Friday, September 12, 2008

एक अदभुत कवक


एक नायाब रत्न भारतीया जैव विविधिता का
१० तारीख २००८ सुबह मुझे खेरी जनपद के मितौली ब्लाक से एक रिपोर्टर ने फ़ोन किया की उसने वहां कोई अजीब चीज देखी है मामला पृकृति से संबंधित था सो मैंने कैमरा उठाया और चल दिया उस गाँव जहाँ ग्रामीण जमीन से निकले शिव लिंग नुमा आकृति से घबराए हुए थे इस वस्तु से सड़े मांस की गंध आ रही थी जाहिर है तमाम मक्खियाँ इस पर भिनभिना रही थी ख़ास बात ये कि ये लिंग नुमा आकृति एक नही कई थी जो सफ़ेद अंडाकार गुल्लियों से निकल रही थी ग्रामीणों ने इन्हे एक घेरे में सुरक्षित कर लिया था और लोग इसे देखने के लिए मज़मा लगाये हुए थे जब मै वहां पहुँचा तो एक महिला विस्मयकारी दृष्टी से इसे निहार रही थी मेरी नज़र ज्यों ही इस वस्तु पर पड़ी मै मंत्र मुग्ध होकर इसे निहारता ही रहा इतनी खूबसूरती मैंने इस प्रकार कि चीज़ में कभी नही देखी थी कच्ची दीवार की नींव में गोल गोल अंडाकार रचनाओं से लिंग नुमा सफ़ेद व् लाल रंग की रचनाये स्फुटित हो रही थी
हकीकत में यह एक कवक था जिसे अंग्रेज़ी में फंगी या फंगस कहते है पर था तो यह एक मशरूम ही या फ़िर अखाद्य मशरूम जिसे गाँव में लोग कुकरमुत्ता कहते है ही की प्रजाति जीवविज्ञानी होने के नाते मैंने अपने अध्ययन के दौरान इस तरह की फंगस के बारे में नही पढ़ा था और अपनी जंगल यात्राओं में भी कभी नही देखा था हाँ जब मुझे अँगुलियों सदृस तेज गंध वाली संरचनाओं के बारे में बताया गया था तो एकबारगी मेरे मन आया की हो न हो ये डेड मैन्स फिंगर फंगस हो सकता है पर वह दिखने में बदसूरत होता है मैंने वहां कुछ तस्वीरें ली और लखीमपुर आकर इंटरनेट खंगालना शुरू किया साथ ही अपने पुस्तकालय की पुस्तके खंगाली नतीजा सामने ये आया की ये तो स्टिंक हार्न फंगस है यानी सींघ नुमा बदबूदार फंगस इसका वैज्ञानिक नाम म्युतिनस बैम्बुसिनस है इसकी तमाम प्रजातीयाँ है जो रंग व् आकार प्रकार में बहुत मिलाती जुलती है एक और प्रजाति है डेविल्स दिप्स्तिक जो काफ़ी समानता रखती है म्युतिनस बम्बुसिनस से, बहुत ऊहापोह के पश्चात् मैंने इसे कई वैज्ञानिक संस्थानों को भेजा साथ ही दिल्ली में आई आर जी संगठन के वैज्ञानिक डाक्टर कृष्ण कुमार को भी तस्वीर के साथ सूचित किया
इतनी मेहनत का कारण बताता चलू आप को की एक कुकरमुत्ते के पीछे क्यो भागा ये आदमी इसकी वजह है की अभी तक यह प्रजाति भारत में दर्ज नही की गई शायद यह पहली खोज होगी म्युतिनस बम्बुसिनस की अपने मुल्क में दूसरी वजह ये की जब तक हम अपने आस पास की चीजो को ध्यान से नही जांचे परखे गे तो उनके गुण दोषों की जानकारी प्राप्त नही होगी और बिना जानकारी के हम इन सब से होने वाले लाभों से वांछित रह जायेगे एक और बड़ी वजह है की जब अमेरिका हल्दी या नीम पेटेंट कराने की बात करता है तो हम हल्ला मचाते है और हमारी कोई नही सुनता इसके पीछे यही वजह है की हम अपने प्राकृतिक खजाने को अनदेखा करते चले आ रहे है न तो हम इसका अध्ययन करते है और न ही इसे सरकारी और गैरसरकारी संस्थानों में दर्ज करते है नतीजा ये होता है हमारी संपदा पर जब कोई डाका डालता है तो हमारे पास उस चीज़ को अपना कहने का और दूसरो को यह मनवाने का कोई सबूत नही होता, भारत की अतुल्य जैव विविधिता का अध्ययन और संरक्षण निहायत जरूरी है क्यो की दुनिया में हमसे कही अधिक मेहनती और दिमागदार लोग है जो हमें हमारी ही चीजों से वांछित कर देने की माद्दा रखते है, हमें उनसे आगे निकलना है|

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन लखीमपुर खेरी
9451925997

Saturday, September 6, 2008

रेल पथ पर हुई एक और बाघ की मौत - दोषी कौन ?


५/६ सितम्बर २००८ की रात को दुधवा टाइगर रिजर्व से होकर गुजरने वाले रेल पथ पर एक और जी्व की मौत हो गई इस जीव को भारतीय वन्य जीव अधिनियम मे से्ड्युल वन मे रखा गय है और पूरी दुनिया इस नायाब जानवर को बचाने मे अपन सहयोग दे रही है इसे हिन्दु मन्यताओं में दे्वी दुर्गा का वाहन माना गया है तो जिम कार्बे्ट जैसे शिकारी ने इसे बिग हरटेड जेनटल मैन कहा, भारत ही नही पूरी दुनिया कुदरत की इस बेह्तरीन कृति की एक झलक पाने को लालायित रहती है और यह पारिस्थिति्की तन्त्र के सर्वोच्च स्थान पर विराजमान जीव उस तन्त्र के सन्तुलन और सवंर्धन मे अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर्ता है शिकार करने के पूर्व इसकी शान्त मन: स्थित और शिकार के वक्त इसका विकराल रूप हमें शिव अर्थात रुद्र का अहसास कराता है जैसे विनाश के पूर्व की शान्ति !॒! तो इसे आप जंगल का कुशल कूतिनीतिक चाणक्य भी कह सकते है ये जन्गल में जीवों का शिकार भी करता है और उनकी वृ्द्धि और संरक्षण में भी सहायक है ये जंगल का रक्षक भी है और इसकी शक्ति एवं सुन्दरता का जिक्र मै शब्दो में तो कर ही नही सकता जिसे आप स्वमं महसूस कर सकते हो किसी अभयारण्य मे इसे देखकर ! टाइगर ! टाइगर !

किन्तु अब ये अपने घरो से बेदखल किये जा रहे है मानव जाति के स्वार्थों के कारण जंगलों कॊ खॆतिहर जमीनों में तब्दील कर या मानव आबादी बसा कर या फिर शिकार ऐसे तमाम कृत्य है मानव जाति के जिनका पूरा पूरा बयान करना मेरे लिये मुश्किल है पर मानव जाति को इतना तो मालूम ही होना चाहिये और शायद पता भी है कि प्रकृति के साथ उनका मौजूदा बर्ताव वैसे ही है जैसे जिस डाल पर हम बैठे हो और उसी को काट रहे हो !!

हां अब सरकार को भी ये तय कर लेना पडेगा कि उसे किसके हितो को प्राथमि्कता देनी है और किसे प्राथमिकता देने से दोनों यानि मनु्ष्य और अन्य जीवों को लाभ पहुंचेगा खाली प्रोजे्क्ट बना देने से और कागज़ों पर तसवीरें छापनें से इन वन्य जीवों को हम नही बचा पायेगे और अगर ये नही होगे तो हम अपने वजूद को भी न समझे इस ग्रह पर यह निश्चित है।

दुधवा टाइगर रिजर्व मे आये दिन कोइ न कोइ वन्य जीव इन बेलगाम और वन्य जीव अधिनियम के सारे नियमोम को ताक पर रखकर चलने वाली रेलगाड़ियों से टकराकर मरता है और थोड़ा बहुत हल्ला मचने के बाद सब कु्छ फिर जस का तस आखिर कोइ तो विकल्प होगा कि आइन्दा से कोइ निरीह वन्य जीव मानव जनित कारणों से न मरे ! बीती रात एक नर बाघ गोंडा पलिया रेलमार्ग पर मझरा पूरब के आस-पास तेजगति से आती हुइ ट्रेन से टकरा कर छत-विछत हो गया उसके शरीर के तमाम अंग गायब हो गये सूत्र बताते है कि यह जवान बाघ शायद ट्रेन से टकराने के बाद मीलों पटरियों और ट्रेन के मध्य फंसकर घिसटा है नतीजतन इसके सारे अंग भंग हो गये ।
अब ये सुनिश्चित होना चाहिये कि हम या तो बाघ बचाये या अभयरण्यों से होकर गुजरने वाले रेलपथों पर ट्रेन चलाये खासबात यह है कि इन जंगलों में ये रेलपथ ब्रिटिश हुकूमत में लकड़ी कटान के लिये बिछाये गये थे और अब इन्हे अगर उखाड़ भी दिया जाय तो कोई खास फर्क नही पड़ने वाला न तो भारतीया रेल विभाग के रेवेन्यू पर और न ही यातायात पर क्यो कि तमाम अन्य विकल्प मौजूद है साथ ही वन्य जीवों कि अमूल्य कीमत के वनस्पति रेल मार्ग को विस्थापित करना अधिक आसान है और सस्ता है जिससे हम अपने इस अमूल्य वन्य संपदा को बचा सकते है
यहां मै एक सुझाव देना चाहूगा कि ट्रेन के इंजन के अगले हिस्से में एक मुलायम रबड़ य प्लास्टिक का चौकोर वाइपर नुमा टुकड़ा लगा सकते है जिससे चलती ट्रेन के आगे जो भी जीव आयेगा वह उस मुलायम वस्तु से टकराकर पटरियों से अलग किनारे हट जायेगा और उसे कोइ नुकसान भी नही होगा इसके साथ साथ ट्रेन की गति जंगली इलाको में सख्ती के साथ सुनश्चित करनी होगी और उसका पालन हो रहा है या नही इस बात का भी ध्यान रखना पड़ेगा क्यो कि दुधवा अभयारण्य से गुजरती ये ट्रेनें धड़धड़ाती हुई गति निर्धारण के सभी नियमों की खिल्ली उड़ाती वन्य जीवों को कुचलती हुई चलती है जिनमे सिर्फ़ कुछ मामले ही प्रकाश मे आते है !

अंत मे एक बात और ट्रेन जैसी विशाल और गर्जना करने वाली वस्तु से ये जंगल का राजा कैसे टकरा जाता है क्यो कि ट्रेन के आने से मीलो पहले पटरिया झनझनाने लगती है नजदीक आते आते ट्रेन की आवाज़ की गर्जना बढ़ती है साथ में रात मे तेज़ रोशनी करने वाली हेड लाइट और हार्न की आवाज़ क्या ये अति संवेदनशील जीव इन सब को नही भांप पाते साथ ही ब्रिटिश इण्डिया मे ये ट्रेने इन्ही रेलपथो से गुजरती थी तब ये जंगल और घने थे जाहिर है बाघ तेन्दुआ हाथी आदि जानवरों की तादाद भी ज्यादा थी फिर ये घटनाये क्यो नही घटती थी जैसा कि आज घट रही है एक बात और कि हमारे दुधवा के बाघों का इस रेल पथ से तकरीबन १०० साल पुराना रिश्ता है हाँ इन हाथियों के साथ जो घटनाए दुधवा में घटी उन्हें तो एक्सीडेंट माना जा सकता है क्यो कि दुधवा में आज से लगभग १०० वर्ष पहले ही हाथियों ने अलविदा कह दिया था और तब इस जंगल में से होकर रेल भी नही गुजराती थी आज जो भी जंगली हाथी दुधवा आते है वो नेपाल के है और मालुम हो कि नेपाल में रेलवे नही है और वहां के जंगली जीव रेल से परिचित नही है शायद इसी लिए ये हाथी अपने जैसे भीमकाय रेल इंजन को देखकर भी पटरियों से नही हटते होगे खैर इन बेशकीमती वन्य जीवों की मौत के पीछे कोई रहस्य तो नही छुपा है !!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
९४५१९२५९९७

Sunday, August 31, 2008

क्या पुरा हिन्दोस्तान सडकों पर बस जायेगा

मै जब भी लखीमपुर से राजा लोने सिंह मार्ग से अपने गावं मैनहन के लिए चलता हूँ तो प्रकृति के वह सारे नज़ारे देखने कि कोशिस करता हूँ जो सड़क के दोनों तरफ़ दिखाई देते है सड़क दोनों तरफ़ झाडियों में खिले जंगली पुष्प बेले और विशाल वृक्ष जिनपर चहकती चिडियां और न जाने क्या क्या जो .......... पर मेरे इस मार्ग पर २० वर्ष के निरंतर प्रकृति अवलोकन में अब बाधा आने लगी इसका जिक्र कुछ यूँ है .....मुझे अक्सर एक बात से बड़ी उलझन होती है जिसे मैं आज यहां टीपे दे रहा हूं जब मैं किसी सड़क से गुजरता हूँ जाहिर है सड़क से ही गुजरूगां, तो सड़कों पर बसते आ रहे लोगों को देखकर बड़ी खीझ होती है और लगाने लगता है कल हमारा सारा मुल्क क्या सडकों पर ही आजायेगा ये कैसा अनियोजित विकास होगा और कैसी बदनुमा शक्ल होगी इस विकास की ये तो भविष्य कि पीढियां देखेगी लेकिन आज जितना जो हो रहा है उससे नही लगता कि हम उसी विशाल और गौरवशाली सभ्यता के वारिस है जिसे सिन्धु घाटी सभ्यता कहते उस सभ्यता कि नगरीय सरंचना सड़के जलनिकास का प्रबंधन आदि आदि ...........अब आज के नगरो को देखिये जहां देखो लोंग बसते जा रहे है और कैसे भी बिना किसी सुनियोजित सोंच और व्यवस्था के खैर नगरों कि बात यहाँ नही करते बात है भारतीय मुख्य मार्गों की जहाँ लोंग शहरों और गावों से निकल कर इन सड़कों पर बसते आ रहे है और जिस तरह से यह अतिक्रमण करते है उससे लोगों का इन सडकों पर निकलना दूभर है ही और लगता है भविष्य में ये लोंग इन सड़कों को बजबजाती नालियों में तब्दील कर देगे फिर कभी भी आप घर से निकल कर प्रकृति का नज़ारा नही ले पायेगे न तो तो आप को खेत-खलिहान दिखेगे और न ही वन विभाग द्वारा कराया गया पथ वृक्षारोपण क्यो कि सडकों के दोनों तरफ़ अट्टालिकाएं होगी और इन भवनों के आगे बने व्यावसायिक प्रतिष्ठान और इन प्रतिष्ठानों के सामने आने वाले वृक्ष तेजाब डालकर सुखादिये गए होगे जैसा कि अभी हो रहा है फिर क्या आप सैकडों मील का रास्ता एक नाली नुमा उपर से खुली कुछ कुछ पाइप जैसी सरंचना से होकर तय करेगे साथ ही इतने आबादी जो सड़क पर होगी के कारण आप के वहां कि गति निम्नतर होने पर भी लोंग आप से आ कर टकरायेंगे और भी न जाने कितने झंझट होगे जिन्हें आप ख़ुद सोचियेगा मै यहाँ योरोप के मुल्को की मिशाल नही दूँगा कि कितना सुनियोजित विकास है ..........इस लिए नगरो और गावों की सीमायें निर्धारित होनी चाहिए क्यो हमारे मुल्क कि धरती इतनी कम नही है की हम सडकों पर आकर बसे इस लिए सरकार को सुनियोजित विकास के लिए कोई न कोई पहल करनी होगी ताकि हिन्दोस्तान सडकों पर आने से बच सके और एक खूबसूरत मुल्क बन सके .......कहते है रोम एक दिन में रोम नही बना था ............


कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी

Wednesday, August 27, 2008

Rivers of kheri district on the road of extinction

जब पूरी दुनिया प्रदूषण नियंत्रण व पर्यावरण शुद्धीकरण के लिये तमाम उपाय कर
रहा है ऐसे मे हमारे देश के कुछ उद्दमी (बिजनेस मैन ) हमारे पर्यावरण को
प्रदूषित करने पर तुले हुए है, इस्क एक नही कई उदाहरण खीरी जनपद मे मौजूद है
यह जनपद छोटी बडी एक दरजन नदियो वाला सुन्दर भूभाग है जहा शाखू के विशाल वन
है किंतु यहा के चीनी मीलों ने इन नदियों मे अपना प्रदूषित जल छोड कर इन नदियो के
परिस्थितिक तंत्र को नष्ट कर इनमे रहने वाले जीवो को समूल समाप्त कर दिय है साथ
ही साथ आस पास कि कृषि भूमि पर भी जहरीला प्रभाव छोडा है इन सभी कारणो
के चलते जमीन मे अर्सैनिक जैसे घातक तत्व मिलने लगे है सरायन व कण्डवा नदी
सबसे अधिक प्रदूषित हो चुकी है
विशाल नदियो मे प्रदूषण फौरी तौर से नही जाना जा सकता किंतु छोती नदिया गन्दे
नालो मे तब्दील हो चुकी है और ऐसा नहि कि एह राज की बात है और शासन व प्रशासन
से छुपी है जब भी कोइ इन नदियो के निकट से गुजरता है तो इन नदियों का काला हो
चुका पानी बदबू से मन को विचलित कर देता है प्रदुषण नियंत्रण विभाग को धता
बताते हुए ये उद्योग हमरी धरती को बंजर और पर्यावरण को जहरीला बना रहे है यदि
जल्दी इस बाबत कोइ कदम नही उठाये गये तो इस जहर के दूरगामी परिणाम बहुत भयानक
होगे. इतना हीद नही बड़े बड़े अफसरान इन नदियों के पुलों से होकर गुजरते है और देखते भी है कि जल प्रदूषण के सभी नियमों और को टाक पर रख कर ये मिल मालिक बाकायदा सीमेंट कि पाइप लाइनों को इन नदियों तक लाये है जिसके द्बारा मीलों का जहरीला पानी नदियों तक आता है क़ानून को जब ये कुछ नही समझते तो जनमानस को इससे कितना नुकसान हो रहा है इसकी बात ही करना बेमानी होगा और इस जहरीले पानी से कितने लाख मछलियाँ सर्प कीड़े सियार लोमड़ी खरगोश जलीय वनस्पतियाँ और मवेशी मृत्य को प्राप्त हो चुके है ये कहना हास्यापद होगा |
और फिर भी हम अपने बुजर्गो और इतिहास का तथा खास्स्त्यौर इस नज़्म को लिखने वाले उस महँ फनकार का जिसे हम अल्लामा इकबाल कहते है का मजाक उडाते है ये गीत गाकर सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा ........

जरा सोचिये
कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी

Monday, August 25, 2008

An Ultimate Flower in Rural India


पदबिछुआ एक पुष्प जो किसी का भी मन मोह ले और इस पुष्प से मेरी मुलाक़ात १७ अगस्त २००८ को रक्षाबंधन के शुभ अवसर के एक दिन उपरांत हुई हुआ ये कि मैं और मेरी माता जी मेरे ननिहाल गए थे माँ को जो मामा के राखी बांधनी थी रात में मेरी जागने की आदत जिसमे ये इन्टरनेट की बड़ी कृपा है के कारण मैंने उस रात दो पुस्तके पढ़ डाली एक तो दयानंद सरस्वती की सत्यार्थ प्रकाश और दूसरी मेरे नाना पंडित राम लोटन शास्त्री की हस्तलिखित पुस्तक जो ब्राह्मण समाज पर आधारित है सुबह हुई नही कि मै गांव की सुबह का आनंद लेने उठ पड़ा और चल दिया गाँव की सड़क पर यहाँ चारो तरफ़ हरियाली ही हरियाली और सड़क के दोनों तरफ़ खेत जलमग्न, नज़ारा मन को भा रहा था लोग सड़को पर खड़े आपस में बातें कर रहे थे कुछ इधर उधर आ जा रहे थे क्यो की अब बरसात की अधिकता से सड़क ही बची थी जहाँ लोग बाग़ चहल कदमी कर सकते थे अपने घरों से निकालने के बाद ..............

कुछ दूर चलने पर इसी सड़क के किनारे एक बड़ी पत्ती वाला एक पौधा दिखा जिसमे बेहतेरीन गुलाबी रंग के पुष्प सुबह की मदमस्त हवा में हिचकोले खा रहे थे मैंने यह पुष्प अपने जीवन में पहली बार देखा लेकिन तभी मेरे एक मामा ने बताया की तुम बचपन में इन फूलों और इनके बीजों से खेला करते थे पर मेरी बालपन स्मृतियाँ विस्मृत हो चुकी थी और अब मेरा प्रकृतिवादी शोधार्थी मन इस पुष्प का विश्लेषण विज्ञानं की जबान में करना चाहता था मामा ने जब इसका देशी नाम बताया तो उसने मुझे और आकर्षित किया और इसके दो झुकाव दार दांत नुमा बीजों के बारे जिसे मैंने कभी खेल में प्रयोग किया होगा बताते है की बच्चे इन बीजों को एक दूसरे में फंसा कर जोर आजमायिस करते है क्यो की इन बीजों के दो घुमाव दार दांत बिल्कुल मानो किसी मांसभक्षी जानवर के कैनाइन दांत हो की तरह होते है और दो बीजों को आपस में फंसा देने पर कितनी भी ताकत लगाई जाए टूटते नही है और यही कारण है की ये बच्चों में प्रिय है खैर इस पुष्प वृक्ष का नाम है पदबिछुआ जिसके दो अर्थ है और बखूबी इसके नाम को परिभाषित करते है पद यानी पावं बिछुआ यानी श्रंगार का आभूषण जिसे महिलायें अपने पैर की अँगुलियों में धारण करती है और दूसरा अर्थ ये की पद यानी पावं में बिच्छू की तरह चुभने वाला बिछुआ क्योकि इसके दो मुडें दांत जो पैर में चुभ जाए तो निकालना मुस्किल हो जाए जैसे शेर के अगले दांत जो मांस में धसने के बाद उसे फाड़ देने पर ही बहार आ सकते है ........................................

पर न जाने क्यो मुझे लगता है की इस वनस्पति का विशेष औषधीय मह्त्व होगा वैसे तो प्रकृति में सभी वनस्पतीय विशेष और बिलक्षण गुणों से युक्त है पर इसमे मुझे कुछ खाश नज़र आता है हो सकता है इसके पुष्प और बीज की अद्भुत बनावट का आकर्षण हो ...........................

अंत में एक बात कहना चाहूँगा की वनास्पतिशाश्त्रीओ को नॅशनल पार्क और उद्यानों से हट कर गावों की वनस्पति पर भी ध्यान देना चाहिए क्योकि अभी भी गाँव की पुरानी बागों और झुरमुटों में झांकती अद्भुत
वनस्पतियाँ जिनमे जनकल्याण की तमाम खूबियाँ हो सकती है और ये विश्व के संज्ञान में नही है इस पुष्प से जुड़ी तमाम धार्मिक सामाजिक गतिविधियाँ और औषधीय महत्त्व के सन्दर्भ में --------------------
आप में से किसी को भी यदि इस पुष्प से सम्बंधित जानकारी हो तो मेरा ज्ञान वर्धन करने की कृपा करे |

कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
9451925997

Friday, June 20, 2008

एक मां और उसका मातृत्व


फोटो: अज़गर का अण्डा जिसमे से बच्चा निकल चुका है ।फोटो: लकड़ी के बक्शे में अज़गर के बच्चे ।
फोटो: लकड़ी के बक्शे में अज़गर के बच्चे ।
फ़ोटो: अज़गर का बच्चा |
फ़ोटो: २७/६/२००८ को अण्डों से अज़गर के बच्चे निकलना शुरू हुए। ७ जुलाई २००८ को इन नन्हे अज़गरो को बेलरायां के जंगलों में छोड़ दिया गया जहा़ं १७ जून २००८ को इनकी मां को छोड़ा गया था।


एक अज़गर मां की कहानी: कैपिटीविटी में पाइथन के अण्डों से निकले नन्हे अज़गर--------

अपडेट ३०/६/२००८ को "डी एफ़ ओ के के सिंह को अजगर के 2५ अण्डों को कृत्रिम इन्कुबेसन द्वारा २३ नन्हे अजगरों के जन्म में सफ़लता मिली------------"

१७ जून २००८ जालिम नगर पुल धौरहरा तह्सील जिला लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश भारत, मै अपने एक पत्रकार साथी की सूचना पर इस स्थान पर पहुंचा कुछ अन्य साथियों के साथ जिसमे एक जन्तुविज्ञान प्रवक्ता भी थे जो मेरे शोध में मेरे सुपरवाज़र भी है खबर ये थी कि एक अजगर () यहां पर तकरीबन एक महीने से मौजूद है और यहां के कुछ साधू इस जीव को शेषाअवतार बताकर रकम पैदा कर रहे है भोली भाली और हालातों से परेशान जनता से। मै भी चल दिया उस सर्प को लोगो के चुंगल से छुड़ाने के लिये मेरे उस मित्र ने तब तक उस स्थान का पता ठीक से नही बताया जब तक हम उस स्थान बिल्कुल करीब नही पहुंच गये शायद उसे डर था की हम सब कही अन्य पत्रकारों को सूचित न कर दे और उसकी एक्सक्लूजिव खबर सामान्य न हो जाये खैर हम सब जब उस पुल पर पहुन्चे जो बहराइच रोड पर विशाल घाघ्ररा नदी पर बनाया गया था उसके नीचे नदी के किनारे बा़ग लगी हुई थी और एक अर्धनिर्मित मन्दिर कुछ झोपडियां और एक हवन कुन्ड इन सब के अलावा कुछ महिलायें, पुरुष व बच्चे इधर उधर चहलकदमी कर रहे थे पुल काफी उंचाई पर था सो हम लोग एक उंची ढलान से धीरे धीरे नीचे की तरफ़ बडे फिर नहर विभाग द्वारा बनाई गयी सीढियों से हम घाघरा नदी के तट पर पहुंचे जहां यह भयंकर नदी उफ़नाती हुई अपने जल को एक पूरब दिशा में बहाये लिये जा रही थी हम लोगों की निगांहे उस अजगर को तलाश रही थी जिस लिये हम यहां आये थे, मैने देखा कि पुल के नीचे के भाग के एक किनारे पर एक कोठरी नुमा स्थान पर एक राम नामी लाल झंडा गड़ा हुआ है और एक युवक तिलक लगाये बैठा है जो आने जाने वालो से मुखातिब हो रहा है उस स्थान तक पक्की सीड़ियां थी मै उस ओर बड़ा और वहां पहुंच कर भौचक्का रह गया ये क्या एक अज़गर कुंडली मारे चुपचाप बैठा हुआ था और लोग उसके करीब आ जा रहे थे प्रसाद बांटा जा रहा था और दान दक्षिणा का दौर जारी था।
अज़गर को मनुष्य की मौजूदगी में इतना शान्त देखकर मै हतप्रभ हो गया किन्तु उस पर और अधिक गौर करने पर मै भाउक हो उठा क्यों कि उसकी सांसे उखड़ती हुई मालूम दे रही थी और उसके शरीर की खाल सिकुड़ सी गयी थी ऐसा लग रहा था जैसे यह अपने प्राण अभी त्यागने वाला है, मैने उस युवा पुजारी से पूछा की भाई यह सांप कितने दिनों से यहां पर है उसका जवाब था की तकरीबन डेढ़ महीने से यानी ४५ दिन और वह बोला की ये बाबा का अवतार है कुछ खाते पीते नही है कई बार दूध आदि दिया पर नही खाया ( उसे क्या मालूम कि सापं दूध नही पीते) लेकिन यहां पर एक बात बड़ी मजेदार है मेरे मित्र को जिन क्षेत्र वासियों ने यह बात बताई थी उन्होने कुछ दिन पहले एक राय व्यक्ति की थी कि इस सांप को चूहा या मुर्गा खिलाओ, यहां पर किन्तु उन्हें बड़ा अजीब जवाब भी मिला था जिसकी कोई काट मेरे पास भी नही है अबतक, साधू और अन्य व्यक्तीं बोले अरे बेवकूफ़ हो क्या बाबा कही मुर्गा-चूहा खायेगे !! तुम अवतार धारी बाबा का अपमान कर रहे हो।
अब मै उस सांप की दशा देख देख कर विचलित सा हो रहा था क्यो कि वह धीमी व झटके मे सांसें ले रहा था और उसका उदर पिचका हुआ था मुझे क्रोध भी आ रहा था कि ४५-५० दिनों का भूखा यह जीव इन अंधविश्वासियों के चक्कर में फ़सा है ! हां उस पुजारी ने एक बाबा का फोटो भी वही पर रख रक्खा था जो इस स्थान पर रहे थे और अपने चेलों को दीक्षित किया था अब उनकी समाधि यहां पर बनाई गयी है बाबा तस्वीर में हाथ उठाये हुए थे और उन्के पीछे क द्र्श्य किसी पहाड़ी इलाके का था जिसे कम्प्युटर से बनाय गया था किन्तु वह पुजारी बोला की बाबा शिमला में थे तब की यह तस्वीर है और वही इस सर्प के रूप मे अवतरित हुये है।
उस स्थान से मै नीचे आ गया हम सब को फ़ारेस्ट अफ़सर का इंतजार था उन्हे हम सब ने पहले ही सूचित कर दिया था सो अब हमें यहां समय गुजारना था तो यहां मौजूद एक भड़कीले अवघड़ टाइप के बाबा से भेट हुई जो अपने सर्प के रूप में अवतार ले चुके बाबा का असली शिष्य बता रहा था, वह कुछ सशंकित भी था हम सब को और हमारे बड़े बड़े कैमरों को देखकर किन्तु वह साथ में डींगें भी हांके जा रहा था जैसे की अब यह अज़गर यानी बाबा आकार मे बढ़ रहे है जब आये थे तो बहुत पतले थी और अगर यही रहा तो बाबा १०० फ़ुट ऊंचा पुल तोड़ कर ऊपर निकल जायेगे, फिर कुछ डर कर बोला मै किसी को नही डरता यह सांप पास के इलाके से आया है जो किसी दूसरे बाबा का इलाका है लोग कहते है कि उसने इस सांप पर मंत्र मार दिया है इस लिये ये चल फिर नही पा रहे है लेकिन हो सकता है किसी ने इनकी रीढ़ तोड़ दी हो आदि आदि मै उसके भय मिश्रित बयानों को महसूस कर रहा था।
तभी मैने देखा कि मेरा पत्रकार मित्र एक दूसरे बाबा से बातचीत कर रहा है उस अज़गर के निकट वह बाबा पूरे जोश में तड़क तड़क कर अजीब नाट्कीय मुद्राये करता कही जमीन पर लेट जाता तो कही अचानक उठ खड़ा होता हो भी क्यो ना क्योकि उसके सामने कैमरा लगा हुआ था उसे टेलीविज़न पर दिखाया जाना है।
अब डी एफ़ ओ नार्थ खीरी आ चुके थे इस डिवीजन के सबसे आला अफ़सर किन्तु उनके साथ कोइ स्टाफ नही था सिवाय उनके दो छोटे बच्चो के एक बेटी व एक बेटा जो निडर थे "शायद एक फ़ारेस्ट अफ़सर के घर जन्म लेने कि वजह से वह वन्य जीवों के प्रति जागरूक थे", वह स्टाफ को फोनकर चुके थे पर काफी देर बाद वनकर्मी वहा पहुंचे अब शुरू होता है ओपरेशन रेस्क्यू पाईथन यानी अज़गर की तस्वीरे ली गयी और इसे यहां से उठाने के लिये कहां गया बाबाओ को अबतक पता चल चुका था और ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया था बाबाओ ने अपनी पूजा की थाली और अन्य सामग्री उठा ली थी किन्तु वहा से जाने से पहले उस तड़क तड़क कर इंटरव्यु दे रहे बाबा ने अज़गर से ऐसे बात की जैसे वह इसकी बातें सुन सकता हो शायद बाबा का यह आखिरी नाटक हो या फिर आमदनी का जरिया चले जाने का लोभ, या फिर ५० दिन साथ बिताने का प्रेम !! जो बिछड़ने के भय से उत्पन्न दुख का कारण बन रहा हो मै उपरोक्त बातों मे क्य सच है यह ठीक ठीक नही कह सकता क्यो कि यह द्र्श्य बड़ा ही ह्र्दय स्पर्शी था !
अब माजरा बिल्कुल अलग था स्टाफ तो था किन्तु निहत्था यानी रस्सी, बोरियां, आदि आदि जो भी इस अज़गर को पकड़ने में काम आता वह कुछ भी नही अखिरकार डिप्टी रेन्जर ने साहब का गुस्सा भांप कर अपने गले में पड़ी तौलिया ही फाड़ डाली ताकि इससे रस्सी का बिकल्प हो सके फिर एक बोरी कही से आयी और अज़गर को पकड़ने का अभियान शुरू किन्तु इस अज़गर के नज़दीक जाने को कोइ तैयार नही हो रहा था वन कर्मी तो साहब के बुलाने पर भी नज़दीक आने से डर रहे थे अब तक सांप को भी यह महसूस हो चुका था कि मसला गम्भीर है सो वह भी अपना उठा कर इधर उधर जहं भी चहल कदमी हो रही थी अपना फ़न उठा कर देखने लगा था यह देखकर बड़ा अजीब लग रहा था कि वनकर्मी साहब के डर से आ तो रहे थे पर सांप दूर दूर से और कांपते हुए मै वही सांप के पास खड़ा ये सब देखे जा रहा था तब मैने मसविरा दिया कि पब्लिक के लोगो को बुला लिया जाय वो ज्यादा बेहतर मदद कर सकते है क्यो कि अभी तक वह बाबा के साथ इस सर्प के नजदीक से दर्शन करते आये है और अशिर्वाद भी लिया है इस लिये उन में मैने भय नही देखा है साहब ने पुब्लिक को आवाज़ लगायी कुछ लोग बिना किसी संकोच व भय के मदद के लिये आ खड़े हुये, अब बात आयी की इस सांप पर बोरा कौन डालेगा प्लान ये था कि बोरे को पलट कर उस अज़गर को ढक लिया जाये और यह सांप अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप बोरी में अपने आप घुसता चला जायेगा फिर बोरे के मुंह को रस्सी से बाम्ध दिया जायेगा ऐसा ही हुआ किंतु बड़ी मशक्कतों के बाद डी एफ़ ओ सहब तस्वीरें लेने में व्यस्त थे और कर्मचारी डर के मारे कांप रहे थे यहां मैने नाटकीय ढग से उन सब का हौसला बढ़ाते हुए आगे बढा और बोरी को पकड़ कर उन के काम में मदद करने की कोशिस करने लगा ताकि उनका डर समाप्त हो जाये पुब्लिक के लोग अपना काम बिना डरे हुए डी एफ़ ओ के निर्देर्शो का अनुपालन कर रहे थे जैसे ही बोरे में अज़गर ने अपन फ़न उठाया तो उसका धड़ उपर की तरफ़ उठा तो वहां करीब २५-३० अण्डें दिखाई दिये (यहां पर एक बात महत्वपूर्ण है हमारे साथ आये जन्तुविज्ञानी व वन्य जीव विशेषज्ञ ने कहा था कि अज़गर में पैरेन्टल केयर नही होता यानी ये सांप बच्चो की देखभाल नही करते लेकिन ३०-३५ अण्डों को अपने शरीर से ढके यह अज़गर मां ने उनके ज्ञान पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया, आगे हम सब एक जंगल से बाहर निकल कर भटक आये चीतल जिस के खाल पर सफ़ेद चित्तिया होती है उसे देखने गये जो वन विभाग की रेन्ज पर था जिसके सीघ घायल थे और वन विभाग ने उसका इलाज़ कराया था को देककर इन्होने कहा कि यह हाग डीयर का क्रास ब्रीड है यह बात भी हम किसी के गले से नही उतरी ) अब सब अवाक रह गये क्यो कि इसकी किसी को कोई आशा नही थी, मैने भी अपने जीवन में पहली बार किसी अज़गर के य यूं कह ले कि सर्प के अण्डें देखे थे सफ़ेद मटमैले रंग के ये अण्डें आपस में चिपके हुए थे ये अण्डे चिड़ियों के अण्डों की तरह कठोर व गोलाकार नही थे बल्कि पिचके व रबड की तरह थे ये मेरे जीवन का एक और नवीन अनुभव था। अण्डों को देखकर मैने डी एफ़ ओ से कहां कि अब आप इस अज़गर को यही छोड़ दे और इसे गार्ड करने के लिये किसी को तैनात कर दे साथ ही यहां के लोगो के हिदायत भी दे कि कोई इसे नुकसान न पहुचाने पाये वैसे भी ये लोग पूजा पाठ के अलावा इस अज़गर को कोइ नुकसान नही पहुंचा रहे है किन्तु उन्होने हमारी बात नही मानी और अण्डों को भी एक डलिया में रखवा लिया साथ ही अपने मतहतों को आदेश दिया की इस अज़गर को रामनगर बीट के जंगलों में( निघासन तहसील) जो इस स्थान से लगभग १५० कि०मी० है में छुड़वा दिया जाय और अण्डों को अपनें आवास लखीमपुर ले चलने का हुक्म दिया जो इस स्थान से लगभग ७० कि०मी० है ये दोनो बाते मेरी कतई समझ में नही आयी क्यो कि अज़गर वन्य जीव अधिनियम के अन्तर्गत सेड्यूल वन का जीव है जिसके तहत इसके सरक्षण का प्राविधान है साथ ही यह एक एन्डैजर्ड (विलुप्त होती प्राजाति) स्पेसीज है यह उसी श्रेणी में रखा गया है जिसमे बाघ तेन्दुआ हाथी आदि है अब इस महत्वपूर्ण प्रजाति के ये ३०-३५ अण्डे जो कल को एक खूबसूरत अज़गर मे विकसित होने वाले थे का अस्तित्व खतरे मे था कारण ये कि लखीमपुर जनपद में न तो कोई रेस्क्यू सेंटर है और न ही रेप्टाइल्स का प्रजनन केंद्र यहां तक कि कोइ वेट्नरी डाक्टर भी नही है जिसे वन्य जीवो के बारे में कोइ ज्ञान हो ऐसे में डी एफ़ ओ साहब कैसे इन अपरिपक्व अण्डों से अज़गर के बच्चों को विकसित कर लेगे यह एक सवाल है? साहब का प्लान ये है कि अब एक लकड़ी के बक्से में इन अण्डों को रखा जायेगा और गर्मी के लिये जो इन अण्डों को अपनी मां के शरीर से प्रप्त हो रही थी उसके विकल्प में दो बिजली के बल्ब उसी बक्से में लगाये जायेगे, मैने इस पर भी अपत्ति दर्ज़ कराई बिना किसी खास अनुभव के कि श्रीमन क्या बल्ब की रोशनी इन अण्डों को नुकशान नही पहुंचायेगी क्योकि जहांतक तापमान का सवाल है ठीक है शायद बल्ब को आप विकल्प बना सके पर अण्डों को जो अंधेरे मे इन्कुवेट (सेये जा रहे थे) हो रहे थे अज़गर द्वारा तो क्या बल्ब की रोशनी उन्हे नुकसान नही पहुंचा सकती उन्होने हमारी बात को समान्य तरीके से टाल दिया और मुझे भी बहुत अनुभव न होने के कारण मैने कोइ बहस करना उचित नही समझा।लेकिन मै कुछ नही कर सकता था।
अब यहां यहां पर मै एक अलग मुद्दे पर कुछ कहना चांहूगा वह मुद्दा है मातृत्व का, इसे ईश्वर का वरदान कहे या प्रकृति द्वारा हमारे जीवनद्रव (जीन) मे फ़ीड किया हुआ पूर्वनिश्चित सूचनाओं का डाटा इसे जीवनविज्ञान में हम इंस्टिक्ट भी कह सकते है प्रकृति हमे सब कुछ सिखा कर भेजती है और हम उसी केर अनुरूप कार्य करते है किन्तु मानव ने अपने आप को प्रकृति द्वारा बताई गयी बातों से अलग हट कर कार्य करने की क्षमता विकसित कर ली जिसका नतीजा बहुत बेहतर नही है…………………………………..
जब मै किसी भैस को अपने बच्चे के पीछ पीछे दौड़ते देखता हूं तो मेरे मन में अजीब सी अनुभूति होती है चूंकि मै गांव का रहने वाला हूं तो यह द्र्श्य मेरे सामने अक्सर आता है गांवों में गाय या भैस जब दुधारू होती है तब उसकी खरीद फ़रोख्त ज्यादा होती है जाहिर है दूध देने वाली गाय या भैस का नवजात शिशु होगा और खरीदने वाला जब भैस खरीद कर अपने घर ले जाता है तो उसका सामान्य तरीका होता है जानवर के बच्चे को टोकरी मे बिठा कर साइकिल या बैलगाड़ी में रखकर ले जाता है और भैस अपने बच्चे के मोह में अपने पूर्व मालिक जहां उसने न जाने कितने वर्ष बिताये हो को छोड़ कर अपने बच्चे के पीछे पीछे चल देती है जब साइकिल या अन्य वाहन जिसमे उसकी संतान होती है तेज गति से चलती है तो वह भैस भी उसी रफ़्तार से दौड़ने लगती दौड़ते उसके मुंह से झाग तक आने लगता और वह बेहाल होने लगती पर फ़िर भी वह थक कर भी वह नही थकती क्यो कि वह मां है और मां का अपने पुत्र के प्रति स्नेह संसार में सर्वश्रेस्ठ और अर्वणनीय है जिसे शब्दों से बखान करना मुश्किल है ऐसे तमाम उदाहरण है जिन्हे आप सब ने कभी न कभी महसूस किया होगा। अब आप कल्पना करिये कि जिस सर्प मां यानी उस मादा अज़गर को उसके अपरिपक्व बच्चों से अलग कर दिया गया हो जिन्हों ने अभी इस दुनिया में अपनी आखें भी ना खोली हो जिनके पैदा होने के इंतजार में वह मां ५० दिनों से बिना कुछ खाये पिये हिले डुले एक ही स्थान पर बैठी हो भूख से बेहाल जिसकी सांसें मानो थमने को हो पर वह अपने अण्डों से निकलने वाली संतानों के इंतजार में चुपचाप सबकुछ झेल रही हो यहां तक कि तमाम ढोंगी बाबाओं के नाटकीय क्रियाकलाप और वहां आती भीड़ को पर वह अण्डों के ऊपर से कभी नही उठती, कही कोई इन्हें देख न ले या कोई इन अण्डों को हानि न पहुचा दे शायद इन्ही सब वजहो से ये जंगली जीव सब कुछ सहता रहा जबकि यह ताकतवर सांप जो हिरन जैसे जीव को जिंदा निगलजाये जिसे आदम की आहट से ही सतर्क हो जाने और हमलाकर देने की तैयारी कर लेने की आदत हो वह मां थी इस लिये सब कुछ सहती रही उसने अपनी समझ में तो पुल के नीचे एक सुरक्षित स्थान चुना था अपनी सतंति के लिये जहां न तो धूप आ सकती थी और न ही बरसात पर मनुष्य ने उसे वहां भी डूढ लिया और वह ५० दिनों तक सहती रही यह अप्रत्यासित कृत्य!
किन्तु अन्त तो बहुत ही बुरा हुआ कम से कम ढोगी बाबाओ ने उसे उसके अण्डों से तो अलग नही किया शायद कुछ दिनों बाद अण्डों से बच्चे निकल आते और वह वहां से चली जाती ५० -६० दिनों के कष्ट के पश्चात उसे सुख की अनुभूति होती किन्तु ऐसा नही हुआ उसे उसके पैदा होने वाले बच्चों से अलग कर दिया गया या दूसरे चिरपरिचित वाक्यों में कहें तो उसकी संतान को गर्भ में ही मार दिया गया उस जानवर की मनोदशा क्या होगी? जिसे उसके बच्चो से १५० कि०मी० दूर अनजानें जंगल मे छोड़दिया गया………………………………….
क्या ऐसा नही हो सकता था कि उसे उसी स्थान पर उसके अण्डों के साथ छोड़ दिया जाता और समय पर निगरानी रखी जाती जब तक उसके अण्डों से बच्चे न निकल आते?
क्या उसे यदि उस स्थान से हटा देना जरूरी हो गया था तो किसी दूसरे स्थान पर उसे अण्डों के साथ नही छोड़ा जा सकता था ताकि वह अपने बच्चो को से सके?
क्या यह वन्य जीव अधिनियम के कानून का उलघ्घंन नही है कि किसी जन्तु को जब वह ब्रीडिगं कर रहा हो तो उसके घोसलें को उजाड़ दिया गया हो उसके अण्डे उठा ले जाये गये हो क्या इसे ही वन्य जीव सरंक्षण कहते है?
यदि वह मादा अज़गर मर चुकी होती तो मै मान सकता हूं कि अण्डों को वैकल्पिक तरीके से सेया (इन्कुबेट) जा सकता था।
मुझे इस बात का अफ़सोस सदैव रहेगा कि मै भी उन सरकारी लोगो के इस कृत्य में शामिल था, मुझे अपने इन हालातो पर एक बात याद आती है
आये तो हरि भजन को ओटन लगे कपास……………………!!!

नोट: यदि इन अण्डों से सफलता पूर्वक बच्चे निकल सके तो उनके आगे जीवित रहने की संभावनायें न के बराबर होगी पर फिर यदि यह ब्रीडिंग सफ़ल रही तो मेरे लिये बड़ी खुसी की बात होगी। और मै आप सब को सूचित भी करूगां



कृष्ण कुमार मिश्र
७७ शिव कालोनी लखीमपुर खेरी-२६२७०१
उत्तर प्रदेश भारत
सेलुलर : ९४५१९२५९९७

क्या धरती पर एलिअन्स मौजूद है

कृष्ण कुमार मिश्र

क्या सच में अन्तरिक्ष प्राणी हमारी धरती पर आते है ? कोई है जो इनका सच जान सकता है क्या आप उससे जुडना चाहेगे?

क्या आप एलिअन्स से बात करना चाह्ते है उन्हे सुनना चाहते तो आओ चले अनंत अंतरिक्ष मे गूंजती इन आवाजों के पास क्या पता कभी आप को कुछ सुनाई पड जाये! सदियो से मनुष्य आसमान की तरफ़ निहारता रहा है और अपने जैसे प्राणियों की व धरती जैसे लोकों की परिकल्पना कभी तो इन्द्र व इन्द्रलोक के रूप में तो कभी स्वर्ग व नर्क के रूप में यहां तक कि मानव ने ग्रहो में भी अपने जैसे स्वरूप की परिकल्पना कर डाली तभी तो हमारे यहां बच्चों को चंदा मामा के गीत सुनाये गये हम ने सुर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति आदि ग्रहों को देवता मानकर मानव आकृति में ढालने की सदैव कोशिस की पर हमारी इन परिकल्पनाओं में क्या सच्चाई है इस बात का पुख्ता सबूत कोइ भी अन्तरिक्ष प्रयोगशाला नही दे पायी सिवाय कुछ संदेहात्मक संकेतो के, लेकिन योरोप में जमीन पर बनने वाले विशाल चिन्ह, उडन तस्तरिओं का देखा जाना और अब तो दूसरे ग्रह के प्रानी यानी अलिअन्स की तस्वीर खीचे जाने का भी दाव किया जा रहा है एक्स फ़ाइल जैसे धारावाहिकों ने भी जनमानस में एलिअन्स की परिकल्पना को और मजबूत किया बताते है की एक्स फ़ाइल वास्तव में अमेरिकी खुपिया एजेन्सी सी आई ए की गुप्त रपट है जो लीक हो गयी जिसमे अलिअन्स और उडन तस्तरीयों के बारे में जानकारी थी जिसे आम जनता से छुपाया जा रहा था। ऐसा नही की एलिअन्स और उनकी उडन तस्तरी योरोप य अमेरिका में ही आती है अवश्य ये भारत में भी आते होगे आप भी फ़ुरसत के छडों मे आसमान मे नज़र दौडाये जाने कब आप को कुछ दिखाई दे जाये !!!!

क्या आप इस ब्रह्मांड में अकेले है? यह एक अहम सवाल है जो मानव सभ्यताओं में सदियों से चर्चित रहा है और शायद इसी सवाल ने हमें आसमान की तरफ़ देखने व वहाँ कुछ खोजने के लिये प्रेरित किया और यही पर प्रदुर्भाव हुआ खगोल विज्ञान का फिर क्या था वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ साथ सौर्य मडंल, तारा मडंलों आकाश गगांओं और असंख्य तारों की खोज होती चली गयी किन्तु वह सवाल अभी भी हमारे सामने सिर उथाये खडा है कि क्या हम ब्रह्मांड में अकेले है? शायद नही और इस बात को और मजबूती दी एक युवा वैज्ञानिक फ़्रैन्क ड्रेक ने एक समीकरण देकर जिनका मानना है इस ब्रह्मांड में तमाम सभ्यतायें मौजूद है और इसी विचारधारा को आधार मानकर उन्होने एक प्रोजेक्ट की शुरुआत सन 1960 में की किसका नाम ओज़मा रखा जो फ़्रैन्क एल बाम की पुस्तक ओज़ पर आधारित था उन्होने दुनिया के विशालतम रेडिओ टेलेसिकोप स्थापित किये जिनकी चौडाई 85 फ़ुट है और इन्हे अन्तरिक्ष से अजीब अजीब आवाजे सुनाई देने लगी फ़िर इनका यह मिशन आगे बढ़ता गया इनकी रिसर्च की मुख्य परिकल्पनायें थी कि क्या इन खरबों ग्रहों में किसी पर जीवन नही होगा, क्या ब्रह्मांड में सिर्फ़ हमारी मानव सभ्यता के अलावा कोइ सभ्यातायें नही है, क्या इस विशाल ब्रह्मांड में कोइ ऐसा ग्रह नही जो जीवन को स्थापित करने की क्षमता नही रखता? इन्ही सब सवालों की खोज में बर्कले कैलिफ़ोर्निया में “सेटी” इन्स्टीट्युट की शुरुवात हुई सेटी यानि ’सर्च फ़ार एक्स्ट्रटेरीस्ट्रिअल इन्टेलीजेन्स’ और ४५ वर्षो में ब्रह्मांड की तमाम आकाश गंगाओ से आती हुई आवाजों को रिकार्ड किया कभी कभी सेना के लडाकू जहाजों से आने वाली आवाजे भी रिकार्ड होती थी आकाश गंगाओं में संभावित सभ्यताओं की खोज के लिये माइक्रोसाफ़्ट ने भी करोडों रुपये अनुदान के तौर पर दिये जिससे सेटी ने छोटा व दस गुना अधिक ताकतवर रेडिओ टेलिस्कोप “अलेन टेलिस्कोप एरे (ए०टी०ए०) लगाया जिसमे दर्जनों सौर्य मडंलों का एक साथ अध्ययन करने की क्षमता है।

बाद में सेटी की सबसे बडी सफ़लता बनी पीयर टू पीयर तकनीक जिसमे तमाम कम्प्युटर एक साथ जोडे जा सकते है सेटी ने तकरीबन 2.5 मिलिअन कम्प्युटरों को एक साथ अपने प्रोजेक्ट से जोड दिया अब क्या था लाखों लोग एक साथ अन्तरिक्ष से आती आवाजो को सुन सकते थे इस कार्य के लिये उन्हे बस सेटी की वेबसाइट से एक छोटा सा स्क्रीन सेवर अपने कम्प्युटर में इन्स्टाल करना होता है और आप जुड जाते है इस महान खोज में सेटी के साथ। हाँ एक और बात जब ये कम्प्युटर एक साथ चल रहे होते हो तो लाखो निगाहे उन सुदूर ब्रह्मांड से आती आवाजों का अध्ययन कर रही होती है साथ ही उन सभी क्म्प्युटरों की प्रोसेसिग छमता का आकंलन करने पर यह छमता दुनिया के सुपर कम्प्युटर के बराबर हो सकती है यदि आप एलिअन्स की खोज का हिस्सा बनना चाहते है तो आप इस प्रोजेक्ट से जुडने के लिये सेटी की वेबसाइट पर लाग इन कर सकते है पता है http://setiathome.ssl.berkeley.edu/ इस साइट पर जाकर आप स्क्रीन सेवर डाउनलोड कर कम्प्युटर में इन्स्टाल कर दूसरे ग्रहों से आती आवाजों को सुन सकते है आप के कम्प्युटर स्क्रीन पर रंग बिरंगी ध्वनि तरंगों की ग्रफिकल तस्वीरें आती रहेगी पता नही कब आप को किसी सुदूर ग्रह के प्राणी की आवाज सुनाई दे जाय! कुछ वर्ष पहले सेटी संस्थान का यह प्रोजेक्ट धन के अभाव में औपचारिक तौर पर तो बंद कर दिया गया पर अनौपचारिक तौर पर उनकी खोज जारी है जिसमे शामिल होकर आप उनका हौसला बढा सकते है साथ ही सेटी में आप अन्य वैज्ञानिक शोधों में भी हिस्सा ले सकते है सेटी को अपने ५० वर्षों के अधययन में हमेशा चुनौतियां मिलती रही की आखिर अब तक उन्हे दुसरे ग्रह के प्राणी का स्पष्ट सन्देश क्यो नही प्राप्त हुआ किन्तु सेटी प्रमुख फ़्रैन्क ड्रेक ने आशा नही छोडी, आप को उडन तस्तरी व एलिअन्स के बारे में इंटरनेट पर तमाम वेबसाइटें मिल जायेगी जो एलिअन्स की कहानिया कहती है पर सेटी ने वैज्ञानिक तौर पर यह प्रयोग शुरू किया

कई वैज्ञानिकों ने यह भी सवाल खडे किये कि अगर हमारी धरती पर करोडों प्रजातियां है जो करोडों वर्षों में विकशित हुई क्या किसी में दूसरे ग्रह के प्राणी को शरण देने की क्षमता है और यदि होती तो अभी तक करोडो वर्षों में और करोडों प्रजातियो के जीवों मे कोई एलिअन्स दूसरे ग्रह का जीव क्यो नही पनपा, पर क्या मालूम एलिअन्स हमारे बीच मौजूद हो किसी जीव के रूप में और वह हमारा अध्ययन कर रहे हो और हम उन्हे न जान प रहे हो…….!!!!!!!

The Drake Equation

N = R (sub *) x f (sub p) x n (sub e) x f (sub l) x f (sub i) x f (sub c) x L

N= observable civilization in the Milky Way

R(sub *)= the number of stars like earth’s sun born in the milky way each year.

f(sub p)= the fraction of those stars with planets.

n(sub e)= the number of planets in each planetary system that are earthlike.

f(sub l)= the fraction of earthlike planets that actually develop life.

f(sub i)= the fraction of planets with life that develops intelligence.

f(sub c)= the fraction of planets with intelligent life develop technology.

L= the life time, or number of years, an observable civilization exists.

कृष्ण कुमार मिश्र

७७ शिव कालोनी कैनाल रोड लखीमपुर खेरी-२६२७०१

सेलुलर : ९४५१९२५९९७

दिनांक: १७ जून २००८