Friday, April 25, 2008

एक और तेन्दुये की मौत का इन्तज़ाम कर रहा है वन विभाग




आज यानि २९ अप्रिल २००८ की सुबह से ही वन विभाग धौरहरा तह्सील के चौरा गांव में एक पुरानी बा़ग में तेन्दुये को घेर रखा है और उसे मारने की सभी कवायदें जा्री है सूत्र बताते है कि इनके पास बेहोसी की बन्दूक है पर दवा नही है तेन्दुये का क्या होना है यह भी स्पष्ट नही है पर आखिर में उसे मार देने का इरादा बना चुका वन विभाग अपनी संगीनें उस जन्वर पर ताने हुए है जो इस इलाके में तकरीबन ५ महीनें से है और अभी तक इसने ऐसी कोइ हरकत नही की जिससे यह वैग्यानिक आधार पर पुष्टि होती हो कि यह नरभक्षी है क्यो की ५ महीनों में यहां ग्रामीणों द्वारा दो तेन्दुयें और उनके बच्चे भी देखे गये साथ ही में एक बाघ की मौजूदगी की भी पुष्टि हुई है ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि दोषी कौन है? फिर अगर सभी घटी हुई चार घटनाओं पर नज़र दौड़ाये तो यह भी स्पष्ट होता है की इन ५ महीनों में जो चार मनव मौते हुई वह मात्र एक्सीडेंट थे क्यो की ये चारों मानव या तो बैठे हुए थे फिर जानवर की सी मुद्रा में थे फिर अगर ये जीव नर-भक्षी होते तो अभी तक ना जाने कितने लोगो का शिकार कर चुके होते और बाकायदा मनुष्य के मांस का भक्षण भी करते पर ऐसा नही हुआ बल्कि ये भूखे जीवों ने सियारों और कुत्तों को खाकर इन ५ महीनों तक अपनी भूख मिटाई क्यो कि यहां के जंगलों में इन मांसाहारी जानवरों का शिकार मनुष्य चट कर चुका है !! पूरे भारत में अगर बाघ व तेन्दुये द्वारा हुई मानव भक्षण की घटनाओं पर दृष्टि डालें तो नतीज़ सामने यह आता है की सभी मौते गरीब तबके के लोगों की होती है क्यो कि उनके घरों में दरवाज़े नही होते है और न ही चारदिवारी और न ही वह मोटर कारों से सफ़र करते है .......साथ ही उन्हे रात मे भी अमीरों के खेतों में काम करना पड़ता है बिना किसी सुरक्षा इन्तज़ामों के नतीजतन जानें उनकी ही जाती है और एक पुरानी कहावत भी हमारे भारत में कि " गरीब की जान सस्ती होती है" और यही वज़ह है कि इनकी मौतों पर सरकारी अमला भी जल्द ध्यान नही देता जब मीडिया शोर मचाता है और लोगों का दबाव बढता है तब तक देर हो चुकी होती है और ये सरकारी लोग बिना कुछ और प्रयास किये एक ही आसान विकल्प पर अमादा हो जाते है कि अब तो यह जानवर नर भक्षी हो गया है इसे तो मारना ही पड़ेगा......................आखिर ऐसा क्यो अगर हम पहले ही कुछ सोच ले तो शायद मनुष्य और जानवर दोनों ही बच सके।
ने आज यह विशाल वनों का जीव एक छोटे से बाग में वन-विभाग की संगीनों के ्साये में है किस वक्त उसकी एक आहट पर ढेर सारा बारूद उस जानवर के जिस्म में पैबस्त हो जायेगा................. और एक खूबसूरत और निरीह जीव इस धरती से विदा कभी जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ इनका ही राज था हम तो बहुत बाद में आये तब तो इन जानवरों हमारा कोई विरोध नही किया था और आज हम चाहते है कि सिर्फ़ हम ही इस धरती के मालिक है और हमारे सिवा यहां किसी का कोइ हक़ नही !!

अप्रिल २४ २००८ को लखीमपुर खीरी की धौरहरा तहसील में दो दो मानव मौतें हुई जिनका कारण एक तेन्दुआ है जो इस इलाकें में तकरीबन पिछले पांच महीनों से भटक रहा है बीच बी़च में एक बाघ की मौजूदिगी की पुष्टि होती रही है
मानव आबादी में ये जानवर अक्सर आ जाते है वजह साफ़ है कि जंगलों में अब इन जानवरों के खानें के लिये कुछ नही बचा और जंगलों की अवैध कटाई से इनके आवास भी नष्ट हो रहे है नतीज़ा ये है कि भोजन की तलाश में ये निरीह जीव मानव आबादी में आ जाते है और वहां इनका अनजानें में किसी न किसी मानव से टकराव होता है और यही से शुरू हो जाता है मनुष्य और जनवर के बीच संघर्ष और अन्ततोगत्वा ये जीव मौत के घाट उतार दिये जाते है नर भक्षी का तमगा पहनाकर.........!!!!
खीरी जनपद में सन २००५ की गणना के मुताबिक यहां सिर्फ़ सात तेन्दुये है किन्तु २००५ में एक तेन्दुआ वन विभाग ने नर-भक्षी घोषित कर मार दिया। अब हम ये कह सकते है कि हमारे खीरी के वनों में मात्र आधा दर्जन तेन्दुयें ही बचे है क्यो कि सड़क दुर्घटनाओं या फिर बड़े परभक्षियों द्वारा मार दिये गये। मानव की बढ़्ती आबादी वनों में आदम की आमद अवैध शिकार खासतौर पर इन बाघों व तेन्दुओं के शिकार यानी हिरन आदि ..........की वजह से अब ये जानवर आबादी में आने पर मजबूर हो जाते है पर यहां भी कुछ नही छोड़ा इस मानव प्रजाति ने क्योकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और विकास के इतने दावों के बाद भी यहां की ६०-७० फ़ीसदी आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है चाहे भोजन हो या फिर उर्जा के लिये लगातार प्रकृति का दोहन जारी है खेती का बदलता ढ़ाचा, अब इन जीवों के लिये यहां रहना दूभर हो गया है पहले इन जंगली जीवों को मानव आबादी में भी खरगोश जैसे जीव मिल जाते थे पर मनुष्य ने इनका भी शिकार कर कर इन्हे समाप्त कर चुका है जहां देखों वहां मानव और घटते प्रकृतिक संसाधन....................॥ कभी जंगली जीव और मनुष्य एक साथ रह लेते थे बिना किसी तकराव के!
खैर उत्तर प्रदेश का वन विभाग पिछली घटनाओं की तरह इस बार भी इस भूखे और भटके तेन्दुये द्वारा मारे जा रहे मनुष्यों का मुआवजा देने के अलावा कुछ नही किया है और इनज़ार करता रहा की कब राजनैतिक और पब्लिक का दवाव बढ़े और इसे नर-भक्षी करार कर इसे मार दिया जाय ताकि न रहे बांस और ना बजे बान्सुरी।
हालांकि इस बार भी वो सब नाटक हुए जो हमेशा होते है बेहोशी देने वाला डाक्टर बुलाया गया, पिंजरे रखे गये आदि आदि फिर संसाधनों की कमी का रोना रोकर बैठ जाना...................!!! अब इस तरह की चार महीने से हो रही घटनाओं के बाद आखिरी रास्ता तेन्दुये को नर-भक्षी बता कर मार दिया जाये।
अब आप बताइये कि इन भूखे और भटके हुए जीवों को नर-भक्षी कौन बना रहा है?
आप सब को ये बताने का मेरा एक उदेश्य है कि इस जीव को बेहोश कर जंगल में दोबारा भेज दिया जाये ताकि विलुप्त हो रही यह प्रजाति शायद बचायी जा सके!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
९४५१९२५९९७

2 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

विलुप्त हो रही यह प्रजाति शायद बचायी जा सके!---- यथार्थ और सटीक लेख।

Grogal said...

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