Saturday, December 24, 2011

भारत में एक योरोपियन रियासत की कहानी

J.B.Hearsey's Bungalow at Mamri Lakhimpur, India
राजा ममरी का किला-

भारत में योरोपियन रियासत की एक कहानी-

महान! एंग्लो- इंडियन हर्षे परिवार के निशानात मौजूद है उत्तर भारत के खीरी जनपद में-

ईस्ट इंडिया कम्पनी सरकार से शुरू होकर आजाद भारत के रियासतदारों में हर्षे कुनुबा-

अब वे दरो-दीवार भी मायूस है ..

उत्तर भारत की तराई सर्द मौसम, घना कोहरा जो नज़ारों को धुंधला देखने के लिए मजबूर कर रहा था, कोहरे की धुंध और सर्द हवाओं में गुजरते हुए इतिहास की रूमानियत लिए मैं ब्रिटिश-भारत के उस महत्वपूर्ण जगह से रूबरू होने जा रहा था जो अब तक अनजानी और अनकही थी इतिहास के धरातल पर...

इस जगह के बारे में मैं एक दशक से किताबी राफ़्ता रख रहा था, किन्तु नाजिर होने का मौका आज था, मन में तमाम खयालात और अपने किताबी मालूमात के आधार पर कहानियां गढ़ते मैं अपने एक साथी गौरव गिरि (गोलागोकर्ननाथ) के साथ गोला से मोहम्मदी मार्ग पर चला जा रहा था। बताने वालो के मुताबिक मार्ग पर स्थित ममरी गांव को पार कर लेने के बाद एक नहर पुल मिलना था और फ़िर उस जगह से वह एतिहासिक स्थल दिखाई पड़ेगा ऐसा कहा गया था!

 ज्यों ही नहर के पुल पर पहुंचा और ठहर गया, आंखे खोजने लगी उस अतीत को जो हमारा और उनका मिला जुला था, बस फ़र्क इतना था कि इस इतिहास को गढ़ने वाले वे लोग हुक्मरान थे, इस जमीन के, और हम सामन्य प्रजा। नहर के पुल से मैं पश्चिम में जल की धारा के विपरीत चला, जहां एक बागीचा था और उसमें मौजूद कुछ खण्डहर, अपने अतीत और वर्तमान के साथ, और उनका भविष्य उनके वर्तमान में परिलक्षित हो रहा था। मैं मायूस हुआ वो एक नहर कोठी थी सुन्दर किन्तु ध्वंश ! बरतानिया शासन की नहर कोठियों में बहुत दिलचस्पी रही मेरी, परन्तु आज मैं कुछ और ही तलाश रहा था......
हमारी जमीन पर गोरो की सत्ता का केन्द्र- हर्षे बंग्लो:

आखिरकार हमें वापस पुल पर फ़िर आना पड़ा और नहर की जल धारा के समानान्तर चलते हुए मुझे कुछ दिखाई पड़ा एक सुन्दर दृष्य- खजूर के विशाल वृक्ष, तालाब, पीली सरसो के फ़ूलों से भरे खेत और इसके बाद एक किलेनुमा इमारत-----बस यही तो वह जगह थी जिसकी मुझे तलाश वर्षो से थी। जिसके बारे में पढ़ते और सुनते आये थे...किवदन्तियां, रहस्य और वृतान्त.....

उस किले के नजदीक जाने से पहले कुछ तस्वीरे खीची और फ़िर मैं उस इमारत के सामने के प्रांगण में जा पहुंचा, जहां पास  के खेत में काम करता हुआ एक व्यक्ति दिखाई दिया, आवाज देने पर वह मेरे नजदीक आया- नाम पूछने पर पता चला वह छोटे सिंह है, इस कोठी के मालिक ज्वाला सिंह का पुत्र । मैने उस कोठी के अन्दर घुसने का विनम्र दुस्साहस करने की बात कही तो उसने मना कर दिया, वह सहमा हुआ सा था, जिसकी कुछ अपनी वजहे थी। किन्तु थोड़ी देर बाद वह इमारत से बाहर आया और अन्दर आने के लिए कहा, मेरे मन में बस कोठी की अन्दरूनी बनावट, पुराना एंग्लो-इंडियन फ़र्नीचर और कुछ अवशेष देखने भर की थी, खैर मैं इमारत के बाहरी कमरे में घुसा तो नजारा बिल्कुल अलग था, एक बांस की खाट (खटिया) पर लेटे एक बुजुर्ग रूग्ण और बुरे हालातों से लत-पत, कमरे कोई फ़र्नीचर नही और न ही बरतानिया हुकूमत के कोई शाही निशानात सिवाय गीली छत और बे-नूर हो चुकी दीवारो के, छतों में भी घास और वृक्षों की पतली जड़े सांपों की तरह घुमड़ी हुई दिखाई दे रही थी।


 एडिमिनिस्ट्रेटर जनरल  ने इसकी नीलामी कराई

उनसे मुलाकात हो जाने पर कुछ मैं खश हुआ चलो इनकी आंखो से इस इमारत के इतिहास को देखते है, ज्वाला सिंह जो कभी मिलीट्री वर्कशॉप बरेली में नौकरी कर चुके थे और अब रिटायर्ड होकर यही रहते थे अपनी पत्नी और बेटे के साथ, इनके पिता गम्भीर सिंह (डिस्ट्रिक एग्रीकल्चर आफ़ीसर) ने इस इमारत को सन 1966 में खरीदा,  भारत सरकार द्वारा जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम के तहत इस सम्पत्ति की नीलामी की और मात्र २९ हजार रुपयें में यह शाही इमारत और ३० एकड़ भूमि को क्रय कर दिया गया, और तबसे यह सम्पत्ति इनके परिवार के आधीन है। गम्भीर सिंह के तीन पुत्रों में सबसे छोटे ज्वाला सिंह इस जगह के मालिक है। ये पुणीर क्षत्रियों का परिवार मूलत: मुजफ़्फ़रनगर का है

तिब्बतियों ने भी शरण ली हर्षे के महल में-

ज्वाला सिंह के मुताबिक सन 1962 में चाइना-भारत युद्ध के समय तमाम तिब्बती प्रवासियों को इस इमारत में ठहराया गया और उसके बाद इसमें रेवन्यु आफ़िस खोला गया। नतीजतन इस किले का शानदार फ़र्नीचर और सामान या तो सरकारी मुलाजिम जब्त कर गये या तिब्बतियों ने- आज बस वीरान इमारत के सिवा यहां कुछ नही।  



इमारत के निर्माण वर्ष को ठीक से वे बता नही सके, और इमारत की प्राचीरों से कोई लिखित प्रमाण भी नही मिला, सिवाय ईंटों के, शुक्र है कि उस वक्त ईंट भट्टों में जिन ईंटों का निर्माण किया जाता था उनमें ईंस्वी सन या संवत का वर्ष पड़ा होता था, और इस वजह से ध्वंश अवशेषों के निर्माण-काल ज्ञात हो जाता है। किन्तु आजकल ईंट भठ्ठे वाले उल्टे सीधे नामों को छापते है ईंटों पर ! 

फ़ूस-बंग्ला-

ध्वंशाशेषों में कुएं की प्राचीर से मिली ईंटों पर सन 1884 की ईंटे प्राप्त हुई और दीवार की प्राचीरों से सन 1912 ई० की, यानि यह जगह सन 1884 के आस-पास आबाद की गयी। बताते हैं मौजूदा इमारत के पहले फ़ूस के बंगलों से आछांदित था यह बंगला, इस इमारत के मालिकों को भारतीय घास फ़ूस के वातानुकूलित व मजबूती के गुणों का शायद भान था और इसी लिए जिला मुख्यालय पर मौजूद इनकी कोठी भी फ़ूस से निर्मित थी- जिसे लोग फ़ूस -बंग्ला भी कहते आये। 


ज्वाला सिंह के मुताबिक इस इमारत और जमीन जायदात के मालिक जे० बी० हर्षे जमींदारी विनाश अधिनियम के पश्चात सम्पत्ति जब्त हो जाने के बाद मसूरी में रहने लगे थे और सन 1953 में  वही हार्ट अटैक से उनकी मृत्यु हुई।


योरोपियन वनस्पति?-



एक बात और और इन्सान जहा रहता है वहां के वातावरण को अपने मुताबिक ढालता है, और वही वजह रही कि इस जगह पर अभी भी योरोपियन वृक्ष, लताये मौजूद है । अपने गौरवशाली अतीत में यह इमारत बहुत ही खूबसूरत रही होगी और इस इमारत का एक गृह-गर्भ भी है, यानि जमीन के भीतर का हिस्सा जो रियासती दौर में खजाना रखने के काम आता था।



इमारत के चारो तरफ़ फ़ूली सरसों इसकी सुन्दरता को अभी भी स्वर्णिम आभा दे रही , आस-पास में बने सर्वेन्ट क्वार्टर्स, रसोई, कुआ इत्यादि, जिनमें तमाम अनजानी बेल, झाड़िया...1857, और कुछ रहस्य पोशीदा है, जिन्हे वक्त आने पर बताऊंगा.....!
मिलनिया-
एक नये शब्द की खोज भी हुई उस जगह पर अपने अन्वेशण के दौरान इमारत के पिछले हिस्से की तरफ़ मैं तस्वीरे ले रहा था तभी लकड़ियों का बोझ लिए एक महिला वहां से गुजरी, मै बात कर रहा था बहुत छोटे कमरे की जिस पर खपरैल बिछा था, उसने कहा कि यह मन्दिरथा जिसे योरोपियन मालिको ने नह बल्कि मौजूदा मालिकों ने बनवाया था और यहां पर एक मिलनिया लगवाई थी- पूछने पर पता चला गन्ना पेरने वाला कोल्हूं को उसने मिलनिया कहा था !  


मंजर वही है बस नाजिर और वक्त बदल गये-
...अब मैं लौट रहा था सूरज भी यहां से मेरे साथ-साथ चल दिया था, मै उस जाते हुए सूरज को कैमरे में कैद कर रहा था, यह सोचकर इसने अब तक मेरा साथ दिया, नजारों को रोशन किया और इसकी रोशनी ने तस्वीरे लेने में मदद की, यह भी गवाह बना मेरी मौजूदगी का, कृत्यज्ञता का भाव था उस कथित डूबते सूरज के लिए, मैं सोचने लगा कि कभी बरतानिया हु्कूमत में इस रियासत के हुक्मरान हर्षे परिवार के लोग बड़ी रूमानियत से सूरज के डूबने का नजारा देखते होगे और खुश होते होगे- कि ब्रिटिश राज का सूरज कभी नही डूबता.....और आजादी के बाद जब यह सूरज डूब रहा होगा तब भी उन गोरो ने अपने इस किले से बड़ी मायूसी और हार के भाव से उसे डूबते हुए देखा होगा, और आज ये आजाद भारत के ठाकुर साहब जो मौजूदा मालिक है अपने रूग्ण शरीर और विपरीत परिस्थिति के साथ इस सूरज के डबने के मंजर को देख रहे होगे, मंजर एक ही है पर मनोभाव जुदा-जुदा है...काल और परिस्थिति इन्सानी सोच में इतनी तब्दीली लाती है की चीजों के मायने बदल जाते है जहन से....

इति 


नोट- इस किले के रहस्य और इसके मालिकानों का तस्किरा कभी और...हां इतना बता दूं कि खीरी जनपद की इस इमारत में रहने वाले योरोपियन मालिकान बंकिमघम पैलेस से लेकर फ़्रान्स और अमेरिका में अपनी बुलन्द हैसियत के लिए जाने जाते रहे हैं।  
© कृष्ण कुमार मिश्र (सर्वाधिकार सुरक्षित)




कृष्ण कुमार मिश्र
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Monday, October 17, 2011

जब सूरज भी खिलखिला उठा !

एक बड़ा सा सरकारी सरोवर जो बनाया गया है एक प्राकृतिक विशाल तालाब में कई टुकड़ों में इसे बांट कर इसकी सरहदे तय कर दी गयी हैं, ताकि ठेकेदारों को उन टुकड़ों को बेचा जा सके, और जलीय जीवों का व्यापार हो सके, किन्तु प्रकृति अपना स्वरूप तलाश ही लेती है, उसे कितना भी बिगाड़ा जाए... उन टुकड़ों में कमल भी खिल आये है और कुमदनियां भी, सरहदों पर बेहया, और मदार के खूबसूरत पुष्प भी, जल में नारी और जल-कुम्भी भी फ़ूल रही है...और इन पुष्पों पर मड़रा रहे है सतरंगी जीव.... और इसी जगह पर यह सूरज भी खिलखिला उठा उस वक्त जब मैं इन खि्ली हुई ज़िन्दगियों की इस सुन्दरता को उतारने की कोशिश कर रहा था.

.कृष्ण कुमार मिश्र




सभी तस्वीरें सर्वाधिकार सुरक्षित
© कृष्ण कुमार मिश्र


Wednesday, July 27, 2011

अपनी धरती की इन राहों पर मेरे पद-चिन्ह


लखीमपुर टू मोहम्मदी:
काले बगुले की तलाश में एक यात्रा पर इस यात्रा पथ पर जो मिला जो कुछ महसूस हुआ और जो विगत स्मृतियां दोबारा मन को पल्लवित कर गयी उसका दस्तावेजीकरण करने का मन हुआ सो की-बोर्ड को उंगलियां अनियमित क्रम में उद्वेलित करने लगी....२५ जुलाई दिन का तीसरा पहर बादल कहंकशा में सूरज पर झीनी चादर डालते और फ़िर हट जाते,.... मैं चित्र-यन्त्र और मेरी बैलगाड़ी..हम तीनों तराई के इस जनपद की हरियाली के मध्य काली सड़क पर गतिमान थे, बारिश के बाद का ये मंजर जिसने प्रकृति को नहलाने में कोई कसर नही छोड़ी थी, मार्ग के दोनों तरफ़ धान के खेत और उन्हे सिंचित करते किसान...एक जगह शरीर ने पानी की दरकार की तो मन हैंडपंप की तलाश में झांकने लगा इधर-उधर, हाई-वे की तरह छोटी-बड़ी दुकानों पर महीनों पुराना बोतलबंद पानी तो मौजूद नही था इस डिस्ट्रिक्ट रोड पर, लेकिन जल्द ही एक खेत में पम्प-सेट आधा फ़िट की गोलाई में जमीन से सफ़ेद पानी निकालता हुआ दिखाई दिया..इस पानी पर पड़ती सूर्य-रश्मियां इसे नीला चमकदार बना रही थी। जल-धारा का जमीन से निकल कर सूर्य-रश्मियों के साथ संगम मन में पावन-नैसर्गिक भाव जगा रही थी...शायद जल के वेग और हवा, और सूरज की किरणों के साथ मेल-मिलाप जो जल के स्वरूप और रंग को विविध छटाओं में परिवर्तित करती हैं के कारण ही जल पवित्र और पूज्यनीय रहा सभ्यताओं में !..मामला नैसर्गिक सुन्दरता से जल के गतिमान होने, आक्सीजन (हवा) के मिश्रण  और उल्ट्रावायलेट किरणों के वायरस-बैक्टीरिया पर प्रभाव तक पहुंच रहा है... जल को सदैव स्वच्छ रखने में मदद करता है,... इस-लिए आगे बढ़ता हूं...

!...उस पम्प सेट के मालिक ने जो सिक्ख था ने मेरी खाली बोतल में जीवन की अहम बुनियादी जरूरत का सामान भर दिया..चमकदार नीला आसमानी द्रव..मैं कृत्यज्ञ था। कुछ आगे चलने पर एक बरतानियां हुकूमत के दौर की नहर मिली जिसके पुल को पार करते हुए मेरी नज़र ने नष्ट हो चुके जंगल के मध्य बसे उस गाँव को देखा जहाँ अभी भी खजूर के वृक्ष बे-हिसाब हैं, और हाँ उनमें पीले-पीले खजूरों की गहरें लटक रही हैं...यह खजूर के फ़लने का मौसम जो हैं, खजूर का जिक्र इस-लिए क्योंकि खजूर इन्सान की पुरानी रिहाइश को दर्शाते हैं।  तो वह गांव जिसे देखकर मेरी आंखों में गर्व का भाव और नसों में रक्त की प्रबलता बढ़ा दी थी..उसकी वजह थी कि मैंने इतिहास की किताब के पुराने पन्ने पलट रहा था...यहाँ कुछ कहने से पहले यह बात बाता देना जरूरी है, कि मैं अपने अतीत को गुलाबी चश्में से नही देखता, क्योंकि मैने आजतक कोई चश्मा पहना ही नही...अपनी वृत्ति और प्रकृति प्रदत्त उन नंगी आंखो से ही दुनिया देखने की चाहत पैबस्त है मेरे जहन में...और उसी नंगी आंख से नज़िर हुए मसलों को बयाँ कर रहा हूँ।

आजादी के खातिर भारत के स्वतंत्रता संग्राम में अन्तिम आहुति



इस गाँव का नाम है भीखमपुर, स्वतंत्रता आंन्दोलन में इसी गाँव क्रान्तिकारी पं० राजनरायन मिश्र को अंग्रेजों के खजाने को लूटने के इल्जाम में फ़ाँसी की सज़ा हुई, उन पर अन्य क्रान्तिकारी गतिविधियों के आरोप भी थे, ब्रिटिश-भारत में ट्रेन डकैती के आरोपी के नाम पर आज आजाद भारत में उसी स्थान पर एक रेलवे स्टेशन का निर्माण हुआ और जिसका नाम राजनरायनपुर रेलवे स्टेशन रखा गया है।
यहाँ यह बताना जरूरी है कि राजनरायन मिश्र को आजादी के इस संघर्ष में सन १९४७ में लखनऊ जेल में फ़ाँसी हुई, बरतानिया सरकार द्वारा दी जाने वाली यह आखिरी फ़ांसी की सजा थी। स्वतंत्रता संग्राम में किसी क्रान्तिकारी के प्राणों की यह आखिरी आहुति थी।

साठा धान
अपनी जमीन की क्रान्तिकारी पैदावार के गर्वीले भावों के साथ आगे बढा तो एक सरदार जी को धान की कटी फ़सल वाले खेत में आग लगाते देखा वो धान की कटी हुई जड़ों को जलाकर उस खेत में दोबारा धान की रोपाई करना चाहते थे, खेत को जलाने से सफ़ाई के साथ साथ उर्वरता और खर-पतवार नष्ट हो जाते है। लेकिन यहां गौर करने वाली बात है कि मार्च-अप्रैल में गर्मी के मौसम में साठा यानी साठ दिन में पकने वाली धान की प्रजाति की रोपाई करना अप्राकृतिक तो है ही साथ ही जमीन के जल-स्तर को काफ़ी नुकसान पहुंचाती है, तराई के जनपदों में साठा धान पैदा करने की अब होड़ सी है हर कोई एक ही मौसम में दो फ़सले ले लेना चाहता है। खैर किसान की स्थिति को ध्यान रखे तो प्राकृतिक दोहन की उसकी मजबूरी समझ आती है, कम से कम वह अपने खेतो की जमीन और उसके तले छुपे पानी का ही दोहन करता है, पर देश के बुर्जुआ तो इस धरती के बड़े बड़े प्राकृतिक स्रोतो को शोषित कर रहे है कागज की नोटों के बदले और हां ये लोग बहुत कुछ पाने की गुंजाइश मात्र से ही अपनी अस्मत इज्जत का शोषण करवाने से भी नही चूकते।

खेत के खरपतवार और धान की मुर्दा जड़ो से निकलता सत-रंगी धुआँ और धुएं में तर-बतर सरदार जी अपने धर्म-निष्ठा के साथ इस कार्य में व्यस्त, धुएं से घिरे हुए सरदार जी की पगड़ी और कटार साफ़ साफ़ चमक रही थी। वे अपने इन अस्त्र-वस्त्र को धारण करना नही भूले इस काम के वक्त भी, मुझे उनकी यह धर्म-निष्ठा प्रभावित कर गयी।
हाँ धुएं का हाल भी सुनते चलिए...जलने वाली चीज की तासीर के मुताबिक यह धुआं अपना रंग बदलता, खेत में मौजूद मुर्दा पौधो से निकलता धुआं, और जिन्दा पौधों के जलने से निकलते धुएं के रंग इतर-इतर थे। धुएं के रंग और उसके स्वरूप से उसके स्रोत के हालात का अन्दाजा लगाना आसान था। और इस रंगबिरंगे धुएं से घिरे सरदार जी जो पूरी तरह अपने काम में मशगूल थे, मेरी मौजूदगी के बावजूद, उनकी तन्मयता नें मुझे उनकी धुएं के साथ तस्वीरें लेना और सुन्दर बना रहा था।
यहां भी खेत में काम करने वाले सरदार जी के बड़े भाई ने चलते वक्त यह कह कर पानी की बोतल मेरी तरफ़ बढा रहे थे कि ठ्ण्डा पानी है.....यहां भी मैं कृतज्ञ हुआ।

काला बगुला


आगे चलते हुए जो दिखा उसे नज़रन्दाज करना पड़ा क्योंकि धरती का हमारा वाला हिस्सा सूरज से दूसरी तरफ़ तेजी से जा रहा था, और काला बगुले की तस्वीर अंधेरे में न लेने पाने का डर तेजी से मुझे मोहम्मदी के अलीनगर गांव की ओर चलने को मजबूर कर रहा था, चूंकि मेरे मित्र वाइल्ड लाइफ़ फ़ोटोग्राफ़र सतपाल सिंह जी मुझे सूचित कर चुके थे, कि काला बगुला उनके ही धान के खेत में मौजूद है, इस वक्त सो मेरी उत्कंठा और बढ गयी थी। यहां ये बताना जरूरी है, कि इस प्रजाति के (कैटल इग्रेट) काले बगुले का वर्णन किसी भी पक्षी विज्ञान के दस्तावेज में संभवता मौजूद नही है, और यह अपने आप में पक्षीविज्ञान के इतिहास में बड़ा व विचित्र मसला होगा। यहां गौर करने वाली बात यह है, कि यह काला बगुला दिन में एक बार सतपाल सिंह के खेतों में या उनके घर के नज़दीक जरूर दिखाई देता है, और सतपाल सिंह ने इसकी तमाम तस्वीरें भी खींची...एक फ़ोटोग्राफ़र और काले बगुले का यह रिस्ता बड़ा विस्मयकारी है!

धान के खेतों गहराई तक घुसते पैरों को सभांलते  हुए कुछ तस्वीरे ली इन जनाब की, काले बगुले से यह मेरा पहला साक्षात्कार था, पर उन्होंने अपने आप को  धान की पौध में छिपाने की बहुत कोशिश की, लगता था कि वे जनाब तस्वीरें खिंचवाते खिंचवाते थक गये थे, या सेलेब्रेटी होने का एहसास उन्हें ये नखरे दिखाने पर विवश कर रहा था।

अंधेरा हुआ काला बगुला भी लम्बी उड़ान भर गया इन खेतो से, और हम वापस आ गये सतपाल सिंह के फ़ार्म हाउस पर यहां इन्होंने पानी के साथ साथ समोसे व कोल्ड्र ड्रिंक भी पिलाई...स्प्राइट....इस यात्रा में मैं तीन सिक्खों से अनुग्रहीत हुआ....अन्तिम वाले से ज्यादा...क्योंकि उन्होंने स्प्राइट भी......!

ईश्वर का निर्माण


लौटते हुए रात के १२ बज रहे थे मोहम्मदी और गोला के मध्य साउथ खीरी के घने जंगलों के मध्य यह सड़क जिस पर कभी इतनी रात में इक्का-दुक्का वाहन ही गुजरते थे...आज सैकड़ों की तादाद में काँवरियें गाते बजाते शिव-नगरी गोला-गोकरनाथ की तरफ़ बढ रहे थे, ये जत्थे ५ से लेकर ५० की सख्यां में थे पूरी सड़क केशरिया हो चुकी थी, धर्म और भक्ति का यह भाव मनुष्य को मनुष्य बनाता है, मैं सोच रहा था ये लोग सैकड़ो मील की यात्रा पर है, मज़दूरी छोड़, अपने घर के दुख-तकलीफ़ों को छोड़ अपने परिजनों को छोड़कर नंगे पांव शिव भक्ति में तल्लीन इतनी लम्बी धर्म-यात्रा कैसे कर रहे है, और यदि इनके भावों ने इन्हे ऐसा करने के लिए प्रेरित किया है तो आज की भोर जब बहराइच से बढ़ रहे हज़ारों लोग, फ़रूखाबाद से आ रहे भक्त और बरेली-पीलीभीत से आ रहे लोगों की लाखों की तादाद इकट्ठा होगी शिव नगरी में तो हर हर महादेव ....पूरे वायुमण्दल को गुजांयमान कर जायेगा और इतनी जीव-आत्माओं की एकनिष्ठा शिव को निश्चित ही उत्पन्न कर देगी, उस स्थल पर जिसे ये पूजने जा रहे हैं, इनकी आत्मीय उर्जा और उनकी शिव भक्ति के भाव एक बड़े उर्जा पुंज को अवश्य दैदीप्तिमान करेंगे..और ईश्वर का यह एक रोमांचक निर्माण होगा...इन लाखों मानवों की उर्जा और भक्ति भाव से......ये शिव को उत्पन्न करने के लिए शिव का निर्माण करते भुए ही तो इस यात्रा में है।...भक्ति की इस शक्ति को देखते हुए कल्पना के घोड़े दौड़ाता हुआ ...धर्म की ताकत का एहसास करता हुआ ...और मानव के काल्पनिक और पवित्र निर्माण से अभिभूत होता हुआ मैं लखीमपुर की तरफ़ बढ़ चला।


कृष्ण कुमार मिश्र
   Cellular- +919451925997    


Friday, June 24, 2011

चन्द्रग्रहण- मेरी नज़र से...

चन्द्रग्रहण 15/16 जून 2011- 


लखीमपुर खीरी, उत्तर प्रदेश भारत


- कृष्ण कुमार मिश्र









Krishna Kumar Mishra
krishna.manhan@gmail.com

Thursday, July 29, 2010

जो रईंसों के घर-आँगन में खिलने का गरूर रखते थे!

Kachnar: Photo courtsey: Wikipedia.com
पुष्पवाटिकायें जिनसे महरूम रहा आम आदमीं!

बात फ़ूलों की करना चाह्ता हूं, चूंकि मसला खूबसूरती और खुशबुओं का है, तो थोड़ा हिचक रहा हूं! प्रकृति की अतुलनीय सुन्दरता का बखान करना वर्तमान में मुश्किल और पिछड़ेपन  की निशानी है..इन महान साहित्य पुरोधाओं के मध्य…क्योंकि वह समाज की गन्दगी जो उनकी नज़र में पहले से मौजूद है, रिस्तों की कड़वाहट जो उनके घरों में विद्यमान है…दुखों, करूणाओं और प्रेम के तमाम विद्रूप आकार-प्रकारों को (जो उनके मन शाम-सबेरे हर वक्त उपजते रहते हैं) बेचते ये बुद्धि-विद्या के स्वयंभू अब प्रकृति की बात करने में शर्मसार होते है..कारण स्पष्ट है कि रेलवे स्टेशनों, बसड्डों बुक स्टालों पर प्रकृति प्रेम! नही खोजते यात्री! और राजिनीतिक गलियारों में वोट और गोट में प्रकृति समा ही नही सकती!…फ़िर कौन बेवकूफ़ इन्हे फ़ूल, पत्तियों पर लेखन के लिए पुरस्कृत कर देगा! खैर..मैं लिए चलता हूं कालीदास और उस दौर के तमाम…. प्रकृतिकारों का नाम भूल रहा हूं!!!!…..  जब सरोवरों में कमल-कमलिनियां पुष्पित होते थे और राज-कन्यायें उनमें स्नान करने आया करती थी…तो घोड़े पर सवार राज-पुरूषों के घोड़ो को अक्सर उन्ही सरोवरों पर पानी पिलाना आवश्यक होता था !! महलों और बगीचों में युनान,  मंगोलिया, अरब देशो से लाये गये वृक्षों, झाड़ियों, और लताओं की सुनहरी छटाओं का जिक्र रामायण काल से लेकर राज महलों व बौद्ध मठों तक विस्तारित था! मुगलों ने भी दुनियाभर से प्रकृति के विविध रूपों को अपने बगीचों में खूब इकट्ठा किया….फ़ुलवारियों के रूप में!…हाँ हमें अंग्रेजों को कतई नही भूलना हैं जिन्होंने दुनिया में मौजूद अपने साम्रराज्य के प्रत्येक भू-भाग पर उगने वाली सुन्दरता को भारत के विविधता पूर्ण  मौसम व जमीन में रचा-बसा दिया, जिसकी कुछ झलकें अभी भी कुछ सरकारी आवासों में दिखाई दे जाती हैं!…

मैं आप को याद दिला दूं एडविन लैंडसीयर लुटियन की जिसने नई दिल्ली का निर्माण किया और गवर्नर हाउस, रायसीना हिल जैसी जगहों को प्रकृति के इन रंगो से सरोबार….!! भारत के वन विभाग के पुराने डाक बंग्लों में कुछ योरोपीय व अफ़्रीकी वनस्पतियां अभी भी मिल जायेंगी जिन्हे अंग्रेज सुन्दरता और सुगन्ध के लिए इन जगहों पर लगाया था!….एक बात कहना चाहूंगा कि धरती पर कोई प्रजाति देशी-विदेशी नही होती…बशर्ते उसे धरती का वह हिस्सा उस प्रजाति को अपना ले…..!

अब भूमिका शायद लम्बी व निरर्थक हो रही तो चलिए आप को ले चलते है उत्तर भारत के मैनहन ग्राम में जहा सरोवर भी है और आम-जामुन व पलाश के बगीचे भी, जो धीरे-धीरे पतन की राह पर अग्रसर किए जा रहे हैं! १९८०-९० के भारत में बचपन में मैनें उन्ही गांवों में फ़ुलवारियां देखी जहां कोई मन्दिर मौजूद हुआ और उसके आस-पास पुजारी प्रवृत्ति के लोग…उन्हे रोज जो भगवान को पुष्प अर्पित करने होते थे! सो पुष्प की उप्लब्धता की व्यवस्था  भगवान की मौजूदगी पर निर्भर थी! इन फ़ुलवारियों के रूप में! नही तो पुष्प व पुष्प-वाटिकायें आदि भारत में राजा-महराजाओं, मध्य भारत में नवाबों और माडर्न ईंडिया में अफ़सरों का विषय ही रहे, एक आम व औसत हिन्दुस्तानी रोटी के जुगाड़ में ही दिन काट रहा होता था उसे तो पेट भरने के लिए रोटी की सुगन्ध ही दरकार रही बेचारा पुष्प और उनकी खुशबुओं से बावस्ता हो, इसका न तो उसे कभी मौका मिला और न ही खयाल आ पाया। हाँ इतिहास के पन्नों में जमींदारों और राजाओं की जो फ़ुलवारियां हुआ करती थी, उनमें न तो आम हिन्दुस्तानी को जाने की इजाजत थी और न ही उस फ़ुलवारी के किसी पौधें का बीज या कलम किसी अन्य को मिल सकती थी..कारण स्पष्ट था कि आम हिन्दुस्तानी के घर में पुष्प खिला, तो उन जमींदार महाशय के रसूख में धब्बा लग जायेगा….

एक वाकया याद आ गया है, सुन ले….मेरे जनपद की तहसील मोहम्मदी जो कभी बरतानिया सरकार में  जिला होने का गौरव रख चुका है, वहां दिल्ली सरकार (मुगल) के समय डिप्टी कमिश्नर  टाइप की हैसियत से रहने वाले जनाब ने एक बगीचा लगाया था, उसमें केतकी (केवड़ा) का पुष्प कहीं से लाया गया, जो इस इलाके भर में अदभुत व अप्राप्त वनस्पति वन कर सैकड़ों सालों तक गौरवान्वित होता रहा…आम हिन्दुस्तानी जिसकी आज भी आदत क्या खून में यह पैबस्त है, कि राजा के घर की घास-पूस भी कुछ अतुलनीयता अवश्य रखती है…और वह मूर्ख उस सामान्य बात या वस्तु को असमान्य ढंग से पेश करता हुआ अपने को गौरवान्वित करता आया है….हाँ तो वह साधारण सा केवड़ा केतकी वन सिर्फ़ उसी बाग में खिलता रहा और हमारे लोग यहाँ तक की मीडिया गौरवगीत गा गा कर भरार्ने लगा….लेकिन सिलसिला नही टूटा….आदत में है जो…..कभी भारत की विविधिता का खयाल भी नही किया कि जहां हर देवता के सहस्र नाम हो, जहां की भाषा पर्यावाचियों से लबालब ठसी हुई हो..जहां एक कोस पर चीजों के नाम बदल जाते हों…इस बारे में भी नही सोचा…केतकी ही केवड़ा है जो हमारे गांवों में भी खिलता है!..बस केतकी जो वर्ष में एक बार  खिलती है!….दुनिया में सिर्फ़ मोहम्मदी में…संसार में नही होती…फ़लाने हसन द्वारा लाई गयी..केतकी….यह डाकूमेन्टेशन है हमारे मुल्क में…..बहुत जल्दी जहां चीजे बिना सोचे समझे अदभुत हो जाती है…और सरकार व पढ़े लिखे लोग उसे पढ़ते जाते है…बिना सोचे…जाने….साल दर साल केतकी खिलती रही….अभी भी खिलती है…….पूरे संसार में सिर्फ़ खीरी जिले को यह गौरव प्राप्त है…..आखिर फ़िर वह लाये कहां से थे इस केतकी को?..जब संसार में सिर्फ़…..मजा तो तब आया जब मेरे एक परिचित बुजर्ग ने गर्जना करते हुए मुझसे कहा कि केतकी उनके यहां खिला…..उनकी गर्जना में सदियों से गुलाम रहे हिन्दुस्तानी के भीतर चेतना व आत्म-गौरव का झरना स्फ़ुटित हो रहा था…जैसे वह तोड़ देना चाहते हो उन जंजीरों को जो सिर्फ़ यही कहती हो कि यह पुष्प सिर्फ़ राजा या नवाब के बगीचे में खिलता हो….उन्हे मैं सलाम करता हूं उनके इस जज्बे के लिए….काश…फ़िर सराहनीय है उनका प्रयास!
दरसल वो कही से केतकी का सम्पूर्ण (!) पौधा लाये और उसे रोप दिया…इसमें एक टेक्निकल मामला है, मोहम्मदी वाले केतकी का पौधा जमींदारी रहते तो आम आदमी को अपने घर लगाने की गुस्ताखी नही कर सकता था, लेकिन आजादी के बाद उसने जरूर प्रयास किए..किन्तु इस प्रजाति में नर व मादा पौधे अलग-अलग होते हैं ..इसलिए जिसने भी एक पौध उखाड़ कर अपने घरों में लगाई तो नर व मादा में से एक की अनुपस्थिति उसमे पुष्पं के पल्लवन में बाधक बनी रही। अंतत: यह मान लिया गया कि यह पौधा उसी बाग में खिल सकता है….नवाब साहब …के बाग …कोई कहता वह पौधे के साथ उस जगह से मिट्टी भी लाये थे..इसीलिए यह उसी बगीचे में खिल सकता है!….या कोई कहता भाई आदमी आदमी की बात होती है, उसके हाथों में…..
मौजूदा हालातों में अनिभिज्ञता व चलन में न होने के कारण वाटिकाओं से फ़ासला रहना जाहिर है, हमारें लोगों का, पर सबसे बड़ी दुश्वारी है, जमीन के हर टुकड़े पर खेती करने की होड़, या जमीन की कमी, जिसमें पेट पालना पहली जरूरत होती है! गाँवों का बदलता परिवेश, किन्तु मौके फ़िर भी है, हम थोड़ी सी ही जगह से सुवासित कर सकते है, गाँव की धरा को, और मौका दे सकते हैं, उन्हे जो अब हमारे आँगन व द्वारे पर नही दिखते...रंग बिरंगी तितलिया, गुनगुनाते भौरें, मकरन्द खाती चिड़ियां......वो सभी कुछ जो अब किताबी है वापस हो सकता है! इन्ही सब बातों के दरम्यान हम वापसी की तैयारी में उन सबकी जो राजाओं के घर-आँगन में खिलने का गरूर रखते थे! 
खैर अब चलिए मैनहन में जहाँ मैने अपने पूर्वजों के घर के पुनर्निर्माण के साथ-साथ दुआरे पर फ़ुलवारी की परिकल्पना पर काम कर रहा हूं..आखिर आजाद भारत का बाशिन्दा हूं और फ़िजाओं में खुसबूं और सुन्दरता तलाशने का मुझे पूरा हक है! तो मैने पहले चरण में…हरसिंगार, चम्पा, चमेली, रात के रानी, अलमान्डा, बेला, मालती,  के पौधे रोपे हैं, दूसरे चरण में मैं गन्धराज, मौलश्री, जूही, कचनार, बेल का रोपन करूंगा, साथ ही बरगद, सागौन जैसे विशाल वृक्ष भी मेरी कार में सुसज्जित है….जिन्हे कल रोपित किया जायेगा….फ़िलहाल मेरा अगला कदम गाँव के हर व्यक्ति कों तमाम खुशबुओं वाले पौधें भेट करने का निश्चय है!…लेकिन क्रमबृद्ध तरीके से…शायद रात की रानी मिशन…बेला…..चमेली….या फ़िर गन्धराज मिशन…एक वर्ष में प्रत्येक सगन्ध पुष्प वाले पौधों  में एक सुगन्धित पौधा वितरित करूंगा…जो हर घर में पल्ल्वित हो…..इसी इरादे के साथ.. पुष्पवाटिकाओं के चलन की शुरूवात करने की कोशिश…शायद रिषियों, और राज-कन्याओं और राज-पुरूषों के शैरगाह की जगहें आम हो सके आम आदमी के मध्य…जमींदारों, नवाबों और नौकरशाहों के बगीचों का मान तोड़ती ये पुष्पवाटिकायें एक औसत हिन्दुस्तानी को अपनी परेशानियों व तंगहालियों की गन्ध के मध्य विविध सुगन्धों का एहसास करा सके…और सुगन्धों व नवाबों के मध्य रिस्तों का मिथक टूट पाये….!

कृष्ण कुमा्र मिश्र
मैनहन-262727
भारतवर्ष

Tuesday, June 29, 2010

उदन्ती में गौरैया!

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से प्रकाशित उदन्ती पत्रिका में प्रकाशित लेख जो गौरैया सरंक्षण को समर्पित हैं,



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यह लेख को जो उदन्ती पत्रिका में प्रकाशित हुआ- दुधवा लाइव के गौरैया बचाओ जनाभियान को  नुकूश-ए-कतरन में पढ़िए



Wednesday, May 19, 2010

दुधवा टाइगर रिजर्व में एक अनजानी वनस्पति!

 दुधवा टाइगर रिजर्व में एक अनजानी वनस्पति! - Calatropis acia-  कृष्ण कुमार मिश्र*
कुछ सुन्दर व दुर्लभ वनस्पतियां हमारे आस-पास मौजूद होने के बावजूद न चिन्हित होने के कारण काल के गर्त में समाती चली जा रही हैं, और हम उनके महत्व व लाभ से वछिंत रह जाते हैं। प्रकृति के इन रहस्यों में ही तो जीवन का सार है, यह हम पर निर्भर करता है कि हम उसे कितना जान ले- इसी खोज की एक झलक मैं आप सब के समक्ष प्रस्तुत कर रहा हूं, जो मुझे आनन्दित कर गई!----------------
12 जून 2006 रिंगरोड झादीताल किशनपुर वन्य जीव विहार, इस प्राकृतिक जंगल में वन्य जीवो व वनस्पतियों के मध्य मै प्रकृति दर्शन करता हुआ रिंग रोड पर चला जा रहा था। घास के मैदान से होकर गुजरती इस रोड के दोनो तरफ कांस व अन्य जंगली घासों के घने झुरमुट थे, कि अचानक मेरी नजर इस हरी-भरी घास के झुरमुट से झाँकते रक्त-वर्ण का पुष्प गुच्छ दिखाई दिया, जैसे हरे रंग के घूघट में गुलाबी आभा लिए कोईं.......................................! कुछ ही पलों में मेरे कैमरे का लेन्स उस लाल रंग के पुष्प की तरफ था, बस मै इस अनजानी वनस्पति को हमेंशा के लिए अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहता था। वैसे यह पौधा मदार के पौधे की तरह ही था, बस फर्क था, तो उस लाल पुष्प की आकृति व रंग का क्योकि इससे पहले मदार का ऐसा पुष्प पहले मैने कही नही देखा था। अपनी जंगल यात्रा से वापस आने के बाद मैने इस प्रजाति की पहचान के मुमकिन प्रयास शुरू कर दिये लेकिन नतीजा कुछ भी नही निकला। इसकी वजह थी कि दुधवा टाइगर रिजर्व में अभी तक यह प्रजाति कही दर्ज ही नही थी। बावजूद इसके की यहा कई नामी वनस्पति शस्त्रियों ने यहाँ की वनस्पति का क्रमबद्ध अध्ययन किया था। तमाम पुस्तकों व स्थानीय वैज्ञानिकों से जब कुछ भी अवगत नही हो पाया। तो विश्व प्रकृति निधि व मौजूदा समय में आई आर एस के वनस्पति विज्ञानी डा कृष्ण कुमार ने बताया कि यह प्रजाति एक नई प्रजाति हो सकती है, जो कैलाट्रापिस प्रोसेरा की नजदीकी प्रजाति होगी। इसकी बिना रोम वाली पत्तियां व सुर्ख लाल रंग का पुष्प इसे इन प्रजातियों से भिन्न करता है ।
आखिर में इस पुष्प की तस्वीरे अमेरिका स्थित विश्व प्रसिद्ध स्मिथसोनियन संस्थान के वनस्पति विज्ञान के प्रमुख डा गैरी कृपनिक को भेजी, डा गैरी ने इसे दुनिया के तमाम वैज्ञानिको को यह फोटो भेजा, जो भारत या इस प्रजाति पर शोध कर रहे है। इनके विभाग के वरिष्ठ वनस्पति शस्त्री डैन निकोलस ने बताया, कि मानव आबादी में ज्यादातर  बैगनी व सफेद रंग के पुष्पों वाली प्रजाति कैलाट्रापिस गिगैंटिया होती है। संभवता यह कैलाट्रापिस प्रोसेरा हो। किन्तु वह अनिर्णय की स्थित में थे। सो उन्होने मुझे भारतीय वैज्ञानिक डा एम शिवादासन से सम्पर्क करने के लिये सलाह दी, तभी डा गैरी के एक मित्र डा डेविड गॉयडर की एक मेल आई उसमें लिखा था, कि यह एक अलग प्रजाति है, जो भारत व अन्य स्थलो पर पाये जाने वाली उन दो प्रजातियों से भिन्न है। इन्होने बताया कि मदार की दो विस्तारित प्रजातिया प्रचुरता में पाई जाती है, जिनमें कैलाट्रापिस प्रोसेरा में कटोरानुमा पुष्प पीला-लाल व किनारों पर बैंगनी रंग का होता है। और कैलाट्रापिस गिगैंटिया के पुष्प की पंखुड़िया पीछे की ओर मुड़ी हुई दो रंगों की होती है सफेद व बैंगनी रेग की। उपरोक्त दोनो तरह की प्रजातियों में पत्तियां डण्ठल रहित होती है। जबकि मेरे द्वारा भेजे गये फोटो में मदार की पत्तियां डण्ठल युक्त है, व पत्तियों के आधार संकुचित है। यह एक तीसरी प्रजाति है, जिसे  कैलाट्रापिस एसिया कहते है। कुल मिलाकर भारत में पहली बार व दुधवा टाइगर रिजर्व में इस प्रजाति का मदार पहली बार देखा गया है। जो अभी तक कही भी रिर्काडेड नही है। प्रकृति के रहस्यो में से एक और रहस्य सामने आया है। अब देखना है कि  इस अदभुत वनस्पति के औषधीय व अन्य गुणों पर कितनें रहस्य खुलते है। यह एक शोध का विषय है, क्योकि हर प्रजाति के अपने विशिष्ठ गुण होते है, जैसे सफेद पुष्पों वाला मदार! मदार जिसे आक, क्राउन फ्लावर, सूर्य पत्र, व अर्बर-ए-सोई आदि नामों से भी जाना जाता है, यह एक ऐसी औषधीय गुणों वाली वनस्पति है। जो भारत के अतिरिक्त श्री लंका, पाक्स्तान, नेपाल, सिंगापुर, मलय द्वीप और दक्षिण चायना में पाया जाता है। भौगोलिक आधार पर यह कहा जा सकता है, कि यह प्रजाति अयनवृत्त व उपअयनवृत्तों (क्रान्तिमण्डल) में प्रचुरता में पायी जाती है। जबकि ठण्डें प्रदेशों में यह दुर्लभ है। यह एस्क्लेपियाडेसिया परिवार का है, इसमें 280 जातियां और 2000 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती है। भारत में मदार कि मुख्यता दो प्रजातियां मिलती है। जिनमें सफेद-बैगनी व कभी-कभी सफेद रंग के पुष्प  वाला 8 फीट तक बढ़ने वाला कैलाट्रापिस गिगेंटिया व सफेद-गुलाबी रंग के खुसबूदार पुष्प वाला पौधा जो 3-6 फीट तक ऊचाई तक बढ़ने वाला कैलाट्रापिस प्रोसेरा भारतीय मदार की प्रजातियां हैं। इसकी नजदीकी उप-प्रजातियां सिल्क वीड (एस्क्लेपियाज सायिरियाका), बटरफ्लाई वीड (एस्क्लेपियाज टयूबरोजा) हैं। मदार 900 मीटर तक ऊचाई  वाले क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगते है यह विभिन्न प्रकार की मिट्टी व वातावरण में उगने की क्षमता रखता है। प्रायः यह ऐसे स्थानों पर उग आता है, जहां किसी और वनस्पति का उगना मुमकिन नही होता। मदार के पौधें रोड के किनारों, तालाबों के आस-पास व नदियों एंव समुन्द्री किनारों पर पड़ी रेत में उग आते है, ये कमजोर मिट्टी में वहां जहां बहुत अधिक चराई होने के बाद अन्य देशी प्रजातियों की वनस्पतियां उगने लगती है, वहां पर मदार अधिकता में पाया जाता है। इनके  फलों के परिपक्व होने के बाद चिटक कर रूईदार बीजो का प्रर्कीरण हवा व जल के माध्यम से  दूर दूर तक होता है अमेरिका, फ्रांसए हवाई, आस्ट्रेलिया, आदि देशों में मदार (आक) खेती के रूप में या फिर इनवैसिव यानी आक्रमणकारी विदेशी प्रजाति के तौर पर पाया जाता है।

भारत में इस प्रजाति का महत्व इसलिए विशेष है, कि यह भगवान शिव का प्रिय पुष्प माना जाता है। एक पौराणिक कहानी में कहा गया है, कि प्रेम के देवता कामदेव अपने तीर पर मदार के सुन्दर पुष्प को लगाकर ही लोगो के हृदय को बेंधते थे, ताकि वह व्यक्ति काम (वासना) के वशीभूत हो जाए ! वैसे भी भंयकर हवा के झोंकों सह लेने की क्षमता वाले व तितलियों व भौंरों को आकर्षित करने वाले इस वनस्पति के अतुलनीय पांच नोकदार पंखुड़ियों वाले पुष्पों की माला यदि आप के गले में हो तो भला कैसे कोई बिना मुग्ध हुए रह सकता है। किसी राजा-रानी के ताज की शक्ल वाला यह फूल सिर्फ सम्मोहन या आर्कषण का केंद्र नही है, बल्कि भारतीय समाज में इसे तांत्रिक साधना के लिए खास अहमियत मिली हुई है। और वह भी खसतौर से सफेद व लाल पुष्प वाले मदार को।
यदि हम इस विषाक्त गुणों वाले पौधें के औषधीय गुणों को देखे, तो इसके विषाक्त होने के अवगुण को नजरन्दाज कर देगें, क्योकि आयुर्वेद में मदार को आदिकाल से पारंपरिक औषिध के रूप में प्रयुक्त किया जाता रहा है। और आज मार्डन साइन्स ने भी इस औषधीय गुणो से भरपूर वनस्पति को मान्यता दी है। मदार का प्रयोग अकेले या अन्य औषिधियों के मिश्रण का उपयोग बुखार,गठिया,अस्थमा,कफ,एक्जीमा,फाइलेरिया,उल्टी,डायरिया आदि बीमारियों में किया जाता है, आयुर्वेद के अनुसार मदार का एक सूखा पौधा एक टानिक के रूप में किया जा सकता है। इसका प्रयोग कफ व पेट के कीड़े निकालने में भी होता है  इसकी जड़ के बने पाउडर से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और डाइरिया का इलाज होता है पत्तियों से पैरालिसिस, ज्वर व सूजन को ठीक करने के लिये किया जाता रहा है मदार का कवकरोधी व कीटरोधी गुण कृषि में विषेष महत्व रखता है यदि इसके तने व पत्ती के रस से शोधित बीजो की बुआई की जाय तो उनमे अकुरण जल्दी व अच्छा होता है साथ ही कोई बीमारी व कीड़े लगने की गुजांइश बिल्कुल नही रहती। इस पौधे से निकाला गया फाइबर चटाई,कारपेट व मछली पकड़ने वाले जाल के तौर पर किया जाता रहा है साथ ही अतीत में इससे बने धागां से धनुष की न टूटने वाली मजबूत कमान भी बनाई जाती थी।


कृष्ण कुमार मिश्र
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