मै जब भी लखीमपुर से राजा लोने सिंह मार्ग से अपने गावं मैनहन के लिए चलता हूँ तो प्रकृति के वह सारे नज़ारे देखने कि कोशिस करता हूँ जो सड़क के दोनों तरफ़ दिखाई देते है सड़क दोनों तरफ़ झाडियों में खिले जंगली पुष्प बेले और विशाल वृक्ष जिनपर चहकती चिडियां और न जाने क्या क्या जो .......... पर मेरे इस मार्ग पर २० वर्ष के निरंतर प्रकृति अवलोकन में अब बाधा आने लगी इसका जिक्र कुछ यूँ है .....मुझे अक्सर एक बात से बड़ी उलझन होती है जिसे मैं आज यहां टीपे दे रहा हूं जब मैं किसी सड़क से गुजरता हूँ जाहिर है सड़क से ही गुजरूगां, तो सड़कों पर बसते आ रहे लोगों को देखकर बड़ी खीझ होती है और लगाने लगता है कल हमारा सारा मुल्क क्या सडकों पर ही आजायेगा ये कैसा अनियोजित विकास होगा और कैसी बदनुमा शक्ल होगी इस विकास की ये तो भविष्य कि पीढियां देखेगी लेकिन आज जितना जो हो रहा है उससे नही लगता कि हम उसी विशाल और गौरवशाली सभ्यता के वारिस है जिसे सिन्धु घाटी सभ्यता कहते उस सभ्यता कि नगरीय सरंचना सड़के जलनिकास का प्रबंधन आदि आदि ...........अब आज के नगरो को देखिये जहां देखो लोंग बसते जा रहे है और कैसे भी बिना किसी सुनियोजित सोंच और व्यवस्था के खैर नगरों कि बात यहाँ नही करते बात है भारतीय मुख्य मार्गों की जहाँ लोंग शहरों और गावों से निकल कर इन सड़कों पर बसते आ रहे है और जिस तरह से यह अतिक्रमण करते है उससे लोगों का इन सडकों पर निकलना दूभर है ही और लगता है भविष्य में ये लोंग इन सड़कों को बजबजाती नालियों में तब्दील कर देगे फिर कभी भी आप घर से निकल कर प्रकृति का नज़ारा नही ले पायेगे न तो तो आप को खेत-खलिहान दिखेगे और न ही वन विभाग द्वारा कराया गया पथ वृक्षारोपण क्यो कि सडकों के दोनों तरफ़ अट्टालिकाएं होगी और इन भवनों के आगे बने व्यावसायिक प्रतिष्ठान और इन प्रतिष्ठानों के सामने आने वाले वृक्ष तेजाब डालकर सुखादिये गए होगे जैसा कि अभी हो रहा है फिर क्या आप सैकडों मील का रास्ता एक नाली नुमा उपर से खुली कुछ कुछ पाइप जैसी सरंचना से होकर तय करेगे साथ ही इतने आबादी जो सड़क पर होगी के कारण आप के वहां कि गति निम्नतर होने पर भी लोंग आप से आ कर टकरायेंगे और भी न जाने कितने झंझट होगे जिन्हें आप ख़ुद सोचियेगा मै यहाँ योरोप के मुल्को की मिशाल नही दूँगा कि कितना सुनियोजित विकास है ..........इस लिए नगरो और गावों की सीमायें निर्धारित होनी चाहिए क्यो हमारे मुल्क कि धरती इतनी कम नही है की हम सडकों पर आकर बसे इस लिए सरकार को सुनियोजित विकास के लिए कोई न कोई पहल करनी होगी ताकि हिन्दोस्तान सडकों पर आने से बच सके और एक खूबसूरत मुल्क बन सके .......कहते है रोम एक दिन में रोम नही बना था ............
कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
Sunday, August 31, 2008
Wednesday, August 27, 2008
Rivers of kheri district on the road of extinction
जब पूरी दुनिया प्रदूषण नियंत्रण व पर्यावरण शुद्धीकरण के लिये तमाम उपाय कर
रहा है ऐसे मे हमारे देश के कुछ उद्दमी (बिजनेस मैन ) हमारे पर्यावरण को
प्रदूषित करने पर तुले हुए है, इस्क एक नही कई उदाहरण खीरी जनपद मे मौजूद है
यह जनपद छोटी बडी एक दरजन नदियो वाला सुन्दर भूभाग है जहा शाखू के विशाल वन
है किंतु यहा के चीनी मीलों ने इन नदियों मे अपना प्रदूषित जल छोड कर इन नदियो के
परिस्थितिक तंत्र को नष्ट कर इनमे रहने वाले जीवो को समूल समाप्त कर दिय है साथ
ही साथ आस पास कि कृषि भूमि पर भी जहरीला प्रभाव छोडा है इन सभी कारणो
के चलते जमीन मे अर्सैनिक जैसे घातक तत्व मिलने लगे है सरायन व कण्डवा नदी
सबसे अधिक प्रदूषित हो चुकी है
विशाल नदियो मे प्रदूषण फौरी तौर से नही जाना जा सकता किंतु छोती नदिया गन्दे
नालो मे तब्दील हो चुकी है और ऐसा नहि कि एह राज की बात है और शासन व प्रशासन
से छुपी है जब भी कोइ इन नदियो के निकट से गुजरता है तो इन नदियों का काला हो
चुका पानी बदबू से मन को विचलित कर देता है प्रदुषण नियंत्रण विभाग को धता
बताते हुए ये उद्योग हमरी धरती को बंजर और पर्यावरण को जहरीला बना रहे है यदि
जल्दी इस बाबत कोइ कदम नही उठाये गये तो इस जहर के दूरगामी परिणाम बहुत भयानक
होगे. इतना हीद नही बड़े बड़े अफसरान इन नदियों के पुलों से होकर गुजरते है और देखते भी है कि जल प्रदूषण के सभी नियमों और को टाक पर रख कर ये मिल मालिक बाकायदा सीमेंट कि पाइप लाइनों को इन नदियों तक लाये है जिसके द्बारा मीलों का जहरीला पानी नदियों तक आता है क़ानून को जब ये कुछ नही समझते तो जनमानस को इससे कितना नुकसान हो रहा है इसकी बात ही करना बेमानी होगा और इस जहरीले पानी से कितने लाख मछलियाँ सर्प कीड़े सियार लोमड़ी खरगोश जलीय वनस्पतियाँ और मवेशी मृत्य को प्राप्त हो चुके है ये कहना हास्यापद होगा |
और फिर भी हम अपने बुजर्गो और इतिहास का तथा खास्स्त्यौर इस नज़्म को लिखने वाले उस महँ फनकार का जिसे हम अल्लामा इकबाल कहते है का मजाक उडाते है ये गीत गाकर सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा ........
जरा सोचिये
कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
रहा है ऐसे मे हमारे देश के कुछ उद्दमी (बिजनेस मैन ) हमारे पर्यावरण को
प्रदूषित करने पर तुले हुए है, इस्क एक नही कई उदाहरण खीरी जनपद मे मौजूद है
यह जनपद छोटी बडी एक दरजन नदियो वाला सुन्दर भूभाग है जहा शाखू के विशाल वन
है किंतु यहा के चीनी मीलों ने इन नदियों मे अपना प्रदूषित जल छोड कर इन नदियो के
परिस्थितिक तंत्र को नष्ट कर इनमे रहने वाले जीवो को समूल समाप्त कर दिय है साथ
ही साथ आस पास कि कृषि भूमि पर भी जहरीला प्रभाव छोडा है इन सभी कारणो
के चलते जमीन मे अर्सैनिक जैसे घातक तत्व मिलने लगे है सरायन व कण्डवा नदी
सबसे अधिक प्रदूषित हो चुकी है
विशाल नदियो मे प्रदूषण फौरी तौर से नही जाना जा सकता किंतु छोती नदिया गन्दे
नालो मे तब्दील हो चुकी है और ऐसा नहि कि एह राज की बात है और शासन व प्रशासन
से छुपी है जब भी कोइ इन नदियो के निकट से गुजरता है तो इन नदियों का काला हो
चुका पानी बदबू से मन को विचलित कर देता है प्रदुषण नियंत्रण विभाग को धता
बताते हुए ये उद्योग हमरी धरती को बंजर और पर्यावरण को जहरीला बना रहे है यदि
जल्दी इस बाबत कोइ कदम नही उठाये गये तो इस जहर के दूरगामी परिणाम बहुत भयानक
होगे. इतना हीद नही बड़े बड़े अफसरान इन नदियों के पुलों से होकर गुजरते है और देखते भी है कि जल प्रदूषण के सभी नियमों और को टाक पर रख कर ये मिल मालिक बाकायदा सीमेंट कि पाइप लाइनों को इन नदियों तक लाये है जिसके द्बारा मीलों का जहरीला पानी नदियों तक आता है क़ानून को जब ये कुछ नही समझते तो जनमानस को इससे कितना नुकसान हो रहा है इसकी बात ही करना बेमानी होगा और इस जहरीले पानी से कितने लाख मछलियाँ सर्प कीड़े सियार लोमड़ी खरगोश जलीय वनस्पतियाँ और मवेशी मृत्य को प्राप्त हो चुके है ये कहना हास्यापद होगा |
और फिर भी हम अपने बुजर्गो और इतिहास का तथा खास्स्त्यौर इस नज़्म को लिखने वाले उस महँ फनकार का जिसे हम अल्लामा इकबाल कहते है का मजाक उडाते है ये गीत गाकर सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तान हमारा ........
जरा सोचिये
कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
Monday, August 25, 2008
An Ultimate Flower in Rural India

पदबिछुआ एक पुष्प जो किसी का भी मन मोह ले और इस पुष्प से मेरी मुलाक़ात १७ अगस्त २००८ को रक्षाबंधन के शुभ अवसर के एक दिन उपरांत हुई हुआ ये कि मैं और मेरी माता जी मेरे ननिहाल गए थे माँ को जो मामा के राखी बांधनी थी रात में मेरी जागने की आदत जिसमे ये इन्टरनेट की बड़ी कृपा है के कारण मैंने उस रात दो पुस्तके पढ़ डाली एक तो दयानंद सरस्वती की सत्यार्थ प्रकाश और दूसरी मेरे नाना पंडित राम लोटन शास्त्री की हस्तलिखित पुस्तक जो ब्राह्मण समाज पर आधारित है सुबह हुई नही कि मै गांव की सुबह का आनंद लेने उठ पड़ा और चल दिया गाँव की सड़क पर यहाँ चारो तरफ़ हरियाली ही हरियाली और सड़क के दोनों तरफ़ खेत जलमग्न, नज़ारा मन को भा रहा था लोग सड़को पर खड़े आपस में बातें कर रहे थे कुछ इधर उधर आ जा रहे थे क्यो की अब बरसात की अधिकता से सड़क ही बची थी जहाँ लोग बाग़ चहल कदमी कर सकते थे अपने घरों से निकालने के बाद ..............
कुछ दूर चलने पर इसी सड़क के किनारे एक बड़ी पत्ती वाला एक पौधा दिखा जिसमे बेहतेरीन गुलाबी रंग के पुष्प सुबह की मदमस्त हवा में हिचकोले खा रहे थे मैंने यह पुष्प अपने जीवन में पहली बार देखा लेकिन तभी मेरे एक मामा ने बताया की तुम बचपन में इन फूलों और इनके बीजों से खेला करते थे पर मेरी बालपन स्मृतियाँ विस्मृत हो चुकी थी और अब मेरा प्रकृतिवादी शोधार्थी मन इस पुष्प का विश्लेषण विज्ञानं की जबान में करना चाहता था मामा ने जब इसका देशी नाम बताया तो उसने मुझे और आकर्षित किया और इसके दो झुकाव दार दांत नुमा बीजों के बारे जिसे मैंने कभी खेल में प्रयोग किया होगा बताते है की बच्चे इन बीजों को एक दूसरे में फंसा कर जोर आजमायिस करते है क्यो की इन बीजों के दो घुमाव दार दांत बिल्कुल मानो किसी मांसभक्षी जानवर के कैनाइन दांत हो की तरह होते है और दो बीजों को आपस में फंसा देने पर कितनी भी ताकत लगाई जाए टूटते नही है और यही कारण है की ये बच्चों में प्रिय है खैर इस पुष्प वृक्ष का नाम है पदबिछुआ जिसके दो अर्थ है और बखूबी इसके नाम को परिभाषित करते है पद यानी पावं बिछुआ यानी श्रंगार का आभूषण जिसे महिलायें अपने पैर की अँगुलियों में धारण करती है और दूसरा अर्थ ये की पद यानी पावं में बिच्छू की तरह चुभने वाला बिछुआ क्योकि इसके दो मुडें दांत जो पैर में चुभ जाए तो निकालना मुस्किल हो जाए जैसे शेर के अगले दांत जो मांस में धसने के बाद उसे फाड़ देने पर ही बहार आ सकते है ........................................
पर न जाने क्यो मुझे लगता है की इस वनस्पति का विशेष औषधीय मह्त्व होगा वैसे तो प्रकृति में सभी वनस्पतीय विशेष और बिलक्षण गुणों से युक्त है पर इसमे मुझे कुछ खाश नज़र आता है हो सकता है इसके पुष्प और बीज की अद्भुत बनावट का आकर्षण हो ...........................
अंत में एक बात कहना चाहूँगा की वनास्पतिशाश्त्रीओ को नॅशनल पार्क और उद्यानों से हट कर गावों की वनस्पति पर भी ध्यान देना चाहिए क्योकि अभी भी गाँव की पुरानी बागों और झुरमुटों में झांकती अद्भुत
वनस्पतियाँ जिनमे जनकल्याण की तमाम खूबियाँ हो सकती है और ये विश्व के संज्ञान में नही है इस पुष्प से जुड़ी तमाम धार्मिक सामाजिक गतिविधियाँ और औषधीय महत्त्व के सन्दर्भ में --------------------
आप में से किसी को भी यदि इस पुष्प से सम्बंधित जानकारी हो तो मेरा ज्ञान वर्धन करने की कृपा करे |
कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
9451925997
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