Friday, September 11, 2009

मातृ नवमी और जीवों के प्रति दया- एक महान संस्कृति


अतुल्य भारत और इसके लोग जिनमे तमाम विविधिताओं के बावजूद इन्हे जोडती है हमारी संस्कृति जो हज़ारों वर्षों से लगातार पीढी दर पीढ़ी संचरित हो रही है और इसी का एक पारंपरिक उदाहरण बता रहा हूं आप सभी को जो आज़ मेरी मां ने मुझे बताया १३ सितम्बर २००९ को मातृ नवमी है उस दिन माताओं का श्राद्ध होता है मुझे आर्यों की यह पितृ प्रधान व्यवस्था कही कही बहुत अखरती है कि पितृ पक्ष के १५ दिनों में माताओं को श्रद्धांजली देने का एक दिन ही मुकर्रर किया गया और पूर्वजों को श्राद्ध देने का नामकरण पितृ पक्ष कह कर पिता प्रधान बनाया ना कि मातृ पक्ष इसका नामकरण ऐसा भी किया जा सकता था जिनमें मां और पिता दोनों को समानधिकार से सम्बोधित किया जा सके !! पर मुझे जो खास लगा वह ये कि उत्तर भारत के खेरी जनपद के मैनहन गांव जो मेरा पैतृक ग्राम है वहां उस रोज महिलायें तालाब में घाट पर स्नान करने के बाद माताओं के स्मरण में कथायें कहती है जिनमें एक कथा का जिक्र मैं यहां करना चाह्ता हूं महिलायें कहती है कि बहुत पुरानी बात है पितृ पक्ष का समय था सारे गृहस्थ अपने अपने पितरों के श्राद्ध अपनी अपनी क्षमता व श्रद्धानुसार कर रहे थे एक किसान जो अपने बैलों के साथ खेतों में हल चला रहा था और उसकी पत्नी घर पर श्राद्ध की तैयारी कर रही थी सो उसने भोजन दुग्ध आदि का बंदोंबस्त किया था तभी एक कुतिया घर में घुसी जो हमेशा इसी किसान के घर के आस पास रह्ती थी और उसने दुग्ध के बर्तन में जो आंगन मे रखा हुआ था अपना मुहं डाल दिया यह देख कर घर की मालकिन आग-बबुला होकर दौड़ी और कुतिया को मारने लगी कुतिया वहां से बदहवास होकर भागी और अपने निवास यानी एक कच्ची घारी (मिट्ती और फ़ूस से बनी बंद झोपड़ी)में जाकर छुप गयी वास्तव में किसान के बैलों के बांधने की यह अधिकारिक जगह थी जहां एक कोने में यह कुतिया ने भी अपना बसेरा बना लिया था!
उस रोज किसान कुछ देर में घर वापस लौटा खेतों में अधिक काम होने की वज़ह से उसे देर हो गयी पर घर आते ही पत्नी को आक्रोशित देख कारण पूछा पत्नी बोली आज़ कुत्ते ने दूध झूठा कर दिया और अब कैसे श्राद्ध आदि का प्रबंध हो और तुम भी इतनी देर में आये हो पत्नी के गुस्से को देखकर पति ने कहां कोइ बात नही अब शाम को भोजन बनाना
दोपहर की इस कहासुनी और अव्यव्स्था के चलते किसान ने बैल को भी न तो कुछ खिलाया और न ही पानी पिलाया शाम हो गयी पति पत्नी ने भोजन किय और विश्राम करने लगे रात्रि में किसान लघु शंका के लिये जब बाहर आया तो उसने घारी से आती हुयी आवाज़े सुनी जहां वह कुतिया और बैल रह्ते थे कुतिया बैल से कह रही थी कि आज़ बडा़ गलत हुआ आज़ बहू ने मुझे बहुत मारा जबकि मेरी कोइ गलती नही थी हुआ ये कि मै घर मे घुसी तो एक चील सांप को मुहं मे दबाये आसमान मे उड़ रही थी अचानक सांप उसकी पकड़ से छूट कर आंगन में रखे दूध में गिर गया मैने सोचा यदि भैया और बहू ने इसे खा लिया तो क्या होगा अब मै इस दूध को जूठा कर दू यही एक विकल्प था किन्तु मेरी वजह से भैया और बहू ने आज भोजन नही किया अब बैल कह रहा था कि आज़ भैया ने मुझसे बहुत काम लिया और कुछ खाने पीने को भी नही दिया कोई बात नही तुम्हे दुखी नही होना चाहिये तुमने उनकी जान बचाने के लिये ऐसा किया! हमारी भाग्य में ही दुख है ईस्वर ने हमें इस योनि में धरती पर भेजा है पर मेरा परिवार सुखी रहे यही कामना है उस किसान ने जैसे उनकी बात सुनी वह भागा घर की तरफ़ और पत्नी को जगा कर बोला उठॊ और जितना बेह्तेर से बेह्तर भोजन बना सको बनाओ पत्नी बोली आखिर बात क्या है उसने कहा बड़ा अनर्थ हो गया हमसे आज श्राद्ध का दिन था और वह कुतिया जिसको तुमने मारा वह मेरी मां है और बैल मेरे पिता जी है और उन दोनों को हमने दुख दिये इसके बावजूद वो हमारी भलाई की हि बात कर रहे है और उन्होने आज हम सब की जान बचाई उस दूध में सांप था इसी लिये उन्होने उसे जूठा कर दिया.हे भगवान ...........

रात्रि में किसान के घर भोजन बना कुतिया और बैल को प्रेम से भोजन व जल दिया और क्षमा मांगी जीवन पर्यन्त इस किसान ने उन जीवों की सेवा की और साथ ही साथ उसने किसी भी जीव को कष्ट न देने की शपथ ली कि पता नही किन में मेरे पितरों कि आत्मा का वास हो!

मै यहां ये कहना चाहूंगा की हमारी बेह्तरीन परंपराओं की यह एक झलक है हमारी परंपराओं में ८४ लाख प्रजातियों का जिक्र है और यह माना जाता है कि हम सभी कभी न कभी इन प्रजातियों के रूप में धरती पर आते है और यही धारणा बल देती है जीव संरक्षण को और यही कारण है की बच्चों को बचपन मेम सिखाया जाता था की बेटा चींटी मत मारना इसमें हमारे पूर्वजों का अंश हो सकता है बिल्ली को मौसी कौआ को मामा कटनास को भगवान शिव और न जाने कितने उदाहरण है जो पृकति से जोड्ते है हमें वैदिक परंपरा में तो जिससे हम कुच लेते है उसके प्रति कृतग्यता प्रगट करने के लिये रिचायें, सूक्तियां व मंत्र लिखे गये चाहे फिर वह वृक्ष हो या नदी या फिर गऊ माता...........मां गंगा, यमुना, ............


कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन- खीरी-२६२७२७
०९४५१९२५९९७

3 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

लेखनी प्रभावित करती है.

Arvind Mishra said...

पावरफुल मेसेज देती लोककथा ! चौरासी करोड़ नहीं , लाख !

Krishna Kumar Mishra said...

अरविन्द जी मैने अपनी गलती दुरुस्त कर ली