ! ताकि अन्य लोग संरक्षण के महत्व को समझ सके!

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-262727
भारतवर्ष
9451925997

Monday, October 26, 2009

जानवर है बेहाल राम तेरे देश में !!

अत्याचारी मानव
यहां मैं एनीमल राईट की बात नही करूगा क्योंकि हमारे मुल्क  में कानून गरीब और कमजोर पर  लागू नही होते फ़िर यदि बात आये मानव को छोड़ कर दूसरी प्रजातियों यानी जानवर आदि .आदि , की तो राम मालिक!
ऐसा ही हाल है हमारे घरेलू जानवर का पहली बात विकास की दौड़ में ये जीव अब अप्रासंगिक हो रहे है और विलुप्त भी क्योंकि अब न तो खरिहान है और न ही चरागाह और न ही इन जगहों पर लगने वाली चौपालें जो अपने आप में एक संस्कृति हुआ करती थी , रही सही कसर मशीनों ने पूरी कर दी!
पर इसके बावजूद एक तबका है जो अभी भी इन्ही जीवों पर निर्भर है किन्तु सिलसिला-ए-आम ये है कि या तो ये तबका सवेंदन हीन हो चुका है या गरीबी ने इसे ऐस बना दिया या फ़िर लालच और आगे बढ़ने की लालसा ने मानव को हबसी बना कर रख दिया तभी तो ये लोग इन जानवरों से बेतहासा काम लेते है बिना पूरी खुराक दिये।
आप देखे तो ये ह्र्दय विदारक दृष्य हर सड़क व गांव में मिल जायेंगे, कभी तांगें की शक्ल में जिस पर आदमियों का पहाड़ रखा होगा और बेचारा एक घोड़ा या खच्चर जो जमीन नापने की भरसक कोशिश करने के बावजूद उसकी टांगे सरकती हुई नज़र आयेंगी ...........
कही बैलगाड़ी पर गन्ना य फ़िर अनाज़ का हिमालय लादे दो बैल जो पूरा भोजन न मिलने से कुपोषित हो चुके है पर मालिक की चाबुक या पैना या डण्डा उन की पीठ की खाल को उघाड़ता हुआ उन्हे आगे बड़ने का हुक्म बज़ा रहा होगा और ऐसा ही कुछ खेतों में...........

ईट के भट्टों पर तो टट्टुओं की दशा और खराब है जहां उन पर इतनी ईंटे लाद दी जाती है कि कलेज़ा ही फ़ट जायें लेकिन आदमी है की उस का दिल पसीजता ही नही बावजूद इसके की इस आदमी ने मानव-गुलामी का वह दौर भी देखा है जब आदमी आदमी पर कोड़े बरसाता था और जानवरों से भी बुरी दुर्दशा की जाती थी और कही कही तो आज़ भी ऐसा होता है .....................

श्रीमती मेनका गांधी ने जानवरों के अधिकारों की जो लड़ाई लड़ी वह सराहनीय है पर क्या वे कानून लागू है जिनमे जानवर की क्षमता से अधिक बोझा ढ़ोने पर सजा का प्राविधान है ?
मुझे कोई कल ही बता रहा था कि हमारे यहां बेहजम पुलिस चौकी पर एक सिपाही था वह हर ईंट भट्टे से ईंट लेकर आने वाली बोगियों (ट्ट्टू  खच्चर गाड़ी) को रोककर पिटाई करता था और इस हिदायत के साथ कि आइंदा से जानवर पर इतना बोझ नही लादोंगे .सलाम है ऐसे व्यक्ति को.शाय्द वह एनीमल राईट के बारे में न जानता हो कि जो वह कर रहा है वह कानूनन जरूरी है पर मानवीय दृष्टिकोण से वह यह बेहतर काम किये जा रहा था यदि पुलिस इस कानून का पालन कराने में थोड़ा सक्रिय हो तो बहुत सुधार आने की गुंजाइस है।
एक नियम का मै भी पालन करता हूं कि रास्तें में यदि कोई तांगा या बैलगाड़ी जा रही होती है तो मै अपने मशीनी वाहन का हार्न नही बजाता और सड़क से अपना वाहन उतार कर आगे निकल जाता हूं क्योकि मेरे हार्न बजाने के पश्चात जो प्रतिक्रिया उस बैलगाड़ी या तांगे के मालिक द्वारा होगी वह मुझे पता है ? हार्न बजने के बाद कुछ जोरदार चाबुक उस जानवर की पीठ पर पड़ेगे  ......... . साथ ही उसे इतने बोझ के साथ सड़क से नीचे उतरना और फिर चढ़्ना .........उसकी इस शारीरिक मेहनत और यातना के बनस्पति मेरे मशीनी वाहन पर कोई फ़र्क नही पड़ेगा ! तो क्या आप मेरे इस विचार को अपनायेंगे !
मै यह लेख इस लिये नही लिख रहा हूं कि कोई मेरे लेखन की तारीफ़ करे या ब्लाग जगत में चर्चा हो मै चाह्ता हूं कि सक्षम लोग कुछ करे !
यहां पर एक कविता का जिक्र जरूरी है जिसे वंशीधर शुक्ल जी ने लिखा है उनके ह्रदय के ये उदगार किसी फ़रिस्ते के उदगार से कम नही .---------

धन्य गाय के पूत

बछरा, धन्य गाय के पूत
तोरइ चारा छीनि - छीनि के दुनिया भइ मजबूत।
बछरा धन्य गाय के पूत।

जलमति खन तोरी अम्मा का दूधु लेयं सब छीनि
तुम अम्बा अम्बा करि रम्भउ, जियउ घास खर बीनि

पी-पी दूधु मोटाय जगत तुम सूखि होउ ताबूत।
बछरा धन्य गाय के पूत

दूध मठा का खांरउना कुछु जूठनि तुमका देय,
दही दही घिउ-मसका करिके जगतु खास रस लेय।
टुकरू -टुकरू तुम दयाखउ जग की यह करिया करतूत।
बछरा धन्य गाय के पूत

दूध छुटई माता का बिछुरन पिता न देखय देंय,
जानइ कह बेचइ, कह पठवंइ, बेंचि मुनाफ़ा लेइ।
सउदा बने फ़िरउ दर दर मां कोइ खेतिहर के सूत।
बछरा धन्य गाय के पूत
नथुना नाथइ डोरी बाधइं मूडें बांधि सिरउंधा
मुहें मुसिक्का आखिंन पट्टी गलगल घींच गरउंधा..............शेष..............
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कही मैने पढ़ा था शायद मनुस्मृति में कि आठ बैलो से हल चलाने वाला अति उत्तम, छ: बैलो वाला हल उत्तम और चार बैलों वाला हल सामान्य तथा दो बैलों वाला हल दोषपूर्ण व पापी मनुष्य द्वारा चलाया जाता है  
हम जानवर से काम तो लेते है और वह भी उसकी क्षमता से अधिक बिना उसकी सेवा किये क्या हम अपने अतीत से सबक नही ले सकते जब इन जीवों का सम्मान, और सेवा होती थी क्योकि सदियों से ये हमारे भरण -पोषण में सहयोगी रहे है और आज भी है ।


कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारत वर्ष
९४५१९२५९९७

Friday, October 23, 2009

350 से ज्यादा नही, बिल्कुल नही !!!


पृथ्वी बचाओं नही तो खुद नही बचोगे- फ़ैसला आप के हाथ
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जलवायु परिवर्तन के जो भयवह संकेत हमे मिल रहे है उसे देखते हुये दुनियाभर के जल्वायु वैग्यानिकों ने २४ अक्टूबर सन २००९ को "इंटरनेशनल डे आफ़ क्लाइमेट एक्सन" मना रहे है जिसमे उन्होने पूरी दुनिया के लोगों को साझा करने के लिये आवाहित किया है ताकि दुनिया की तमाम सरकारों पर इसका जोरदार असर पड़े जो जिम्मेदार है ग्लोबल वर्मिंग के कारण होने वाली जलवायु परिवर्तन के,
 क्योकि इसी दिन यूनाईटेड नेशन्स की स्थापना हुई थी


इस दिवस का मुख्य चिन्ह या लोगो ३५० रख गया है क्यो कि पर्यावरण में CO2 की सांन्द्रता 350 ppm से अधिक नही होनी चाहिये और यदि ऐसा होता है तो ग्लेशियर पिघलने लगते है तापमान बढ़ता है और जंगल सूखने लगते है जैसा कि हमारी धरती पर हो रहा है क्योकि इस वक्त CO2 की सांद्रता 390ppm है यानी CO2 का एक हिस्सा प्रत्येक मिलियन एटमास्फ़ियर में, यही वज़ह है की २४ अक्टूबर २००९ यह कार्यक्रम किया जा रहा है ताकि दिसम्बर २००९ को यूनाइटेड नेशन्स की अगली बैठक जलवायु संबधी मसलों पर होगी जहां 350 की गतिविधियों को दुनिया भर से आये नेताओं के समक्ष प्रस्तुत किया जा सके और इन राजनेताओं के मन-मस्तिष्क पर कुछ प्रभाव छोड़ा जाय ऐसी आशा की जा रही है ।

यहां यह बताना जरूरी है कि 350 के कान्सेप्ट की शुरूवात अमेरिकन लेखक  बिल मेककिबेन ने की इन्होने ग्लोबल वर्मिग पर विश्व प्रसिद्ध पुस्तक लिखी और सन २००७ मे तमाम राज्यों मे कार्बन को सन २०५० तक ८० फ़ीसदी कम करने का एलान जिसमे उस समय सीनेटर बराक ओबामा ने भी इस बेहतरीन सोच की सराहना की  ।
२४ तारीख को दुनिआ की तमाम मीडिया, राजनेता, NGOs, सरकारी सगंठनॊं से अनुरोध किया जा रहा है की पृथ्वी ग्रह को और मानव जाति को यदि विनाश से बचाना है तो 350 वाले कान्सेप्ट पर जल्द विचार कर कार्बन के स्तर को सामान्य किया जाय नही तो विनाश निश्चित है !
क्योकि सामान्य स्तर में कार्बन को हमारे वृक्ष अवशोसित कर शुद्ध प्राणवायु में तब्दील कर देते है ।
मै यह मानता हूं कि यदि हर व्यक्ति समाज व देश अपने अपने पर्यावरण को स्वच्छ रख ले तो धीरे-धीरे पूरी धरती का वायुमण्ड्ल स्वच्छ हो जायेगा किन्तु हम इस जिम्मेवारी का निर्वाह पूरी ईमानदारी से करे ।
जीवाश्म ईधंन का प्रयोग आधुनिक तरीके से करे जिसमे कार्बन का उत्सर्जन कम हो अपने वाहन व कारखानों से निकलने वाले धुएं में कार्बन का प्रतिशत कम करने वाले उपकरणों को दुरूस्त रखे और सरकार भी इन नियमों का पालन कराने के लिये दृढ सकंल्प बने, हम वृक्ष लगाये नदियों को स्वच्छ रखे और ऐसा कोइ काम न करे जो हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुचाता हो तो मुझे यकीन है कि स्थितियों में सुधार खुद ब खुद होता जायेगा !!!
चलो कल हम सभी अपने आस-पास के लोगों को इस बावत बतायें, स्कूलों, में बच्चों से रैलियां निकलवायें और अपने-अपने प्रतिष्ठानों व सगंठनों में गोष्ठी कर समस्या के समाधान निकाले और इस २४ तारीख की इन गतिविधियों से सरकार और नेताओं को अवगत कराये कि यह बहुत जरुरी है ।

हांलाकि इस तरह के दिवस मनाने की जो परंपरा है वह सिर्फ़ इसी दिन तक सीमित रह जाती है और तमाम तरह के कार्यक्रम तो सिर्फ़ सरकारि फ़ाइलों तक ही सीमित रह जाती है जैसे अभी महात्मा गांधी के विचार पर "joy of giving week" पिछले महीने भारत सरकार ने मनाया जिसकी जानकारी शायद किसी को नही है !!

अच्छे विचार और अच्छ गतिविधियां ही धर्म है और इसे संस्कार के तौर पर अपनाना चहिये तभी कल्याण संभव है जैसे हमारे यहां बच्चों को हिदायत दी जाती है कि जल पवित्र है इसे दूषित करना पाप है या फ़िर जीव हत्या पाप....नदी मां समान है ---------- आदि-------- आदि।

 मालद्वीप के राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद ने अपने कैबिनेट की मीटिंग समुंद्र की गहराईयों में की ताकि दुनिया देख
सके कि ग्लेशियर पिघलने पर उनका देश दुनिया के नक्शे से मिटकर समुंद्र की गहराईयों में समा जायेगा।


भारत के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश और ISRO के चेयरमैन जी० माधवन ने अतंरिक्ष भवन बैगलौर में बैठक की और दो सेटेलाइट सन २०१० व २०११ में छोड़ने की बात कही जो ग्रीन हाउस गैसों का अध्ययन करेगीं और २०१० में एक और माइक्रो-सेटेलाइट छोड़ने की भी तैयारी है जो aerosols  यानी गैस में जहरीले कणों की सांद्रता का पता लगायेगी । 


कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारतवर्ष

अपने गांव में दीपों का त्योहार

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

१७ तारीख यानी दीपावली भारत भूमि का एक महत्व पूर्ण त्योहार,  इस बार अम्मा ने तय किया कि यह त्योहार हम अपने गांव मैनहन में मनायेगे, वजह साफ़ थी कि पूर्वजों की धरती पर उनके अशीर्वाद और प्रेम का एहसास महसूस करने की फ़िर वह घर जिसमें न जाने मेरी कितनी पीढ़ियां पली - बढ़ी, वह धरती जहां मेरे बाबा और पिता ने जन्म लिया मेरी दादी और मां की कर्म-भूमि और इन सभी प्रियजनों का जीवन सघर्ष......................................
दिवाली के रोज़ हम दोपहर बाद गांव के लिये चले, पूरे रास्ते भर मैं रंग-बिरंगे कपड़ों में सुस्सजित नर-नारियों के मुस्कराते हुए चेहरे पढ़ता गया जो यह बता रहे थे कि अपने गांव-गेरावं में त्योंहार मनाने का सुख क्या होता है । हर किसी को जल्दी थी अपने-अपने गांव (घर) पहुंचने की।
दिन रहते हम अपनी पितृ-भूमि पर थे वहां के हर नुक्कड़ पर सभायें लगी हुई थी कही खि्लधड़े किशोरों की जो युवा होनें की दहलीज़ पर थे वो मुझे देखते तो चुप हो जाते आगे बढ़ते चरण छूते और फ़िर गुमसुम से मै भांप जाता जरूर ये कोई "वही वाले" काल्पनिक शगूफ़ों में मस्त होगे , चलो अब आगे बढा जाय ......तो कही पर बुजर्ग जो रामयण-भागवत आदि की बाते कर रहे थे तो कही आने वाले सभापति(प्रधान) के चुनाओं की गोटियां बिछाई जा रही थी,
बच्चे शाम होने का इन्तजार कर रहे थे कि कब पटाखे दगाने का मौका जल्दी से मिले
और शायद कु्छ लोग अपनी तंगहाली और बेबसी -गरीबी----------पर परदा ढ़ाकने की कोशिश क्योकि ये त्योहार उन लोगों के लिये बड़ी मुश्किलात पैदा करते है जिनके हको़ को अमीरों ने दबा रखा है उन सभी को अपनी इच्छाओं का दमन अवश्य करना पड़ता है ----------और ये बेबसी कैसा दर्द देती है इसका मुझे भी एहसास है।इस परिप्रेक्ष में अवधी ्सम्राट पं० वंशीधर शुक्ल ने एक बेह्तरीन कविता लिखी है "गरीब की होली" जो हकीकत बयां करती है हमारे समाज की उस रचना को पचास वर्ष हो रहे है पर भारत में गरीब की दशा मे इजाफ़ा ही हुआ है बजाए..........

"शायद त्योहार बनाने वालों ने इन सभी के बारे मे नही सोचा होगा या फ़िर सोचा होगा तो जरूर कोइ इन्तजामात होते होगे जो सभी में समानता का बोध कराते हो कम से कम इन पर्वों के दिन"
खैर मै गांव का एक चक्कर लगा कर घर पहुंचा तो मेरे सहयोगी व सबंधी मौजूद थे मैने मोमबत्तियां व धूपबत्तिया सुलगाना - जलाना शुरू ए कर दिया घर के प्रत्येक आरे(आला) मे रोशनी व खुशबू का इन्तजाम तमाम अरसे बाद मै अपने इस घर में दाखिल हुआ था घर की देखभाल करने वाले आदमी ने सफ़ाई तो कर रखी थी पर घर बन्द रहने की वजह से उसे रूहानी खुशबू की जरूरत थी जिसे मैने महादेव की पूजा करने के पश्चात पूरे घर मे बिखेर दिया।
मेरे घर के मुख्य द्वार पर मेरे परदादा पं० राम लाल मिश्र जो कनकूत के ओहदे पर थे रियासत महमूदाबाद में ने नक्कशी दार तिशाहा दरवाजा लगवाया था जो आज भी जस का तस है सैकड़ो वर्ष बाद भी और इसी दरवाजे के किनारों पर दस आले और उनमे जगमगाती मोमबत्तियां व मिट्टी के दीपक और साथ में केवड़ा की सुगन्ध वाली धूप, और यही हाल पूरे घर मे था ये सब रचनात्मकता तो आदम जाति ने की थी पर अब हर लौ में खुदा का नूर झलक रहा था
एक बात और आरे या आला घर की दीवालॊ मे त्रिभुज के आकार वाला स्थान जिसका प्रयोग दीपक रखने व छोटी वस्तुयें रखने के लिये प्रयोग किया जाता है और इसका वैग्यानिक राज मुझे तब मालूम हुआ जब तेज हवा के झोकों में मेरे आले वल्ले दीपक जगमगा रहे थे बिना बुझे ।
अपने सभी लोगो का अशिर्वाद और स्नेह का भागीदार बनने के बाद मै अपने शहर वाले घर को आने के लिये तैयार हुआ पर गांव और यहां के लोगों का जिन्होने अपना कीमती समय मुझे दिया और मेरे घर में उन सब की चरणरज
आई मै अनुग्रहीत हुआ ।
तकरीबन रात के १०:३० बजे मै और मेरी मां अपनी कार से रवाना हुए अपने दूसरे घर के लिये अब तलक गांव के दीपक बुझ चुके थे लोग गहरी नींद में थे उनके लिये ये त्योहर अब समाप्त हो चला था बस चहल -पहल के नाम पर लोगों की जो उपस्थित मेरे घर में थी वही इस पर्व को इस गांव से विदा होते देख और सुन रही थी गुप अंधेरे और गहरी नींद में सोये लोगों की गड़्गड़ाहट में !!!
मैने अपने पुरखों और ग्राम देवता को प्रणाम कर प्रस्थान किया सुनसन सड़क चारो तरफ़ खेत और वृक्षों के झुरुमुट कभी कभी सड़क पर करते हुए रात्रिचर पक्षी, सियार गांव के गांव नींद में थे अगली सुबह के इन्त्जार में !!
राजा लोने सिंह मार्ग पर  एक जगह मुझे कुछ दिखाई पड़ा कार धीमी की तो कोई सियार जिसे किसी मनुष्य ने अपने वाहन से कुचला था ये अभी शावक ही था........सियार अब खीरी जैसे वन्य क्षेत्र वाले स्थानों से भी गायब हो रहा है ऐसे में मुझे यह सड़क हादसा बहुत ही नागवांर लगा, किन्तु इससे भी ज्यादा बुरा तब लगा जब मै तीन दिन बाद यहां से फ़िर गुजरा तो यह सियार वैसे ही सड़क पर पड़ा सड़ रहा था इसका मतलब कि अब मेरी इस खीरी की धरती पर  गिद्ध की बात छोड़िये कौआ भी नही हैं जो इसे अपना भोजन बनाते और रास्ते को साफ़ कर देते कम से कम इस जगह पर तो दोनों प्रजातियों का ना होना ही दर्शाता है यह.............................
लोगों को यह नही भूलना चाहिये की इस धरती पर उन सभी जीवों का हक है जो हमारे साथ रहते आयें है सदियों से और हमसे भी पहले से .........और जिस सड़क पर हम गुजरते वहां से दबते - सकुचाते हुए बेचारे ये जीव भी अपना रास्ता अख्तियार करते है हमे उन्हे निकल जाने का मौका दे देना चाहिये !!!
महादेव की इस धरती पर मनुष्य क्या होता जा रहा है ...........इन्ही शब्दों के साथ आप सभी को दीपावली की शुभका्मनायें !
मैने अपने दूसरे शहर वाले घर पहुच कर ईश्वर की आराधना की और दीप जलाये और फ़िर दोस्तो के साथ दिवाली की पवित्र व शुभ रात्रि में शहर में अपने लोगों से मिलता और घूमता रहा !


कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-२६२७२७
भारत
सेलुलर-९४५१९२५९९७

Sunday, September 27, 2009

देनें का मज़ा लेनें से बहुत ज्यादा है!

Joy of Giving Week (27 September to 3rd October 2009)


परहित सरस धरम नहि भाई,

२७ सितम्बर यह तारीख है कुछ खास, इस रोज़ से शुरुआत हो रही है एक खास एहसास की जो आप के मन को वह अनुभूति प्रदान कर सकता है जिसे आप लाखों या फ़िर करोणों में नही तौल सकते,  भारत वर्ष में "ज्वाय आफ़ गिविगं वीक" के तौर पर मनाया जायेगा। और इस पूरे सप्ताह यानी २७ से ३ अक्तूबर २००९ तक समाज के हर वर्ग के व्यक्ति को अपने भीतर मौजूद वस्तविक सुख को जगाने का मौका देने की एक कोशिश !!


यह अपने तरह का भारत में पहला प्रयास है जिसे राष्ट्रीय आंदोलन का रूप देने की अथक कोशिश की जायेगी ताकि देश के प्रत्येक व्यक्ति चाहे वह बच्चे हो, महिला, बुजुर्ग, अमीर, गरीब सभी को इसमे शामिल किया जाना हैं खैर ये तो सरकारी प्रयास की बात है पर इस विचार को समाज के मध्य लाने वाले व्यक्ति को धन्यवाद! क्योकि हम सब कुछ महसूस करने के बावजूद चीजों को अनदेखा करते है और अपने बेहतरीन मानवीय एहसासात को दबाने और कुचल देने का भरशक प्रयास हम सब में जेनेटिक तौर पर वह सब होता है जो एक उम्दा इंसान के अंदर फ़र्क इतना है हम सोच कर भी कार्यों को अंजाम नही देते शायद ये कुछ देने वाले एहसासातों को जगाने वाला सप्ताह ही दम-तोड़ती मानवता को बचा लेने में सफ़ल हो जाये यदि हम अनुसरण करे इस बात का जिसे हमारी संस्कृति सदियों से हमे बताती आयी है !
सर विंस्टन चर्चिल की एक बात यहां बड़ा इत्तफ़ाक रखती है उन्होने कुछ ऐसा कहा था " हम ऐसे बनते जा रहे है जहां सिर्फ़ पाने की लालसा है बल्कि हमें ऐसा बनना चाहिये कि हम दे क्या सकते है ।" क्यों कि देने का सुख प्राप्त करने के सुख से बड़ा है और गौरतलब ये कि आप तभी किसी को कुछ दे सकते है जब आप ह्रदय से देने के लायक हो आप का गार्जियन माइंड सजग व उच्च हो आप के संस्कार पवित्र व नेक हो यानी आप एक इंसान हो ? तभी ये संभव है अन्यथा नही ।
एक व्यक्ति की बात मेरे मन को बहुत आंदोलित कर गयी वह नाम है "पीटर ड्रकर" इन्होने ने कुछ ऐसा कहा है कि जब आप सुबह उठ कर आईने के सामने अपने आप को देख रहे हो तो सोचे कि हम एक ऐसे नागरिक बने जो अपने आस -पास की चीजों के प्रति जिम्मेदार व परोपकार की भावना से सेवा करे ! यह भी भारत की संस्कृति ने हमे न जाने कब से सिखाया कि "परोपकार से बड़ा कोई धर्म नही" पर शायद हम कभी नही समझे और यदि समझे होते तो यह सप्ताह मनाने की आवश्यक्ता ही क्यों पड़ती ?
खैर इस सप्ताह के संबध में महात्मा गांधी के साथ घटी एक घटना का सीधा संबध जोड़ा गया है जो निश्चित रूप से इस आंदोलन को उर्जा प्रदान करेगा ।
एक बार महात्मा उड़ीसा में किसी स्थान पर अपने चरखा मिशन के लिये धन इकट्ठा करने के लिये सभा को सम्बोधित कर रहे थे तमाम लोगों ने इस नेक काम में उन्हे दान स्वरुप धन राशियां दी इस फ़ंड के कर्ताधर्ता जमना लाल बजाज थे, संबोधन के उपरान्त एक गरीब व बूढ़ी महिला भीड़ से गुजरती हुई महात्मा के करीब आने की कोशिश कर रही थी लोगों ने उसे रोकने की नाकामयाब कोशिश शुरू -ए- की किन्तु वह महात्मा के पास पहुंच गयी और अपनी मैली साड़ी के पल्लू से एक तांबे का सिक्क निकालकर महात्मा की तरफ़ बड़ा दिया महात्मा ने सह्र्ष उसे ग्रहण करते हुये रख लिया इस बात पर जमना लाल बजाज ने हंसते हुये कहा बापू हम हज़ारों रूपये के चेक के मध्य इस तांबे के सिक्के का क्या करेगे तो बापू का जवाब था की तुम्हे इस रुपये के साथ साथ मुझ पर भी विस्वास नही है क्या यह मेरे लिये लाखों-करोणों से भी अधिक है और उससे भी अधिक है इस महिला के जज्बात जिसे नमन है! क्यो कि यदि किसी के पास लाखों है और वह उसमे से कुछ हज़ार मुझे दे देता है तो वह उतना मह्त्व पूर्ण नही है जितना यह सिक्का क्योंकि यह सिक्का इस महिला का सबकुछ है जिसे वह हमें दे रही है ।

यहां देने का मतलब ये नही है की आप दान देकर फ़ुरसत पा ले आप जरूरत मंद को स्नेह और विनम्रता से सहयोग करके देखे अवश्य आप का मन पल्लवित हो उठेगा

एक अति प्रासंगिक घटना:-
मुझे यहां पर अपने पिता जी की एक बात याद आती है जो उन्होने मुझे मेरे बचपन मे बताई थी  " जब बापू भारत की यात्रायें कर रहे थे गांव-गांव, शहर, खेत-खलिहान तो उन्होने एक जगह एक महिला को नदी में स्नान करते देखा, यह महिला नहाने के बाद अपनी आधी धोती (साड़ी ) से तन ढकती और आधी सुखाती और फ़िर सूखा हुआ भाग तन पर लपेट कर बचा हुआ भाग सुखाती, बापू की आत्मा को  इस दृश्य ने झकझोर दिया और उन्हो ने जाकर उस महिला को अपनी आधी खद्दर की धोती फ़ाड़ कर दे दी और शपथ ली कि मै अपना आधा तन तब तक नही ढकूगा जब तक इस देश के हर व्यक्ति के पास तन ढकने के लिये कपड़ा नही हो जाता और शायद यही से उनके चरखा मिशन की शुरूवात हुई उस महान आत्मा का प्रण जिसने दुनिया को सिखा दिया देने का सुख और वह चरखा जो हथियार बना अहिंसा का जिसकी बदौलत उस सल्तनत का सूरज दूब गया जो कभी नही डूबता था ।  शायद आप को भी "देने का सुख" कोई मिशन दे जाय और आप भी मानवता की राह मे कुछ ऐसा कर दे जो सदियों तक लोगों को लाभन्वित करता रहे । पिता जी ने जब मुझे ये वृतान्त सुनाया था तब शायद मेरा बालपन इसे पूरी तरह न समझ पाया हो पर आज जब मै यह वाकया लिख रहा हूं तो मेरा रोने का मन हो रहा है । क्योंकि हम उस मुल्क में रह्ते है जिसका आज़ादी के बाद अनियोजित विकास हुआ करोड़पति करोड़पति होते गये और गरीब गरीब, आदमी ने जो जहां चाहा पैसे और भ्रष्टाचार की बदौलत किया, चाहे वह वन्य जन्तुओं के घरों में घुस कर उनके आवास नष्ट करने का मसला हो या गरीब की झोपड़ी उजाड़ कर महल बनाने की प्रक्रिया..........................आदम इस धरती के प्राणियों को देना भूल ही गया बस छीनता चला गया, महाकवि तुलसी दास की एक चौपाई का एक टुकड़ा याद आता है "कि समरथ को नहि दोष गोसाई"


अब तो हमारे लोगों की आदत सी हो गयी है कुछ इस तरह ..................


न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

 हां अन्त में,  भाई अब खाली लेने देने से काम नही चलेगा कुछ बदलना होगा ?


कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-262727
भारतवर्ष
फ़ोन- 09451925997

Tuesday, September 15, 2009

हिन्दी दिवस और बेजुबान जानवर

कल हिन्दी दिवस था और विदा भी हो गया मामला जस का तस, अब पूछियें कि हिन्दी दिवस और बेजुबान जानवर में क्य संबध है ? बताता हूं । हमारी तमाम बोलियां, लिपियां, दुनियां में हमें भाषायी मामलें में सबसे धनी बनाती है पर क्या धनी होने का खिताब हमें मिला नही हां ऊपर से गैरो ने हम पर मेहरबानी ? करके अपनी भाषा जरूर थोप दी बेजुबान समझ कर जैसे हम अखबारों में रोज़ ही पड़ते है फ़लां गाय, साड़, या कुत्ता या फ़िर हिरन आदि के बारे में मीडिया विशेषण लगाती है अवारा, बेजुबान वगैरह वगैरह.........क्या आप सब ने कभी सोचा कि इन्हे अवारा किसने बनाया इस धरती पर ये हम से पहले से है और हमने इनके घरों में घुस कर इन्हे बेघर कर दिया और हमारी जबान में ये अवारा हो गये !!! बेजुबान क्यो ? धरती पर ऐसा कोइ जीव नही है जिसकी कोइ भाषा न हो ये अलग बात है कि हमने अग्रेजी पड़ने में इतना वक्त  जाया किया कि इनकी बेह्तरीन बोलियो से महरूम हो गये कोइ बात नही पर ये बेजुबान कैसे ! हम तो इतनी भाषाओं के धनी होने के बावजूद बेजुबानों की तरह अपनी जबान हिंदी के लिये लड़ते आये है पर हमें बेजुबान समझ कर कभी फ़ारसी तो कभी अंग्रेजी रटाई गयी और दुनिया की मेज पर हमें अगर कोइ बात कहनी होती है तो हम बेजुबानों की तरह या तो कुछ बोल नही पाते या फिर उन्ही की भाषा मे रिरियाने लगते है वाह क्या बात है .पर जब ये जानवर सदियों से अपनी अपनी बोली बोलते आ रहे है जिन मे लेशमात्र परिवर्तन हुआ हो शायद तब इन्हे हम बेजुबान कहते है अपनी अक्षमता के बजाय ...................!!

यहां मै किसी भाषा की बुराई नही कर रहा हूं आग्ल और फ़ारसी में दुनिया का बेह्तरीन साहित्य विग्यान भूगोल आदि आदि लिखा गया पर क्या हमने अपनी जुबान में ऐसे प्रयास किये ?
यहां मेरी अखबार और मीडिया के लोगों से गुजारिस है कि जबान वालों की जबान समझनें की कोशिश करे और प्रकृति में उनके सुन्दर गीतॊं को सुनने की कोशिश यकीन मानिये दुनिया के बेह्तरीन संगीत और गीत इस गीत के आगे फ़ीके पड़ जायेगे और धीरे धीरे आप इनकी बात समझने भी लगेगे ।

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन