Monday, October 6, 2008

तराई में बाढ़ की विभीषिका और जानवर

- डीयर पार्क लखीमपुर खीरी में बचा अन्तिम खरगोश

- बाढ़ से पूर्व यहाँ तीन खरगोश थे जो इस फोटो में देख सकते है

-बाढ़ में तीन दिनों से खडा ये चीतल मानो हमसे सहायता माग रहा हो

-तीन दिन पूर्व बाढ़ से पहले पार्क में मौजूद हिरन (चीतल)
- ब्लॉगर द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का अवलोकन

- ब्लॉगर द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रो का अवलोकन

- इंदिरा मनोरंजन वन में लेखक
चित्रों में दिख रहे बचे हुए सभी जानवरो को साउथ खीरी डी एफ़ ओ से कह कर बचा लिया गया यह कार्य करने के बाद मुझे बहुत आत्म संतुष्ट प्राप्त हुई 
बाढ़ प्रभावित लोग जो सड़को पर बसेरा बनाए हुए है
अक्टूबर
२००८ के आखिरी हफ़्ते में खीरी जनपद के बाढ़ ग्रस्त इलाकों के साथ साथ इंदिरा मनोरंजन वन का  जायजा लेना शुरु किया नज़ारे अदभुत और करुण थे प्रकृति के सौन्दर्य और विकराल रूप के दर्शन एक साथ हो रहे थे एक तरफ़ जलमग्न बगीचें तालाब, नदी-नाले,फ़सले और जंगल तो दूसरी तरफ़ डूबे हुए गांव और सड़कों पर आशियाना बनाये लोग, पानी मे बहते जानवर, मृते
जीवों की उतराती लाशे, जल की विभीशिका भोग चुके लोगों के मुरझाये चेहरे, पटवारी से बाढ़ राहत के लिये नाम लिखवाती भीड़ और नेताओं की बड़ी गाड़िया, राहत सामग्री बाटने के नाम पर फ़ोटो खिचवाते लोग और इन अधमरे लोगो का शोषण करते कुछ मौका परस्त लोग, बंधा बनाने के नाम पर ठेकेदारों की भीड़.........................!!!


बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों की सच्चाई ये है कि कोई भी वहां नही पहुचता जहां लोग इस आपदा को झेल रहे होते है सैकड़ों किलो मीटर तक फ़ैली बाढ़ और उसमे डूब चुके पूरे गांव के गांव जहां कोइ नही पहुंचता नेता और ही सरकारी अफ़सर और हां वहां आसानी से पहुन्चा भी नही जा सकता छप्परों और छतों पर फ़ंसे लोग खाली हो चुके गावों के बचे हुए कुत्ते जो छप्परों छतों पर सहारा लिए भूख से चिल्ला रहे थे जंगलों मे डूबते उतराते हिरन जंगली सुअर और जाने ्कितने जीव खैर यहां पर मै सिर्फ़ इन जानवरों की बात करना चाहूंगा क्यो कि इनका जिक्र मीडिया भी कम करती आई है!!

krishna Kumar Mishra


Sunday, October 5, 2008

आदमियों के जंगल में एक जानवर की मौत



My Beloved Dog is dying due to absence of rabies vaccination programme for dogs.

वह कब पैदा हुई मुझे नही मालूम पर उसकी मौत कब होगी ये मुझे पता है क्योकि वह मेरी आंखों के सामने मर रही है विना किसी इलाज़ के और अब उसका कोई अपना नही है जो उसकी इस पीड़ा में उसका ढाढस बंधाये उसकी रंगों में भी खून दौड़ता है उसके सीने में भी एक दिल है (हार्ट) उसके भी दो आंखें है जो करुण वेदना के बावजूद मुझे निहारती है जैसे........उसकी आंखों में भी चंचलता बसा करती थी कभी वह मुझसे लड़ती थी तो कभी स्नेह मिश्रित भाव से मुझे निहारती थी ्जब मै घर आता तो छोटे बच्चे की तरह रास्ते में मेरी राह देखती और मुझसे आगे आगे घर की और दौड़ती और हां वह बीच बीच में पीछे मुड़ कर भी देखलेती कि मै रहा हूं या नही उसकी तमाम यादें है मेरे पास और मेरे मुहल्ले के लोगो के पास भी पर अब सब खत्म हो रहा है उसे दूध बहुत पसन्द था अब जब मै दूध लेकर आता हूं तो उसकी याद आती है रात मे वह मेरे कम्प्यूटर टेबल के पास जाती और वही सो जाती ........मम्मी की वह बहुत दुलारी थी और उनकी बात भी बहुत मानती थी मेरी मां ने ही उसका नामकरण किया "काली" और अब वह पूरे मुहल्ले की प्रिय काली थी वह रह्ती तो मेरे घर में थी पर उसे पूरी आज़ादी थी अपनी जाति के लोगो के साथ रहने की वह रात मे बरामदे मे सोती तो उसकी मां घर के बाहर सीढ़ियों पर उसके बहुत से गार्जियन थे उसे वह सब बाते सिखाते जो आदि काल से उनके पूर्वज करते आये है वह उन सब के साथ खेलती शिकार करना सीखती यानि उसे दो जातियों का सानिध्य प्राप्त था और इसी लिये वह अदभुत थी मेरी काली.................
हुआ यूं कि आज से तकरीबन आठ महीने पहले मेरे पड़ोसी के एक लड़के ने उसे अपने घर रखा वह अपनी मां को ढ़ूड़ते मेरे घर की तरफ़ रही थी और उस नामुराद लड़के ने उसे अपने घर उस नन्हे जीव को रखा दो दिन बाद उसक शौक खत्म हो गया और वह लावारिस हो गई चूंकि उसकि मां और अन्य जीवो को मेरी मां खाना खिलाय करती है सो उसे भी भोजन मिलने लगा और उसने कुछ ज्यादा नजदीकिया बना ली मेरी मां से और मेरी मां ने तभी उसका नामकरण किया काली और काली अब लावारिस नही थी...............
एक दिन वह अपनी मां और अन्य साथियों के साथ किसी से लड़ रही थी वह गुस्से में थी मां ने उसे अलग कर दिया इस लड़ाई से तभी उस नामुराद पड़ोसी लड़के ने उस्के पीछे से अपना पैर लगा दिया काली गुस्से में थी उसने उसका पैर पकड़ लिया इस बात पर मुझे अचरज हुआ सो मैने कुछ मालिकाना हक दिखाते हुए उसके मुहं में पैर लगाया फिर क्या था काली दौड़ पड़ी मुझ पर और पकड़ लिया मेरा पैर उसका हल्का दांत भी लग गया मुझे मैने तुरन्त अपने पैर साबुन से धुले और बीटाडीन लगाकर काली को देखने लगा आखिर इसे क्या हो गया है लेकिन अब उसका व्यवहार बदल रहा था उसके नजदीक जो भी जाता उसे वह दौड़ा लेती यहां तक कि अपने से बड़े जान्वर को यह नन्ही सी जान खदेड़ देती यहां तक कि मेरी मोटर साईकल उसके नजदीक जाती तो वह उसका टायर चबाने लगती लेकिन उसके नजदीक अगर कोइ ना आये तो वह किसी से नही बोलती यहां तक कि उसने किसी को भी नही काटा अब भी मै जब कुछ सामान लेकर आता तो वह मुझे देखकर मेरे पास जाती और मेरे साथ साथ घर तक आती पर उसके आक्रोश और आक्रमण को देखकर मुझे उससे डर लगने लगा था वह अपने शरीर पर मख्खी भी बर्दास्त नही करती थी फिर भी मै उसे खाना देता तो वह नही खाती हां दूध वह अभी भी पी लेती थी कल दो दिन पहले उसने सुबह थोड़ा सा दही खाया उसके बाद वह तो बिस्कुट खाती और ही अपना प्रिय भोजन समोसा मेरी पीड़ा अब बढ़ रही थी उसकी हालात देखकर पर उसके नज़दीक जाने से डर लगरहा था कभी कभी वह अपना नाम काली कहने पर मेरी ओर देखती पर अब उसमे वह बात नही थी कुछ था जो उसे बदल रहा था आखिर कार मैने रैबीज़ के इन्जेक्शन लगवाना शुरु कर दिया था किन्तु काली को इन्जेक्शन लगाने की हिम्मत नही बची थी शायद उसने कुछ जहरीला जीव खा लिया हो या किसी ने उसे जहर दिया हो या फिर रैबीज़ का राक्षस उसे हम सब से दूर कर रहा था !!!
आज़ वह अपनी अन्तिम सांसे गिन रही है मुझ से दूर आज़ वह पूरे २४ घन्टे से मेरे घर नही आयी हां कल से उसकी ताकत उसका साथ छोड़ रही थी लगभग एक हफ़्ते में काली हम्से दूर होकर इस संसार को अलविदा कह र्ही है मेरे परिचित ने मुझे बताया कि काली यहां है मैने उसे देखा तो जमीन पैरो से खिसक रही हो ऐसे भाव उत्पन्न हो रहे थे और मुझे इतिहास के उस महापुरुष की याद रही थी जिसने यही सब देखकर संसार को त्याग दिया सिद्दार्थ.......
लोगो ने मुझे ढाढस बधाया पर अब सब खत्म हो रहा था मै कायरों कि तरह वहा से चला आया क्यो कि अब मै कुछ नही कर सकता था?
आज़ मुझे सरकारी व्यवस्था पर क्रोध रहा है एक तरफ़ प्राजातियां बचाने की बात हो रही है खासतौर से अगर कुत्तो की बात करे तो टी वी पर इंडियन डाग बचाओ का प्रचार आता है बड़ी संस्थायें आवारा कुत्तो को बचाने की बात करती है पर उन्हे नही मालूम कि इन कुत्तो को अवारा बनाया किसने और भाई ये आवारा क्यो है? ये भी उसी धरती पर रहते है जहां हम सब और ये हमसे पहले आये इस धरती पर और हमने इनके घर जंगल नष्ट कर अपनी बस्तिया बसाई और आज ये आवारा हो गये............यहां तक कि इन्होने आदि काल में हमारा साथ दिया जंगलों में खोन्खार जनवरों से हमारे घरों खेतों और बच्चों कि सुरख्शा की ह्मने इनका सदियों इस्तेमाल किया और अब जब जरूरत नही है तो ये आवारा है

आज रैबीज़ जैसा खतरनाक जानवर इन्हे खत्म कर रहा है और हम जर्मन शेफर्ड और ना जाने कितनी आनुवशिंक प्रदूशित प्राजातियों को पाल रहे है इन्सान ने कुत्ते की नस्ल ही बिगाड़ दी और जो हमारे वास्तविक प्राजाति है वह सड़को पर टुकड़े बटोरने और वही किसी वाहन से कुचल कर मर जाने को मजबूर है क्या हम भारतीय कुत्तों की नस्ल बचा पायेगे?
क्या सरकार रैबीज़ के टीके का इन्तअजाम करती है इन जानवरो> के लिये यदि हां तो कब और कहां मैने अपने जीवन में खीरी जन्पद में कभी ऐसे व्यवस्था नही देखी जबकि इन्सान और जानवरों दोनों के लिये यह जरूरी है क्या पशुचिकत्शालय और एन जी और नगरपालिकायें सिर्फ़ व्यक्तिगत कार्य करने के लिये है
अंत में बस ईश्वर से यही अनुरोध है कि इस के कष्ट दूर कर दे और इसकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे?


कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
९४५१९२५९९७

Thursday, October 2, 2008

हमसे पूछों मिज़ाज़ बारिस का हम जो कच्चे मकान वाले हैं


लखीमपुर खीरी सितम्बर की बेतहाशा बारिस ने धरती के बाशिन्दों को प्राकृतिक आपातकाल का एहसास करा ही दिया और जिसका अन्जाम इन्सान से ज्यादा जानवरों को भुगतना पड़ा इस आपातकाल की वजह कुदरत थी पर आपातकाल के नतीज़े इन्सान की गैर जिम्मेदाराना करतूतें जिसका खामियाजा कुदरत के सभी जीवो को भुगतना पड़ रहा है ये एक ऐसा विशाल चिठ्ठा है जिसे बाकायदा मै बयां न कर सकूं पर कोशिश जरूर करूगा.............

बारिस जिसकी जरूरत इस तपती धरती को थी इसके तालाबों, नदियों, जंगलों, खेतों, बगीचों और इन सब जगहों में रहने वाले तमाम जीव जिन्हे बिना पानी के अपना वजूद ज्यादा दिनों तक बानाये रखने में मुश्किलात आ रही थी उन्हे राहत तो मिल जानी थी पर इन्ही सब में से एक जिसे इंसान यानी आदम के नाम से जाना जाता है ने धरती को रस्के जिना होने मे रुकावट पैदा कर दी जिसकी इसे सख्त जरूरत थी

खीरी जनपद तराई क्षेत्र का विशाल जल स्रोतों वाला भूभाग है जहां दर्जनों नदियां जीवन धारा बनकर सदियों से बहती आ रही है यहां घाघरा, शारदा, गोमती जैसी विशाल जलधाराओं वाली महानदियां है तो पिरई, जम्हुहारी, सरायं, उल्ल, जौहरा, सुहेली और कठना जैसी छोटी जलधाराओं वाली सरितायें है जो यहां के वनों और फ़सलों को न जाने कब से सिंचित करती रही है पर अब उनका अस्तित्व लगातार मिटता जा रहा है वजह पहाड़ों पर वनों के नष्ट होने के कारण आती सिल्ट नदियों के किनारें अतिक्रमण और उनमे बहता औद्दोगिक कचड़ा और बारिस का कम होना ...........................................................................लेकिन इस बारिस के बावजूद भी इन्सानियत वछिंत रह गई इसके फ़ायदों से बल्कि नुकसान ज्यादा उठाना पड़ा वजह साफ़ नदियों में सिल्ट भर जाने से नदियों का छिछला होना इनके किनारों पर खेती जिससे नदियों के मुहाने संकरे होते जाना जिससे पानी नदियों मे बहने के बजाय इनसे बाहर आकर मानव आबादी में घुसता है और फ़िर हाय तौबा मचती है बाढ़ के नाम पर .................. शहरों और गावों में पोखरों, तालाबों, और विशाल जलाशयों जिनमें बरसात के पानी को अपने में समा लेने की क्षमता होती थी वे अब विलुप्त हो गये है कारण इन पर अवैध कब्जें...............जाहिर अब यह पानी हमारे घरों में भरता है और हम चिल्लाते है कि................फ़िर इस पर राजनीति होती है.................समाज सेवा भी ...............पर नतीजा सिफ़ड़............................इसका इलाज है बस हम अनियोजित विकास करना बंद कर दे और प्रकृति के मुताबिक सोचे और फिर सुनियोजित ढ़ग से पहल करे...........

अब इकबाल का सेर मुझे बेमानी लगता है............

गोदी में खेलती है जिसके हजार नदियां गुलशन है जिन के दम से रस्के जिऩा हमारा॥।

कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी

Friday, September 19, 2008

खीरी मे चन्दन की तस्करी

खीरी जनपद उत्तर प्रदेश जो अपनी वन्य संपदा के लिये पूरी दुनिया में जाना जाता है और इस अमूल्य संपदा पर डाका भी अपने ही डाल रहे है बस कुछ् रुपयों के लालच में !! वन विभाग के सूत्रों से ग्यात हुआ कि इस निकृष्ट काम को अंजाम देने वाले पांच व्यक्तियों को हिरासत में लिया गया है ये लोग उत्तर खीरी वन प्रभाग के मटेरा जंगल के पास ७० किलोग्राम चन्दन की लकड़ी के साथ हिरासत में लिये गये है सूत्र बताते है कि यह लोग कन्नोज के व्यापारियों से संपर्क बनाये हुए है मालूम हो कि कन्नौज पूरे एशिया में सुगंधित इत्र बनाने की जगह के रूप में मशहूर है।
ऐसा पहली बार नही हुआ है खीरी जनपद में चन्दन की अवैध तस्करी लगातार जारी है निर्बाध रूप से और शर्मनाक इस लिये क्योकि यहां पुलिस कप्तान के निवास से भी चन्दन के पेड़ काट लिये गये थे और शहरी क्षेत्र में लोगों के घरों और सरकरी आवसों से भी बचे हुये वृक्ष नदारद हो रहे और वन विभाग के कानून और शासन व्यवस्था कोइ माकूल हल निकाल पाये हो या निकाल रहे हो ऐसा नही मालूम होता !!!

जनपद में सरकारी लंबरदारों को चाहिये कि वह चन्दन व अन्य अमूल्य एवं विलुप्त हो रही औसधीय प्रजातियों के इलाकों को चिन्हित करे जहाँ ये बची हुई है और वहां वन गस्ती दल की सक्रियता सुनश्चित करे साथ ही स्थानीय जनमानस को जागरूक कर पर्यावरण संरक्षण में उनकी सहभागिता भी सुनश्चित करे और उन्हे अपनी राष्ट्रीय प्राकृतिक संपदा के सजग प्रहरी बनने की प्रेरणा दे और इस सब के लिये अफ़सरों को अपनी तानाशाही प्रवृति छोड़कर लोकतान्त्रिक भावना का प्रदुर्भाव करना पड़ेगा !! क्या यह संभव नही है ?

चन्दन और इसकी विशेषतायें
चन्दन( सेन्टालम अलबम ) सेन्टालेसी फ़ैमिली का वृक्ष है भारत में अतीत से इस प्रवित्र वृक्ष का पौराणिक एवं औशधीय महत्व रहा है हिन्दू सभ्यता में लोग इस वृक्ष की लकडी के बुरादे का लेप मस्तक पर लगाते है यह शीतलता प्रदान करने वाला और सिर दर्द में लाभकारी है साथ ही इससे प्राप्त तेल का प्रयोग इत्र बनाने में होता है जो पूरी दुनिया में पसन्द किया जाता है और इसके इसी व्यवसायिक महत्व के चलते इस प्राजाति की तस्करी लगातार बढ़ रही है। इसके तेल से प्राप्त रसायन अल्फ़ा सन्टालाल और बीटा सन्टालाल जो इसकी खुसबू और औशधीय गुणों के लिये जिम्मेदार है इससे मिलती जुलती प्राजाति अमीरिस बालसमिफ़ेरा है जो चन्दन होने का एहसास दिलाता है पर इस प्राजाति में वह गुण नही है जो चन्दन में होते है।

कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
९४५१९२५९९७


Friday, September 12, 2008

एक अदभुत कवक


एक नायाब रत्न भारतीया जैव विविधिता का
१० तारीख २००८ सुबह मुझे खेरी जनपद के मितौली ब्लाक से एक रिपोर्टर ने फ़ोन किया की उसने वहां कोई अजीब चीज देखी है मामला पृकृति से संबंधित था सो मैंने कैमरा उठाया और चल दिया उस गाँव जहाँ ग्रामीण जमीन से निकले शिव लिंग नुमा आकृति से घबराए हुए थे इस वस्तु से सड़े मांस की गंध आ रही थी जाहिर है तमाम मक्खियाँ इस पर भिनभिना रही थी ख़ास बात ये कि ये लिंग नुमा आकृति एक नही कई थी जो सफ़ेद अंडाकार गुल्लियों से निकल रही थी ग्रामीणों ने इन्हे एक घेरे में सुरक्षित कर लिया था और लोग इसे देखने के लिए मज़मा लगाये हुए थे जब मै वहां पहुँचा तो एक महिला विस्मयकारी दृष्टी से इसे निहार रही थी मेरी नज़र ज्यों ही इस वस्तु पर पड़ी मै मंत्र मुग्ध होकर इसे निहारता ही रहा इतनी खूबसूरती मैंने इस प्रकार कि चीज़ में कभी नही देखी थी कच्ची दीवार की नींव में गोल गोल अंडाकार रचनाओं से लिंग नुमा सफ़ेद व् लाल रंग की रचनाये स्फुटित हो रही थी
हकीकत में यह एक कवक था जिसे अंग्रेज़ी में फंगी या फंगस कहते है पर था तो यह एक मशरूम ही या फ़िर अखाद्य मशरूम जिसे गाँव में लोग कुकरमुत्ता कहते है ही की प्रजाति जीवविज्ञानी होने के नाते मैंने अपने अध्ययन के दौरान इस तरह की फंगस के बारे में नही पढ़ा था और अपनी जंगल यात्राओं में भी कभी नही देखा था हाँ जब मुझे अँगुलियों सदृस तेज गंध वाली संरचनाओं के बारे में बताया गया था तो एकबारगी मेरे मन आया की हो न हो ये डेड मैन्स फिंगर फंगस हो सकता है पर वह दिखने में बदसूरत होता है मैंने वहां कुछ तस्वीरें ली और लखीमपुर आकर इंटरनेट खंगालना शुरू किया साथ ही अपने पुस्तकालय की पुस्तके खंगाली नतीजा सामने ये आया की ये तो स्टिंक हार्न फंगस है यानी सींघ नुमा बदबूदार फंगस इसका वैज्ञानिक नाम म्युतिनस बैम्बुसिनस है इसकी तमाम प्रजातीयाँ है जो रंग व् आकार प्रकार में बहुत मिलाती जुलती है एक और प्रजाति है डेविल्स दिप्स्तिक जो काफ़ी समानता रखती है म्युतिनस बम्बुसिनस से, बहुत ऊहापोह के पश्चात् मैंने इसे कई वैज्ञानिक संस्थानों को भेजा साथ ही दिल्ली में आई आर जी संगठन के वैज्ञानिक डाक्टर कृष्ण कुमार को भी तस्वीर के साथ सूचित किया
इतनी मेहनत का कारण बताता चलू आप को की एक कुकरमुत्ते के पीछे क्यो भागा ये आदमी इसकी वजह है की अभी तक यह प्रजाति भारत में दर्ज नही की गई शायद यह पहली खोज होगी म्युतिनस बम्बुसिनस की अपने मुल्क में दूसरी वजह ये की जब तक हम अपने आस पास की चीजो को ध्यान से नही जांचे परखे गे तो उनके गुण दोषों की जानकारी प्राप्त नही होगी और बिना जानकारी के हम इन सब से होने वाले लाभों से वांछित रह जायेगे एक और बड़ी वजह है की जब अमेरिका हल्दी या नीम पेटेंट कराने की बात करता है तो हम हल्ला मचाते है और हमारी कोई नही सुनता इसके पीछे यही वजह है की हम अपने प्राकृतिक खजाने को अनदेखा करते चले आ रहे है न तो हम इसका अध्ययन करते है और न ही इसे सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों में दर्ज करते है नतीजा ये होता है हमारी संपदा पर जब कोई डाका डालता है तो हमारे पास उस चीज़ को अपना कहने का और दूसरो को यह मनवाने का कोई सबूत नही होता, भारत की अतुल्य जैव विविधिता का अध्ययन और संरक्षण निहायत जरूरी है क्यो की दुनिया में हमसे कही अधिक मेहनती और दिमागदार लोग है जो हमें हमारी ही चीजों से वांछित कर देने की माद्दा रखते है, हमें उनसे आगे निकलना है|

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन लखीमपुर खेरी
9451925997

Saturday, September 6, 2008

रेल पथ पर हुई एक और बाघ की मौत - दोषी कौन ?


५/६ सितम्बर २००८ की रात को दुधवा टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने वाले रेल पथ पर एक और जी्व की मौत हो गई इस जीव को भारतीय वन्य जीव अधिनियम मे से्ड्युल वन मे रखा गय है और पूरी दुनिया इस नायाब जानवर को बचाने मे अपन सहयोग दे रही है इसे हिन्दु मन्यताओं में दे्वी दुर्गा का वाहन माना गया है तो जिम कार्बे्ट जैसे शिकारी ने इसे बिग हरटेड जेनटल मैन कहा, भारत ही नही पूरी दुनिया कुदरत की इस बेह्तरीन कृति की एक झलक पाने को लालायित रहती है और यह पारिस्थिति्की तन्त्र के सर्वोच्च स्थान पर विराजमान जीव उस तन्त्र के सन्तुलन और सवंर्धन मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर्ता है शिकार करने के पूर्व इसकी शान्त मन: स्थित और शिकार के वक्त इसका विकराल रूप हमें शिव अर्थात रुद्र का अहसास कराता है जैसे विनाश के पूर्व की शान्ति !॒! तो इसे आप जंगल का कुशल कूतिनीतिक चाणक्य भी कह सकते है ये जन्गल में जीवों का शिकार भी करता है और उनकी वृ्द्धि और संरक्षण में भी सहायक है ये जंगल का रक्षक भी है और इसकी शक्ति एवं सुन्दरता का जिक्र मै शब्दो में तो कर ही नही सकता जिसे आप स्वमं महसूस कर सकते हो किसी अभयारण्य मे इसे देखकर ! टाइगर ! टाइगर !

किन्तु अब ये अपने घरो से बेदखल किये जा रहे है मानव जाति के स्वार्थों के कारण जंगलों कॊ खॆतिहर जमीनों में तब्दील कर या मानव आबादी बसा कर या फिर शिकार ऐसे तमाम कृत्य है मानव जाति के जिनका पूरा पूरा बयान करना मेरे लिये मुश्किल है पर मानव जाति को इतना तो मालूम ही होना चाहिये और शायद पता भी है कि प्रकृति के साथ उनका मौजूदा बर्ताव वैसे ही है जैसे जिस डाल पर हम बैठे हो और उसी को काट रहे हो !!

हां अब सरकार को भी ये तय कर लेना पडेगा कि उसे किसके हितो को प्राथमि्कता देनी है और किसे प्राथमिकता देने से दोनों यानि मनु्ष्य और अन्य जीवों को लाभ पहुंचेगा खाली प्रोजे्क्ट बना देने से और कागज़ों पर तसवीरें छापनें से इन वन्य जीवों को हम नही बचा पायेगे और अगर ये नही होगे तो हम अपने वजूद को भी न समझे इस ग्रह पर यह निश्चित है।

दुधवा टाइगर रिजर्व मे आये दिन कोइ न कोइ वन्य जीव इन बेलगाम और वन्य जीव अधिनियम के सारे नियमोम को ताक पर रखकर चलने वाली रेलगाड़ियों से टकराकर मरता है और थोड़ा बहुत हल्ला मचने के बाद सब कु्छ फिर जस का तस आखिर कोइ तो विकल्प होगा कि आइन्दा से कोइ निरीह वन्य जीव मानव जनित कारणों से न मरे ! बीती रात एक नर बाघ गोंडा पलिया रेलमार्ग पर मझरा पूरब के आस-पास तेजगति से आती हुइ ट्रेन से टकरा कर छत-विछत हो गया उसके शरीर के तमाम अंग गायब हो गये सूत्र बताते है कि यह जवान बाघ शायद ट्रेन से टकराने के बाद मीलों पटरियों और ट्रेन के मध्य फंसकर घिसटा है नतीजतन इसके सारे अंग भंग हो गये ।
अब ये सुनिश्चित होना चाहिये कि हम या तो बाघ बचाये या अभयरण्यों से होकर गुजरने वाले रेलपथों पर ट्रेन चलाये खासबात यह है कि इन जंगलों में ये रेलपथ ब्रिटिश हुकूमत में लकड़ी कटान के लिये बिछाये गये थे और अब इन्हे अगर उखाड़ भी दिया जाय तो कोई खास फर्क नही पड़ने वाला न तो भारतीया रेल विभाग के रेवेन्यू पर और न ही यातायात पर क्यो कि तमाम अन्य विकल्प मौजूद है साथ ही वन्य जीवों कि अमूल्य कीमत के वनस्पति रेल मार्ग को विस्थापित करना अधिक आसान है और सस्ता है जिससे हम अपने इस अमूल्य वन्य संपदा को बचा सकते है
यहां मै एक सुझाव देना चाहूगा कि ट्रेन के इंजन के अगले हिस्से में एक मुलायम रबड़ य प्लास्टिक का चौकोर वाइपर नुमा टुकड़ा लगा सकते है जिससे चलती ट्रेन के आगे जो भी जीव आयेगा वह उस मुलायम वस्तु से टकराकर पटरियों से अलग किनारे हट जायेगा और उसे कोइ नुकसान भी नही होगा इसके साथ साथ ट्रेन की गति जंगली इलाको में सख्ती के साथ सुनश्चित करनी होगी और उसका पालन हो रहा है या नही इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा क्यो कि दुधवा अभयारण्य से गुजरती ये ट्रेनें धड़धड़ाती हुई गति निर्धारण के सभी नियमों की खिल्ली उड़ाती वन्य जीवों को कुचलती हुई चलती है जिनमे सिर्फ़ कुछ मामले ही प्रकाश मे आते है !

अंत मे एक बात और ट्रेन जैसी विशाल और गर्जना करने वाली वस्तु से ये जंगल का राजा कैसे टकरा जाता है क्यो कि ट्रेन के आने से मीलो पहले पटरिया झनझनाने लगती है नजदीक आते आते ट्रेन की आवाज़ की गर्जना बढ़ती है साथ में रात मे तेज़ रोशनी करने वाली हेड लाइट और हार्न की आवाज़ क्या ये अति संवेदनशील जीव इन सब को नही भांप पाते साथ ही ब्रिटिश इण्डिया मे ये ट्रेने इन्ही रेलपथो से गुजरती थी तब ये जंगल और घने थे जाहिर है बाघ तेन्दुआ हाथी आदि जानवरों की तादाद भी ज्यादा थी फिर ये घटनाये क्यो नही घटती थी जैसा कि आज घट रही है एक बात और कि हमारे दुधवा के बाघों का इस रेल पथ से तकरीबन १०० साल पुराना रिश्ता है हाँ इन हाथियों के साथ जो घटनाए दुधवा में घटी उन्हें तो एक्सीडेंट माना जा सकता है क्यो कि दुधवा में आज से लगभग १०० वर्ष पहले ही हाथियों ने अलविदा कह दिया था और तब इस जंगल में से होकर रेल भी नही गुजराती थी आज जो भी जंगली हाथी दुधवा आते है वो नेपाल के है और मालुम हो कि नेपाल में रेलवे नही है और वहां के जंगली जीव रेल से परिचित नही है शायद इसी लिए ये हाथी अपने जैसे भीमकाय रेल इंजन को देखकर भी पटरियों से नही हटते होगे खैर इन बेशकीमती वन्य जीवों की मौत के पीछे कोई रहस्य तो नही छुपा है !!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
९४५१९२५९९७