Friday, June 20, 2008

एक मां और उसका मातृत्व


फोटो: अज़गर का अण्डा जिसमे से बच्चा निकल चुका है ।फोटो: लकड़ी के बक्शे में अज़गर के बच्चे ।
फोटो: लकड़ी के बक्शे में अज़गर के बच्चे ।
फ़ोटो: अज़गर का बच्चा |
फ़ोटो: २७/६/२००८ को अण्डों से अज़गर के बच्चे निकलना शुरू हुए। ७ जुलाई २००८ को इन नन्हे अज़गरो को बेलरायां के जंगलों में छोड़ दिया गया जहा़ं १७ जून २००८ को इनकी मां को छोड़ा गया था।


एक अज़गर मां की कहानी: कैपिटीविटी में पाइथन के अण्डों से निकले नन्हे अज़गर--------

अपडेट ३०/६/२००८ को "डी एफ़ ओ के के सिंह को अजगर के 2५ अण्डों को कृत्रिम इन्कुबेसन द्वारा २३ नन्हे अजगरों के जन्म में सफ़लता मिली------------"

१७ जून २००८ जालिम नगर पुल धौरहरा तह्सील जिला लखीमपुर खीरी उत्तर प्रदेश भारत, मै अपने एक पत्रकार साथी की सूचना पर इस स्थान पर पहुंचा कुछ अन्य साथियों के साथ जिसमे एक जन्तुविज्ञान प्रवक्ता भी थे जो मेरे शोध में मेरे सुपरवाज़र भी है खबर ये थी कि एक अजगर () यहां पर तकरीबन एक महीने से मौजूद है और यहां के कुछ साधू इस जीव को शेषाअवतार बताकर रकम पैदा कर रहे है भोली भाली और हालातों से परेशान जनता से। मै भी चल दिया उस सर्प को लोगो के चुंगल से छुड़ाने के लिये मेरे उस मित्र ने तब तक उस स्थान का पता ठीक से नही बताया जब तक हम उस स्थान बिल्कुल करीब नही पहुंच गये शायद उसे डर था की हम सब कही अन्य पत्रकारों को सूचित न कर दे और उसकी एक्सक्लूजिव खबर सामान्य न हो जाये खैर हम सब जब उस पुल पर पहुन्चे जो बहराइच रोड पर विशाल घाघ्ररा नदी पर बनाया गया था उसके नीचे नदी के किनारे बा़ग लगी हुई थी और एक अर्धनिर्मित मन्दिर कुछ झोपडियां और एक हवन कुन्ड इन सब के अलावा कुछ महिलायें, पुरुष व बच्चे इधर उधर चहलकदमी कर रहे थे पुल काफी उंचाई पर था सो हम लोग एक उंची ढलान से धीरे धीरे नीचे की तरफ़ बडे फिर नहर विभाग द्वारा बनाई गयी सीढियों से हम घाघरा नदी के तट पर पहुंचे जहां यह भयंकर नदी उफ़नाती हुई अपने जल को एक पूरब दिशा में बहाये लिये जा रही थी हम लोगों की निगांहे उस अजगर को तलाश रही थी जिस लिये हम यहां आये थे, मैने देखा कि पुल के नीचे के भाग के एक किनारे पर एक कोठरी नुमा स्थान पर एक राम नामी लाल झंडा गड़ा हुआ है और एक युवक तिलक लगाये बैठा है जो आने जाने वालो से मुखातिब हो रहा है उस स्थान तक पक्की सीड़ियां थी मै उस ओर बड़ा और वहां पहुंच कर भौचक्का रह गया ये क्या एक अज़गर कुंडली मारे चुपचाप बैठा हुआ था और लोग उसके करीब आ जा रहे थे प्रसाद बांटा जा रहा था और दान दक्षिणा का दौर जारी था।
अज़गर को मनुष्य की मौजूदगी में इतना शान्त देखकर मै हतप्रभ हो गया किन्तु उस पर और अधिक गौर करने पर मै भाउक हो उठा क्यों कि उसकी सांसे उखड़ती हुई मालूम दे रही थी और उसके शरीर की खाल सिकुड़ सी गयी थी ऐसा लग रहा था जैसे यह अपने प्राण अभी त्यागने वाला है, मैने उस युवा पुजारी से पूछा की भाई यह सांप कितने दिनों से यहां पर है उसका जवाब था की तकरीबन डेढ़ महीने से यानी ४५ दिन और वह बोला की ये बाबा का अवतार है कुछ खाते पीते नही है कई बार दूध आदि दिया पर नही खाया ( उसे क्या मालूम कि सापं दूध नही पीते) लेकिन यहां पर एक बात बड़ी मजेदार है मेरे मित्र को जिन क्षेत्र वासियों ने यह बात बताई थी उन्होने कुछ दिन पहले एक राय व्यक्ति की थी कि इस सांप को चूहा या मुर्गा खिलाओ, यहां पर किन्तु उन्हें बड़ा अजीब जवाब भी मिला था जिसकी कोई काट मेरे पास भी नही है अबतक, साधू और अन्य व्यक्तीं बोले अरे बेवकूफ़ हो क्या बाबा कही मुर्गा-चूहा खायेगे !! तुम अवतार धारी बाबा का अपमान कर रहे हो।
अब मै उस सांप की दशा देख देख कर विचलित सा हो रहा था क्यो कि वह धीमी व झटके मे सांसें ले रहा था और उसका उदर पिचका हुआ था मुझे क्रोध भी आ रहा था कि ४५-५० दिनों का भूखा यह जीव इन अंधविश्वासियों के चक्कर में फ़सा है ! हां उस पुजारी ने एक बाबा का फोटो भी वही पर रख रक्खा था जो इस स्थान पर रहे थे और अपने चेलों को दीक्षित किया था अब उनकी समाधि यहां पर बनाई गयी है बाबा तस्वीर में हाथ उठाये हुए थे और उन्के पीछे क द्र्श्य किसी पहाड़ी इलाके का था जिसे कम्प्युटर से बनाय गया था किन्तु वह पुजारी बोला की बाबा शिमला में थे तब की यह तस्वीर है और वही इस सर्प के रूप मे अवतरित हुये है।
उस स्थान से मै नीचे आ गया हम सब को फ़ारेस्ट अफ़सर का इंतजार था उन्हे हम सब ने पहले ही सूचित कर दिया था सो अब हमें यहां समय गुजारना था तो यहां मौजूद एक भड़कीले अवघड़ टाइप के बाबा से भेट हुई जो अपने सर्प के रूप में अवतार ले चुके बाबा का असली शिष्य बता रहा था, वह कुछ सशंकित भी था हम सब को और हमारे बड़े बड़े कैमरों को देखकर किन्तु वह साथ में डींगें भी हांके जा रहा था जैसे की अब यह अज़गर यानी बाबा आकार मे बढ़ रहे है जब आये थे तो बहुत पतले थी और अगर यही रहा तो बाबा १०० फ़ुट ऊंचा पुल तोड़ कर ऊपर निकल जायेगे, फिर कुछ डर कर बोला मै किसी को नही डरता यह सांप पास के इलाके से आया है जो किसी दूसरे बाबा का इलाका है लोग कहते है कि उसने इस सांप पर मंत्र मार दिया है इस लिये ये चल फिर नही पा रहे है लेकिन हो सकता है किसी ने इनकी रीढ़ तोड़ दी हो आदि आदि मै उसके भय मिश्रित बयानों को महसूस कर रहा था।
तभी मैने देखा कि मेरा पत्रकार मित्र एक दूसरे बाबा से बातचीत कर रहा है उस अज़गर के निकट वह बाबा पूरे जोश में तड़क तड़क कर अजीब नाट्कीय मुद्राये करता कही जमीन पर लेट जाता तो कही अचानक उठ खड़ा होता हो भी क्यो ना क्योकि उसके सामने कैमरा लगा हुआ था उसे टेलीविज़न पर दिखाया जाना है।
अब डी एफ़ ओ नार्थ खीरी आ चुके थे इस डिवीजन के सबसे आला अफ़सर किन्तु उनके साथ कोइ स्टाफ नही था सिवाय उनके दो छोटे बच्चो के एक बेटी व एक बेटा जो निडर थे "शायद एक फ़ारेस्ट अफ़सर के घर जन्म लेने कि वजह से वह वन्य जीवों के प्रति जागरूक थे", वह स्टाफ को फोनकर चुके थे पर काफी देर बाद वनकर्मी वहा पहुंचे अब शुरू होता है ओपरेशन रेस्क्यू पाईथन यानी अज़गर की तस्वीरे ली गयी और इसे यहां से उठाने के लिये कहां गया बाबाओ को अबतक पता चल चुका था और ऊंट पहाड़ के नीचे आ गया था बाबाओ ने अपनी पूजा की थाली और अन्य सामग्री उठा ली थी किन्तु वहा से जाने से पहले उस तड़क तड़क कर इंटरव्यु दे रहे बाबा ने अज़गर से ऐसे बात की जैसे वह इसकी बातें सुन सकता हो शायद बाबा का यह आखिरी नाटक हो या फिर आमदनी का जरिया चले जाने का लोभ, या फिर ५० दिन साथ बिताने का प्रेम !! जो बिछड़ने के भय से उत्पन्न दुख का कारण बन रहा हो मै उपरोक्त बातों मे क्य सच है यह ठीक ठीक नही कह सकता क्यो कि यह द्र्श्य बड़ा ही ह्र्दय स्पर्शी था !
अब माजरा बिल्कुल अलग था स्टाफ तो था किन्तु निहत्था यानी रस्सी, बोरियां, आदि आदि जो भी इस अज़गर को पकड़ने में काम आता वह कुछ भी नही अखिरकार डिप्टी रेन्जर ने साहब का गुस्सा भांप कर अपने गले में पड़ी तौलिया ही फाड़ डाली ताकि इससे रस्सी का बिकल्प हो सके फिर एक बोरी कही से आयी और अज़गर को पकड़ने का अभियान शुरू किन्तु इस अज़गर के नज़दीक जाने को कोइ तैयार नही हो रहा था वन कर्मी तो साहब के बुलाने पर भी नज़दीक आने से डर रहे थे अब तक सांप को भी यह महसूस हो चुका था कि मसला गम्भीर है सो वह भी अपना उठा कर इधर उधर जहं भी चहल कदमी हो रही थी अपना फ़न उठा कर देखने लगा था यह देखकर बड़ा अजीब लग रहा था कि वनकर्मी साहब के डर से आ तो रहे थे पर सांप दूर दूर से और कांपते हुए मै वही सांप के पास खड़ा ये सब देखे जा रहा था तब मैने मसविरा दिया कि पब्लिक के लोगो को बुला लिया जाय वो ज्यादा बेहतर मदद कर सकते है क्यो कि अभी तक वह बाबा के साथ इस सर्प के नजदीक से दर्शन करते आये है और अशिर्वाद भी लिया है इस लिये उन में मैने भय नही देखा है साहब ने पुब्लिक को आवाज़ लगायी कुछ लोग बिना किसी संकोच व भय के मदद के लिये आ खड़े हुये, अब बात आयी की इस सांप पर बोरा कौन डालेगा प्लान ये था कि बोरे को पलट कर उस अज़गर को ढक लिया जाये और यह सांप अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप बोरी में अपने आप घुसता चला जायेगा फिर बोरे के मुंह को रस्सी से बाम्ध दिया जायेगा ऐसा ही हुआ किंतु बड़ी मशक्कतों के बाद डी एफ़ ओ सहब तस्वीरें लेने में व्यस्त थे और कर्मचारी डर के मारे कांप रहे थे यहां मैने नाटकीय ढग से उन सब का हौसला बढ़ाते हुए आगे बढा और बोरी को पकड़ कर उन के काम में मदद करने की कोशिस करने लगा ताकि उनका डर समाप्त हो जाये पुब्लिक के लोग अपना काम बिना डरे हुए डी एफ़ ओ के निर्देर्शो का अनुपालन कर रहे थे जैसे ही बोरे में अज़गर ने अपन फ़न उठाया तो उसका धड़ उपर की तरफ़ उठा तो वहां करीब २५-३० अण्डें दिखाई दिये (यहां पर एक बात महत्वपूर्ण है हमारे साथ आये जन्तुविज्ञानी व वन्य जीव विशेषज्ञ ने कहा था कि अज़गर में पैरेन्टल केयर नही होता यानी ये सांप बच्चो की देखभाल नही करते लेकिन ३०-३५ अण्डों को अपने शरीर से ढके यह अज़गर मां ने उनके ज्ञान पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया, आगे हम सब एक जंगल से बाहर निकल कर भटक आये चीतल जिस के खाल पर सफ़ेद चित्तिया होती है उसे देखने गये जो वन विभाग की रेन्ज पर था जिसके सीघ घायल थे और वन विभाग ने उसका इलाज़ कराया था को देककर इन्होने कहा कि यह हाग डीयर का क्रास ब्रीड है यह बात भी हम किसी के गले से नही उतरी ) अब सब अवाक रह गये क्यो कि इसकी किसी को कोई आशा नही थी, मैने भी अपने जीवन में पहली बार किसी अज़गर के य यूं कह ले कि सर्प के अण्डें देखे थे सफ़ेद मटमैले रंग के ये अण्डें आपस में चिपके हुए थे ये अण्डे चिड़ियों के अण्डों की तरह कठोर व गोलाकार नही थे बल्कि पिचके व रबड की तरह थे ये मेरे जीवन का एक और नवीन अनुभव था। अण्डों को देखकर मैने डी एफ़ ओ से कहां कि अब आप इस अज़गर को यही छोड़ दे और इसे गार्ड करने के लिये किसी को तैनात कर दे साथ ही यहां के लोगो के हिदायत भी दे कि कोई इसे नुकसान न पहुचाने पाये वैसे भी ये लोग पूजा पाठ के अलावा इस अज़गर को कोइ नुकसान नही पहुंचा रहे है किन्तु उन्होने हमारी बात नही मानी और अण्डों को भी एक डलिया में रखवा लिया साथ ही अपने मतहतों को आदेश दिया की इस अज़गर को रामनगर बीट के जंगलों में( निघासन तहसील) जो इस स्थान से लगभग १५० कि०मी० है में छुड़वा दिया जाय और अण्डों को अपनें आवास लखीमपुर ले चलने का हुक्म दिया जो इस स्थान से लगभग ७० कि०मी० है ये दोनो बाते मेरी कतई समझ में नही आयी क्यो कि अज़गर वन्य जीव अधिनियम के अन्तर्गत सेड्यूल वन का जीव है जिसके तहत इसके सरक्षण का प्राविधान है साथ ही यह एक एन्डैजर्ड (विलुप्त होती प्राजाति) स्पेसीज है यह उसी श्रेणी में रखा गया है जिसमे बाघ तेन्दुआ हाथी आदि है अब इस महत्वपूर्ण प्रजाति के ये ३०-३५ अण्डे जो कल को एक खूबसूरत अज़गर मे विकसित होने वाले थे का अस्तित्व खतरे मे था कारण ये कि लखीमपुर जनपद में न तो कोई रेस्क्यू सेंटर है और न ही रेप्टाइल्स का प्रजनन केंद्र यहां तक कि कोइ वेट्नरी डाक्टर भी नही है जिसे वन्य जीवो के बारे में कोइ ज्ञान हो ऐसे में डी एफ़ ओ साहब कैसे इन अपरिपक्व अण्डों से अज़गर के बच्चों को विकसित कर लेगे यह एक सवाल है? साहब का प्लान ये है कि अब एक लकड़ी के बक्से में इन अण्डों को रखा जायेगा और गर्मी के लिये जो इन अण्डों को अपनी मां के शरीर से प्रप्त हो रही थी उसके विकल्प में दो बिजली के बल्ब उसी बक्से में लगाये जायेगे, मैने इस पर भी अपत्ति दर्ज़ कराई बिना किसी खास अनुभव के कि श्रीमन क्या बल्ब की रोशनी इन अण्डों को नुकशान नही पहुंचायेगी क्योकि जहांतक तापमान का सवाल है ठीक है शायद बल्ब को आप विकल्प बना सके पर अण्डों को जो अंधेरे मे इन्कुवेट (सेये जा रहे थे) हो रहे थे अज़गर द्वारा तो क्या बल्ब की रोशनी उन्हे नुकसान नही पहुंचा सकती उन्होने हमारी बात को समान्य तरीके से टाल दिया और मुझे भी बहुत अनुभव न होने के कारण मैने कोइ बहस करना उचित नही समझा।लेकिन मै कुछ नही कर सकता था।
अब यहां यहां पर मै एक अलग मुद्दे पर कुछ कहना चांहूगा वह मुद्दा है मातृत्व का, इसे ईश्वर का वरदान कहे या प्रकृति द्वारा हमारे जीवनद्रव (जीन) मे फ़ीड किया हुआ पूर्वनिश्चित सूचनाओं का डाटा इसे जीवनविज्ञान में हम इंस्टिक्ट भी कह सकते है प्रकृति हमे सब कुछ सिखा कर भेजती है और हम उसी केर अनुरूप कार्य करते है किन्तु मानव ने अपने आप को प्रकृति द्वारा बताई गयी बातों से अलग हट कर कार्य करने की क्षमता विकसित कर ली जिसका नतीजा बहुत बेहतर नही है…………………………………..
जब मै किसी भैस को अपने बच्चे के पीछ पीछे दौड़ते देखता हूं तो मेरे मन में अजीब सी अनुभूति होती है चूंकि मै गांव का रहने वाला हूं तो यह द्र्श्य मेरे सामने अक्सर आता है गांवों में गाय या भैस जब दुधारू होती है तब उसकी खरीद फ़रोख्त ज्यादा होती है जाहिर है दूध देने वाली गाय या भैस का नवजात शिशु होगा और खरीदने वाला जब भैस खरीद कर अपने घर ले जाता है तो उसका सामान्य तरीका होता है जानवर के बच्चे को टोकरी मे बिठा कर साइकिल या बैलगाड़ी में रखकर ले जाता है और भैस अपने बच्चे के मोह में अपने पूर्व मालिक जहां उसने न जाने कितने वर्ष बिताये हो को छोड़ कर अपने बच्चे के पीछे पीछे चल देती है जब साइकिल या अन्य वाहन जिसमे उसकी संतान होती है तेज गति से चलती है तो वह भैस भी उसी रफ़्तार से दौड़ने लगती दौड़ते उसके मुंह से झाग तक आने लगता और वह बेहाल होने लगती पर फ़िर भी वह थक कर भी वह नही थकती क्यो कि वह मां है और मां का अपने पुत्र के प्रति स्नेह संसार में सर्वश्रेस्ठ और अर्वणनीय है जिसे शब्दों से बखान करना मुश्किल है ऐसे तमाम उदाहरण है जिन्हे आप सब ने कभी न कभी महसूस किया होगा। अब आप कल्पना करिये कि जिस सर्प मां यानी उस मादा अज़गर को उसके अपरिपक्व बच्चों से अलग कर दिया गया हो जिन्हों ने अभी इस दुनिया में अपनी आखें भी ना खोली हो जिनके पैदा होने के इंतजार में वह मां ५० दिनों से बिना कुछ खाये पिये हिले डुले एक ही स्थान पर बैठी हो भूख से बेहाल जिसकी सांसें मानो थमने को हो पर वह अपने अण्डों से निकलने वाली संतानों के इंतजार में चुपचाप सबकुछ झेल रही हो यहां तक कि तमाम ढोंगी बाबाओं के नाटकीय क्रियाकलाप और वहां आती भीड़ को पर वह अण्डों के ऊपर से कभी नही उठती, कही कोई इन्हें देख न ले या कोई इन अण्डों को हानि न पहुचा दे शायद इन्ही सब वजहो से ये जंगली जीव सब कुछ सहता रहा जबकि यह ताकतवर सांप जो हिरन जैसे जीव को जिंदा निगलजाये जिसे आदम की आहट से ही सतर्क हो जाने और हमलाकर देने की तैयारी कर लेने की आदत हो वह मां थी इस लिये सब कुछ सहती रही उसने अपनी समझ में तो पुल के नीचे एक सुरक्षित स्थान चुना था अपनी सतंति के लिये जहां न तो धूप आ सकती थी और न ही बरसात पर मनुष्य ने उसे वहां भी डूढ लिया और वह ५० दिनों तक सहती रही यह अप्रत्यासित कृत्य!
किन्तु अन्त तो बहुत ही बुरा हुआ कम से कम ढोगी बाबाओ ने उसे उसके अण्डों से तो अलग नही किया शायद कुछ दिनों बाद अण्डों से बच्चे निकल आते और वह वहां से चली जाती ५० -६० दिनों के कष्ट के पश्चात उसे सुख की अनुभूति होती किन्तु ऐसा नही हुआ उसे उसके पैदा होने वाले बच्चों से अलग कर दिया गया या दूसरे चिरपरिचित वाक्यों में कहें तो उसकी संतान को गर्भ में ही मार दिया गया उस जानवर की मनोदशा क्या होगी? जिसे उसके बच्चो से १५० कि०मी० दूर अनजानें जंगल मे छोड़दिया गया………………………………….
क्या ऐसा नही हो सकता था कि उसे उसी स्थान पर उसके अण्डों के साथ छोड़ दिया जाता और समय पर निगरानी रखी जाती जब तक उसके अण्डों से बच्चे न निकल आते?
क्या उसे यदि उस स्थान से हटा देना जरूरी हो गया था तो किसी दूसरे स्थान पर उसे अण्डों के साथ नही छोड़ा जा सकता था ताकि वह अपने बच्चो को से सके?
क्या यह वन्य जीव अधिनियम के कानून का उलघ्घंन नही है कि किसी जन्तु को जब वह ब्रीडिगं कर रहा हो तो उसके घोसलें को उजाड़ दिया गया हो उसके अण्डे उठा ले जाये गये हो क्या इसे ही वन्य जीव सरंक्षण कहते है?
यदि वह मादा अज़गर मर चुकी होती तो मै मान सकता हूं कि अण्डों को वैकल्पिक तरीके से सेया (इन्कुबेट) जा सकता था।
मुझे इस बात का अफ़सोस सदैव रहेगा कि मै भी उन सरकारी लोगो के इस कृत्य में शामिल था, मुझे अपने इन हालातो पर एक बात याद आती है
आये तो हरि भजन को ओटन लगे कपास……………………!!!

नोट: यदि इन अण्डों से सफलता पूर्वक बच्चे निकल सके तो उनके आगे जीवित रहने की संभावनायें न के बराबर होगी पर फिर यदि यह ब्रीडिंग सफ़ल रही तो मेरे लिये बड़ी खुसी की बात होगी। और मै आप सब को सूचित भी करूगां



कृष्ण कुमार मिश्र
७७ शिव कालोनी लखीमपुर खेरी-२६२७०१
उत्तर प्रदेश भारत
सेलुलर : ९४५१९२५९९७

क्या धरती पर एलिअन्स मौजूद है

कृष्ण कुमार मिश्र

क्या सच में अन्तरिक्ष प्राणी हमारी धरती पर आते है ? कोई है जो इनका सच जान सकता है क्या आप उससे जुडना चाहेगे?

क्या आप एलिअन्स से बात करना चाह्ते है उन्हे सुनना चाहते तो आओ चले अनंत अंतरिक्ष मे गूंजती इन आवाजों के पास क्या पता कभी आप को कुछ सुनाई पड जाये! सदियो से मनुष्य आसमान की तरफ़ निहारता रहा है और अपने जैसे प्राणियों की व धरती जैसे लोकों की परिकल्पना कभी तो इन्द्र व इन्द्रलोक के रूप में तो कभी स्वर्ग व नर्क के रूप में यहां तक कि मानव ने ग्रहो में भी अपने जैसे स्वरूप की परिकल्पना कर डाली तभी तो हमारे यहां बच्चों को चंदा मामा के गीत सुनाये गये हम ने सुर्य, मंगल, शनि, बृहस्पति आदि ग्रहों को देवता मानकर मानव आकृति में ढालने की सदैव कोशिस की पर हमारी इन परिकल्पनाओं में क्या सच्चाई है इस बात का पुख्ता सबूत कोइ भी अन्तरिक्ष प्रयोगशाला नही दे पायी सिवाय कुछ संदेहात्मक संकेतो के, लेकिन योरोप में जमीन पर बनने वाले विशाल चिन्ह, उडन तस्तरिओं का देखा जाना और अब तो दूसरे ग्रह के प्रानी यानी अलिअन्स की तस्वीर खीचे जाने का भी दाव किया जा रहा है एक्स फ़ाइल जैसे धारावाहिकों ने भी जनमानस में एलिअन्स की परिकल्पना को और मजबूत किया बताते है की एक्स फ़ाइल वास्तव में अमेरिकी खुपिया एजेन्सी सी आई ए की गुप्त रपट है जो लीक हो गयी जिसमे अलिअन्स और उडन तस्तरीयों के बारे में जानकारी थी जिसे आम जनता से छुपाया जा रहा था। ऐसा नही की एलिअन्स और उनकी उडन तस्तरी योरोप य अमेरिका में ही आती है अवश्य ये भारत में भी आते होगे आप भी फ़ुरसत के छडों मे आसमान मे नज़र दौडाये जाने कब आप को कुछ दिखाई दे जाये !!!!

क्या आप इस ब्रह्मांड में अकेले है? यह एक अहम सवाल है जो मानव सभ्यताओं में सदियों से चर्चित रहा है और शायद इसी सवाल ने हमें आसमान की तरफ़ देखने व वहाँ कुछ खोजने के लिये प्रेरित किया और यही पर प्रदुर्भाव हुआ खगोल विज्ञान का फिर क्या था वैज्ञानिक तकनीक के विकास के साथ साथ सौर्य मडंल, तारा मडंलों आकाश गगांओं और असंख्य तारों की खोज होती चली गयी किन्तु वह सवाल अभी भी हमारे सामने सिर उथाये खडा है कि क्या हम ब्रह्मांड में अकेले है? शायद नही और इस बात को और मजबूती दी एक युवा वैज्ञानिक फ़्रैन्क ड्रेक ने एक समीकरण देकर जिनका मानना है इस ब्रह्मांड में तमाम सभ्यतायें मौजूद है और इसी विचारधारा को आधार मानकर उन्होने एक प्रोजेक्ट की शुरुआत सन 1960 में की किसका नाम ओज़मा रखा जो फ़्रैन्क एल बाम की पुस्तक ओज़ पर आधारित था उन्होने दुनिया के विशालतम रेडिओ टेलेसिकोप स्थापित किये जिनकी चौडाई 85 फ़ुट है और इन्हे अन्तरिक्ष से अजीब अजीब आवाजे सुनाई देने लगी फ़िर इनका यह मिशन आगे बढ़ता गया इनकी रिसर्च की मुख्य परिकल्पनायें थी कि क्या इन खरबों ग्रहों में किसी पर जीवन नही होगा, क्या ब्रह्मांड में सिर्फ़ हमारी मानव सभ्यता के अलावा कोइ सभ्यातायें नही है, क्या इस विशाल ब्रह्मांड में कोइ ऐसा ग्रह नही जो जीवन को स्थापित करने की क्षमता नही रखता? इन्ही सब सवालों की खोज में बर्कले कैलिफ़ोर्निया में “सेटी” इन्स्टीट्युट की शुरुवात हुई सेटी यानि ’सर्च फ़ार एक्स्ट्रटेरीस्ट्रिअल इन्टेलीजेन्स’ और ४५ वर्षो में ब्रह्मांड की तमाम आकाश गंगाओ से आती हुई आवाजों को रिकार्ड किया कभी कभी सेना के लडाकू जहाजों से आने वाली आवाजे भी रिकार्ड होती थी आकाश गंगाओं में संभावित सभ्यताओं की खोज के लिये माइक्रोसाफ़्ट ने भी करोडों रुपये अनुदान के तौर पर दिये जिससे सेटी ने छोटा व दस गुना अधिक ताकतवर रेडिओ टेलिस्कोप “अलेन टेलिस्कोप एरे (ए०टी०ए०) लगाया जिसमे दर्जनों सौर्य मडंलों का एक साथ अध्ययन करने की क्षमता है।

बाद में सेटी की सबसे बडी सफ़लता बनी पीयर टू पीयर तकनीक जिसमे तमाम कम्प्युटर एक साथ जोडे जा सकते है सेटी ने तकरीबन 2.5 मिलिअन कम्प्युटरों को एक साथ अपने प्रोजेक्ट से जोड दिया अब क्या था लाखों लोग एक साथ अन्तरिक्ष से आती आवाजो को सुन सकते थे इस कार्य के लिये उन्हे बस सेटी की वेबसाइट से एक छोटा सा स्क्रीन सेवर अपने कम्प्युटर में इन्स्टाल करना होता है और आप जुड जाते है इस महान खोज में सेटी के साथ। हाँ एक और बात जब ये कम्प्युटर एक साथ चल रहे होते हो तो लाखो निगाहे उन सुदूर ब्रह्मांड से आती आवाजों का अध्ययन कर रही होती है साथ ही उन सभी क्म्प्युटरों की प्रोसेसिग छमता का आकंलन करने पर यह छमता दुनिया के सुपर कम्प्युटर के बराबर हो सकती है यदि आप एलिअन्स की खोज का हिस्सा बनना चाहते है तो आप इस प्रोजेक्ट से जुडने के लिये सेटी की वेबसाइट पर लाग इन कर सकते है पता है http://setiathome.ssl.berkeley.edu/ इस साइट पर जाकर आप स्क्रीन सेवर डाउनलोड कर कम्प्युटर में इन्स्टाल कर दूसरे ग्रहों से आती आवाजों को सुन सकते है आप के कम्प्युटर स्क्रीन पर रंग बिरंगी ध्वनि तरंगों की ग्रफिकल तस्वीरें आती रहेगी पता नही कब आप को किसी सुदूर ग्रह के प्राणी की आवाज सुनाई दे जाय! कुछ वर्ष पहले सेटी संस्थान का यह प्रोजेक्ट धन के अभाव में औपचारिक तौर पर तो बंद कर दिया गया पर अनौपचारिक तौर पर उनकी खोज जारी है जिसमे शामिल होकर आप उनका हौसला बढा सकते है साथ ही सेटी में आप अन्य वैज्ञानिक शोधों में भी हिस्सा ले सकते है सेटी को अपने ५० वर्षों के अधययन में हमेशा चुनौतियां मिलती रही की आखिर अब तक उन्हे दुसरे ग्रह के प्राणी का स्पष्ट सन्देश क्यो नही प्राप्त हुआ किन्तु सेटी प्रमुख फ़्रैन्क ड्रेक ने आशा नही छोडी, आप को उडन तस्तरी व एलिअन्स के बारे में इंटरनेट पर तमाम वेबसाइटें मिल जायेगी जो एलिअन्स की कहानिया कहती है पर सेटी ने वैज्ञानिक तौर पर यह प्रयोग शुरू किया

कई वैज्ञानिकों ने यह भी सवाल खडे किये कि अगर हमारी धरती पर करोडों प्रजातियां है जो करोडों वर्षों में विकशित हुई क्या किसी में दूसरे ग्रह के प्राणी को शरण देने की क्षमता है और यदि होती तो अभी तक करोडो वर्षों में और करोडों प्रजातियो के जीवों मे कोई एलिअन्स दूसरे ग्रह का जीव क्यो नही पनपा, पर क्या मालूम एलिअन्स हमारे बीच मौजूद हो किसी जीव के रूप में और वह हमारा अध्ययन कर रहे हो और हम उन्हे न जान प रहे हो…….!!!!!!!

The Drake Equation

N = R (sub *) x f (sub p) x n (sub e) x f (sub l) x f (sub i) x f (sub c) x L

N= observable civilization in the Milky Way

R(sub *)= the number of stars like earth’s sun born in the milky way each year.

f(sub p)= the fraction of those stars with planets.

n(sub e)= the number of planets in each planetary system that are earthlike.

f(sub l)= the fraction of earthlike planets that actually develop life.

f(sub i)= the fraction of planets with life that develops intelligence.

f(sub c)= the fraction of planets with intelligent life develop technology.

L= the life time, or number of years, an observable civilization exists.

कृष्ण कुमार मिश्र

७७ शिव कालोनी कैनाल रोड लखीमपुर खेरी-२६२७०१

सेलुलर : ९४५१९२५९९७

दिनांक: १७ जून २००८

Wednesday, May 21, 2008

खीरी में एक और बाघ मृत अवस्था में मिला








http://hosted.ap.org/dynamic/stories/I/INDIA_LEOPARD_KILLED?SITE=DCTMS&SECTION=HOME&TEMPLATE=DEFAULT&CTIME=2008-05-09-06-03-14
ये ह्रदय विदारक तस्वीरें आप को दिखाना नही चाहता था किंतु हालत कितने बदतर हो रहे है ये जानने के लिए मैं यह जरूरी समझता हूँ ............

१७ तारीख मई २००८ को बाकेगंज जनपद खीरी की शारदा कैनाल में एक नर बाघ मृत अवस्था में मिला जिसकी मौत का कारण वन अधिकारियों द्वारा ये बताया गया की संभवत: यह बाघ की मौत पानी में डूबकर हुयी है पर लोगों में एक सुगबुगाहट थी हो न हो इस बाघ को भी पिछली कई घटनाओं की तरह जहर दिया गया हो ? अब आई बी आर आई बरेली से पोस्ट मार्टम की रिपोर्ट ने खुलासा किया है की यह बाघ संक्रमण से मरा लेकिन वस्तुस्थित यह नही कह रही है कारण की चार-पाँच साल की उम्र का यह नर बाघ पूर्ण स्वस्थ था और इसके शरीर के बाहरी अंग बिल्कुल ठीक थे अंदरूनी संक्रमण होने पर बाघ या कोई भी अन्य जीव तुरंत नही मरा करते और संक्रमण इनके शरीर पर परिलक्षित होने लगता है मैं आप को खीरी में बाघों व अन्य जंगली जानवरों के हालातों का तस्किरा इत्मिनान से बयां करूगा लेकिन कुछ तस्वीरों के माध्यम से यह अहसास और बुलंद करवाना चाहता हूँ की अब तराई के बाघों व तेंदुओं का अस्तित्व खतरे में है और यहाँ के जंगलों व जंगली जानवरों का अस्तित्व मिट कर इतिहास बन जाए इससे पहले हमें सचेत हो जाना चाहिए ........और इसके लिए हमें निष्ठा सकल्प और इमानदारी जैसे शब्दों को चरित्र में लाना पड़ेगा ................................शेष .........

Tuesday, May 20, 2008

आखिरकार तेंदुआ मार ही डाला गया

इस तेंदुए को ग्रामीणों ने प्रशासन की मौजूदगी में कातें बल्लम व लाठियों से मार डाला फिर उसे आग में बड़ेइत्मिनान से ऐसे भूना जैसे ........................................!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!





८ मई सन २००८ की शाम को जैसी कि आशंका थी वही हुआ खीरी जनपद के नष्ट हो रहे जंगलों व आहार के चलते बाहर निकले जंगली जानवरों के साथ वही हुआ जिस का डर था इस तेंदुए पर दो दिनों तक सैकड़ों राउंड गोलियाँ चलायी गयी किंतु इस जानवर की किस्मत इसका साथ एक दिन तो दे गयी लेकिन हजारों मानवों के बर्बरता पूर्ण आक्रोश ने इसे दूसरे दिन की शाम ढलने से पहले मार कर जला डाला और वन विभाग व स्थानीय इन्त्जामिया देखता रह गया भारत में तेंदुओ और बाघों को घेर कर मार डालना कोई नयी बात नही है पर इस तरह की निर्दयता से मारने का रिवाज़ जल्द ही विकसित हुआ है आदम सभ्यता में कभी शिकारी जब इन जानवरों का शिकार किया करते थे तो उनके कुछ वसूल होते थे जैसे की मादा बाघिन व इनके बच्चों का शिकार नही किया जाता था ऐसी तमाम बातें होती थी जिनमे हिंसक निर्दयता के बावजूद दया का कुछ पुट अवश्य मिला रहता था किंतु अब जब हम मानव अपने को विकसित व अति समर्थवान बताते है बावजूद इसके की अभी भी हम प्रकृति पर पूरी तरह से निर्भर है और इससे जुदा रह कर इस ग्रह पर जिंदा रहने की कल्पना भी नही कर सकते और ख़ास बात यह की हम सबसे बाद में आए और आज हम वहाँ रह रहे है जहाँ कभी इन जानवरों के घर यानी जंगल हुआ करते थे मजे की बात ये की पहले पहा हम इनके ही घरों में रहे किंतु इन्होने हमें कभी नुकसान नही पहुचाया और अब जब हम इनकी जमीनों पर घर व खेत बनाते चले जा रहे है और गलती से कभी ये हमारे बीच आ गए तो हमे इतना भी सब्र नही की हम संयम से काम ले आखिरकार ये जानवर है और हम आप तो विवेक शील .................शायद..................
आगे भी कुछ भावनाए है जो आप सब को बतानी है ...........................
हाँ उस रोज़ की उस भयावह घटना का जिक्र शुरू ए कर रहा हूं ग्रामीणों ने तेंदुए को सात मई से आठ मई तक एक गन्ने के खेत में घेर रखा था और तकरीबन २४ घंटें तक उस जानवर पर गोलियां चलायी जाती रही ऐसा नही की जनता ने प्रशासन की नामौजूदिगी में ला एंड ऑर्डर अपने हाथ में लिया था बल्कि वहां पुलिस वन विभाग व जिला प्रशासन के अफसरान भी मौजूद थे किंतु वे सब मूक दर्सक की तरह इस विलुप्त होती प्रतिबंधित प्रजाति को मौत के मुहं में जाते हुए देख रहे थे सवाल ये नही है कि प्रशासन कुछ नही कर पा रहा था या नही किया सवाल ये है कि अब कि बार यदि कोई बाघ तेंदुआ इस इलाके में भटक आया तो उसकी खैर नही क्यो कि ग्रामीण अब जान गए है कि प्रशासन कुछ नही कर सकता न तो उन्हें तेंदुए के भय से मुक्त कर सकता है और न ही तेंदुए को मारने से उन्हें रोक सकता है अब वह निरंकुश है और गर्वान्वित भी ............................................
एक बात और है तेंदुए ने जिस को भी मारा उस के परिवार का दुःख और दहशत विचारणीय है और उनके लिए इस जानवर कि कोई कीमत नही रह जाती सिर्फ़ आक्रोश ही आक्रोश ..................और ये आमादा हो जाते बदला लेने के लिए एक जानवर से जिसका कोई प्रयोजन नही होता किसी मनुष्य को मारने में सिवाय भूख और सुरक्षा के अतिरिक्त ?
पर हालत ऐसे ही रहेंगे क्योकि ये बाघ और तेंदुए सिर्फ़ गरीबों को ही मारते है क्यो की इनके घरों में दरवाजें नही होते चारदिवारिया नही होती इन्हे पैदल चलना पड़ता है और रात बिरात खेतों मी काम भी तो मरना तो इन्हे ही है कोई अमीर व सरकार में पैठ रखने वाला व्यक्ति तो कम से कम नही ...........जाहिर है गरीब की मौत की कोई कीमत नही होती यहाँ तो क्यो सरकारी अमला इस भटके हुए बाघ व तेंदुए को पकड़ने की जहमत उठाये जब चार पाँच मौते हो जायेगी तो ख़ुद बी ख़ुद वन्य जीव अधिनियम के तहत ये जीव नरभक्षी करार कर दिया जायेगा और फिर एक बाघ व तेंदुए का शिकार नरभक्षी होने के सर्टी फिकाट के आड़ में जो आसान है और जनता भी खुश की आख़िर कर उसे भयमुक्त किया जा रहा है हाँ यदि एक भी अमीर व प्रतिष्ठित व्यक्ति को बाघ व तेंदुआ खा जाए तो यकीन मानिए उसे तुरंत पकड़ा जायेगा और उसमें असफलता हाथ लगी तो मार दिया जायेगा ताकि किसी दूसरे अमीर व्यक्ति की जान न जाए ...............................और ऐसा कई बार होता है .........क्या गरीब होने पर व्यक्ति के सवेंधानिक मौलिक अधिकार कुछ कम हो जाते है ?




कृष्ण कुमार मिश्र
+919451925997

Friday, April 25, 2008

एक और तेन्दुये की मौत का इन्तज़ाम कर रहा है वन विभाग




आज यानि २९ अप्रिल २००८ की सुबह से ही वन विभाग धौरहरा तह्सील के चौरा गांव में एक पुरानी बा़ग में तेन्दुये को घेर रखा है और उसे मारने की सभी कवायदें जा्री है सूत्र बताते है कि इनके पास बेहोसी की बन्दूक है पर दवा नही है तेन्दुये का क्या होना है यह भी स्पष्ट नही है पर आखिर में उसे मार देने का इरादा बना चुका वन विभाग अपनी संगीनें उस जन्वर पर ताने हुए है जो इस इलाके में तकरीबन ५ महीनें से है और अभी तक इसने ऐसी कोइ हरकत नही की जिससे यह वैग्यानिक आधार पर पुष्टि होती हो कि यह नरभक्षी है क्यो की ५ महीनों में यहां ग्रामीणों द्वारा दो तेन्दुयें और उनके बच्चे भी देखे गये साथ ही में एक बाघ की मौजूदगी की भी पुष्टि हुई है ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि दोषी कौन है? फिर अगर सभी घटी हुई चार घटनाओं पर नज़र दौड़ाये तो यह भी स्पष्ट होता है की इन ५ महीनों में जो चार मनव मौते हुई वह मात्र एक्सीडेंट थे क्यो की ये चारों मानव या तो बैठे हुए थे फिर जानवर की सी मुद्रा में थे फिर अगर ये जीव नर-भक्षी होते तो अभी तक ना जाने कितने लोगो का शिकार कर चुके होते और बाकायदा मनुष्य के मांस का भक्षण भी करते पर ऐसा नही हुआ बल्कि ये भूखे जीवों ने सियारों और कुत्तों को खाकर इन ५ महीनों तक अपनी भूख मिटाई क्यो कि यहां के जंगलों में इन मांसाहारी जानवरों का शिकार मनुष्य चट कर चुका है !! पूरे भारत में अगर बाघ व तेन्दुये द्वारा हुई मानव भक्षण की घटनाओं पर दृष्टि डालें तो नतीज़ सामने यह आता है की सभी मौते गरीब तबके के लोगों की होती है क्यो कि उनके घरों में दरवाज़े नही होते है और न ही चारदिवारी और न ही वह मोटर कारों से सफ़र करते है .......साथ ही उन्हे रात मे भी अमीरों के खेतों में काम करना पड़ता है बिना किसी सुरक्षा इन्तज़ामों के नतीजतन जानें उनकी ही जाती है और एक पुरानी कहावत भी हमारे भारत में कि " गरीब की जान सस्ती होती है" और यही वज़ह है कि इनकी मौतों पर सरकारी अमला भी जल्द ध्यान नही देता जब मीडिया शोर मचाता है और लोगों का दबाव बढता है तब तक देर हो चुकी होती है और ये सरकारी लोग बिना कुछ और प्रयास किये एक ही आसान विकल्प पर अमादा हो जाते है कि अब तो यह जानवर नर भक्षी हो गया है इसे तो मारना ही पड़ेगा......................आखिर ऐसा क्यो अगर हम पहले ही कुछ सोच ले तो शायद मनुष्य और जानवर दोनों ही बच सके।
ने आज यह विशाल वनों का जीव एक छोटे से बाग में वन-विभाग की संगीनों के ्साये में है किस वक्त उसकी एक आहट पर ढेर सारा बारूद उस जानवर के जिस्म में पैबस्त हो जायेगा................. और एक खूबसूरत और निरीह जीव इस धरती से विदा कभी जहां सिर्फ़ और सिर्फ़ इनका ही राज था हम तो बहुत बाद में आये तब तो इन जानवरों हमारा कोई विरोध नही किया था और आज हम चाहते है कि सिर्फ़ हम ही इस धरती के मालिक है और हमारे सिवा यहां किसी का कोइ हक़ नही !!

अप्रिल २४ २००८ को लखीमपुर खीरी की धौरहरा तहसील में दो दो मानव मौतें हुई जिनका कारण एक तेन्दुआ है जो इस इलाकें में तकरीबन पिछले पांच महीनों से भटक रहा है बीच बी़च में एक बाघ की मौजूदिगी की पुष्टि होती रही है
मानव आबादी में ये जानवर अक्सर आ जाते है वजह साफ़ है कि जंगलों में अब इन जानवरों के खानें के लिये कुछ नही बचा और जंगलों की अवैध कटाई से इनके आवास भी नष्ट हो रहे है नतीज़ा ये है कि भोजन की तलाश में ये निरीह जीव मानव आबादी में आ जाते है और वहां इनका अनजानें में किसी न किसी मानव से टकराव होता है और यही से शुरू हो जाता है मनुष्य और जनवर के बीच संघर्ष और अन्ततोगत्वा ये जीव मौत के घाट उतार दिये जाते है नर भक्षी का तमगा पहनाकर.........!!!!
खीरी जनपद में सन २००५ की गणना के मुताबिक यहां सिर्फ़ सात तेन्दुये है किन्तु २००५ में एक तेन्दुआ वन विभाग ने नर-भक्षी घोषित कर मार दिया। अब हम ये कह सकते है कि हमारे खीरी के वनों में मात्र आधा दर्जन तेन्दुयें ही बचे है क्यो कि सड़क दुर्घटनाओं या फिर बड़े परभक्षियों द्वारा मार दिये गये। मानव की बढ़्ती आबादी वनों में आदम की आमद अवैध शिकार खासतौर पर इन बाघों व तेन्दुओं के शिकार यानी हिरन आदि ..........की वजह से अब ये जानवर आबादी में आने पर मजबूर हो जाते है पर यहां भी कुछ नही छोड़ा इस मानव प्रजाति ने क्योकि भारत एक कृषि प्रधान देश है और विकास के इतने दावों के बाद भी यहां की ६०-७० फ़ीसदी आबादी प्राकृतिक संसाधनों पर ही निर्भर है चाहे भोजन हो या फिर उर्जा के लिये लगातार प्रकृति का दोहन जारी है खेती का बदलता ढ़ाचा, अब इन जीवों के लिये यहां रहना दूभर हो गया है पहले इन जंगली जीवों को मानव आबादी में भी खरगोश जैसे जीव मिल जाते थे पर मनुष्य ने इनका भी शिकार कर कर इन्हे समाप्त कर चुका है जहां देखों वहां मानव और घटते प्रकृतिक संसाधन....................॥ कभी जंगली जीव और मनुष्य एक साथ रह लेते थे बिना किसी तकराव के!
खैर उत्तर प्रदेश का वन विभाग पिछली घटनाओं की तरह इस बार भी इस भूखे और भटके तेन्दुये द्वारा मारे जा रहे मनुष्यों का मुआवजा देने के अलावा कुछ नही किया है और इनज़ार करता रहा की कब राजनैतिक और पब्लिक का दवाव बढ़े और इसे नर-भक्षी करार कर इसे मार दिया जाय ताकि न रहे बांस और ना बजे बान्सुरी।
हालांकि इस बार भी वो सब नाटक हुए जो हमेशा होते है बेहोशी देने वाला डाक्टर बुलाया गया, पिंजरे रखे गये आदि आदि फिर संसाधनों की कमी का रोना रोकर बैठ जाना...................!!! अब इस तरह की चार महीने से हो रही घटनाओं के बाद आखिरी रास्ता तेन्दुये को नर-भक्षी बता कर मार दिया जाये।
अब आप बताइये कि इन भूखे और भटके हुए जीवों को नर-भक्षी कौन बना रहा है?
आप सब को ये बताने का मेरा एक उदेश्य है कि इस जीव को बेहोश कर जंगल में दोबारा भेज दिया जाये ताकि विलुप्त हो रही यह प्रजाति शायद बचायी जा सके!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

कृष्ण कुमार मिश्र
९४५१९२५९९७

Wednesday, April 23, 2008

प्रकृति की मार से छिन्न होती मानवता

किसी ने कहा है कि थर्ड वर्ल्ड वार पानी के लिये होगा तो यह बात बुन्देलखंड़ के हालातों में साफ़ परिलक्षित होती है

बुन्देलखन्ड जहां आदमजात अनियोजित विकास कि मार झेलने के लिये विबश है और सरकार राहत के नाम पर कुछ कर पाने में करीब करीब बेबश.................नतीजा मवेशी सडकों पर पानी के बिना दम तोड़ रहे है और आदमी घर बैठ कर ये सोच रहा है कि खाना और पानी लाया जाये तो कहां से............यहां लोगों ने अपने मवेसियों को बेदर कर दिय है ताकि ये जीव कही भूख और प्यास के मारे इन्के दरवाजों पर दम न तोड़ दे लेकिन यसे हालात में मौत तो निश्चित है ये मवेशी अब सड़्को पर तड़प-तड़प कर दम तोड़ रहे है जमीन की छाती फट चुकी है अब इस वसुधा मां के पास कुछ नही बचा क्योकि हमनें इस मां की छाती नोच नोच कर दूध की आखिरी बून्द तक निकाल ली!!!!!!!!!!
चारों तरफ़ दरारे और सूख चुकी कटीली झाड़िया ही शेष है और दर्दनाक तथ्य ये है कि भूख से तड़पते जानवर इन कांटों को खा कर भूख मिटाने की नाकाम कोशिश कर रहे मैं बड़े यकीन से कह सकता हूं कि यदि आप में संवेदना का एक भी अंश मात्र है तो यह सब देख कर आप की छाती जरूर फ़ट जायेगी।
मेरे एक मित्र है अभिषेक दीक्षित जो रिलायशं कम्पनी मे अधिकारी है और बुन्देलखडं मे ही तैनात है और वे रोज मुझसे टेलफोन पर बात कर यही बताते है कि आज वह कौन से गांव में है और वहा मानवता पानी के बिना कैसे तार तार हो रही है आज उन्होंने हमीरपुर के पौथियां गांव के प्रेमशंकर से बात करवायी जो हार्टीकल्चर डेपार्ट्मेन्ट में कार्यरत है उनकी पीड़ा से सरोबार आवाज़ सुनने के बाद बस एक ही शब्द मेरे मुख़ से स्फ़ुटित हो सका---हे भगवान..........उन्होंने बताया कि बेतवा में सिर्फ़ एक फ़ुट पानी व यमुना में दो फ़ूट पानी बचा है जिसकी वजह मानव द्वारा लगातार प्रकृति का दोहन तो है ही किन्तु यहां कुछ और बात भी है बचा हुआ पानी भी लगातार अवैध उत्खनन से जमीन में धसता जा रहा है क्योकि जमुना से बालू और बेतवा से मौरंग भारत के विभिन्न हिस्सों मे भेजी जाती है और यह व्यापार जीवों की लाशों पर बद्स्तूर जारी है बिना रुके.......................................................

बेतवा मे २५ फ़ुट गहरायी तक मौरंग का उत्खनन किया जा रहा है मै नही जानता कानून क्या कह्ता है पर प्रेमशंकर के मुताबिक बेतवा का पानी इस उत्खनन से और नीचे जा रहा है और यह कहते हुए प्रेमशंकर की आवाज़ भर्रा गयी जैसे किसी कि कोइ प्रिय वस्तु य सगा सबंधी उससे दूर जा रहा हो वही दर्द था उनकी आवाज़ में.........आखिर यहां तो ये पानी की एक एक बूंद जीवों की खत्म होती सांसों का सहारा है।
वहां के लोगो का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही रहे तो लोगों को यहा से विस्थापित करना पडेंगा और कोइ विकल्प नही है पर जब पूरी धरती को हम ऐसा कर देगें तो आखिर में कहां जायेगें......................???

तमाम बाते है पर मेरे पास उन परिवारों और उन बेसहारा जनवरों के हालातों को बयान करने के लिये माकूल शब्द नही है कि कैसे वें इस अकाल से जूझ रहे है आप खुद ही समझ लीजियेगा.................................!!!

भारत की विभिन्न भोगोलिक स्थितियां और यहां का बदलता मौसम तो सदियों से है पर आदमी खुश नही तो दुखी भी नही था लेकिन आज जो भी येह हो रहा है सब मानवजनित समस्यायें है और इनका निदान भी मनुश्य के पास है केवल वह प्रकृति का अन्धाधुन्ध दोहन करना छोड़ दे और अपने इस बिना सोचे समझे अनियोजित विकास पर लगाम कस ले बहुत कुछ इतना करने से ही नियन्त्रित हो सकता है। इसका एक उदाहरण है मेरे पास ७०-८० के दशक मे जो लोग यह कह रहे थे कि खादों, कीटनाशक रसायनों, और संकर बीजो का प्रयोग करो आज वही यह कह रहे है कि इस सब को बंद करो नही तो जमीन अनुउपयोगी हो जायेगी इसका कारण तो समझ ही चुके होगें आप कि हमें ये पता हि नही होता है कि हमें क्या करना चाहिये और क्या नही बस कोई विदेशी कम्पनी ने कुछ लालच दिखाया और कुछ विदेशी दबाव और हम शुरू हो गये विकास कि बेनतीजा दौड़ में............खैर..................

आप को बताना चाहूंगा कि खीरी जनपद में १०० से आधिक गांव आग में जल चुके है और यहा एक भीषण त्राशदी ने जन्म ले लिया है मनुष्य जानवर फ़सल पेड़ पौधें सभी कुछ जलकर राख हो चुका है मेरी समझ मे एक बात आती है खीरी जहां कभी जमीन पानी कि वज़ह से गीी हि रहती थी चरो तरफ़ हरियाली कीचड़ पानी से डबडबायी नदियां, तालाब, पोखर, और कुयें इस बात को बहुत ज्यादा दिन नही हुये करीब पिछले २० साल पहले की ही बात है किन्तु आज जहां पानी का इतना भराव रहता था कि कहते है हाथी भी डूब जाये आज वहां रेत उड़ती है तालाब, नदियां कुयें सभी कुछ सूख चुका है पे्ड़ों की जगह मकान, कारखानें और कृषि भूमि ने ले ली नतीजा सामने है मैने अपनी दादी से सुना है कि अक्सर हमारे गांव मे आग लग जाती ्थी पर सब गांव वाले कुओं और तालाबों से पानी ला ला कर आग पर फ़ौरन काबू पा लेते थे पर क्या अब हैंड पम्प से बाल्टी भरभर कर आग की आसमान छूती लपटों को बस मे किया जा सकता है.................................................
चलो प्रकृति मां को एक बार फ़िर से सवांरें तभी मानव इस धरती पर अपना अस्तित्व बचा सकता है -एक चेतावनी.....................

कृष्ण कुमार मिश्र
९४५१९२५९९७

Wednesday, April 2, 2008

महात्मा गांधी और आज का भारत- गांधी को मारने की एक और कोशिश


और आज .....................३१ जनवरी 2008
===१२ फ़रवरी १९४८ बापू के नाम सारा देश === ...............................

भारत कि एक शर्मनाक घटना जिसे भुलाया नही जा सकता - बापू (बापू तो हमारे है ) नही राष्ट्र पिता कि देह भस्म विसर्जन और भारत के प्रधानमंत्री और राष्ट्र पति कि नामौजूदगी ऐसा सिर्फ़ शायद भारत में हो सकता है क्यो कि जिस महामानव कि बदौलत हमें तख्तो ताज मिला हम उसे ही नज़रंदाज़ करने की बेवकूफाना हरकत कर रहे है अरे उस दिन तो राष्ट्रीय दिवस की तरह पूरे भारत को उस महा मानव की पवित्र देह भस्म के विसर्जन मे हिस्सा लेना था जैसे हमारे पुरखो ने सन १८४८ में किया था महात्मा लोगो के दिलो में बसते है उन्हें किशी खिताब की जरूरत नही पर अगर भारत सरकार उन्हें राष्ट्र पिता मानती है और उनके नाम का सिक्का चलवाती है तो उसे यह मालूम होना चाहिए की राष्ट्र पिता के अन्तिम भौतिक अंश यानी देह भस्म विसर्जन को किस तरह आयोजित करना चाहिए.........क्या पंडित नेहरू, सरदार पटेल होते तो ऐसा होता यहा तक की कांग्रेस जो गांधी के नाम पर राजनैतिक लाभ लेती आयी है उस पार्टी का अध्यक्ष वहा मौजूद था मेरा मतलब हुकुमों से है या फिर सबने सभ्यता का दामन छोड़ दिया है .या फिर आफत में ही बापू याद आते है या फिर वोटों के लिए बापू..........अरे कब तक भुनाते रहोगे बापू को.............क्या रूस में लेनिन के साथ या चीन में माओ के साथ ऐसा होता (मान लेते है की वहा भी देह भस्म विसर्जन किया जाता तब ) मेरे मुताबिक तो उस रोज़ भारत में सरकारी उत्सव के तौर पर एक माहौल बनाना चाहिए था ताकि ने पीढी में एक संदेश जाता बापू के आदर्शों का उनकी प्रासिंगकता और मजबूत होती यहाँ एक उदाहरण देना चाहूँगा की एक व्यवसायिक फ़िल्म ने गांधीगिरी को हमारें आज के समाज में जिस तरह स्थापित किया उसका कोई जवाब नही है यदि सरकार उस रोज आल इंडिया रेडियो से बापू के प्रिया भजनों गीतों बापू की आवाज को पूरे दिन ब्राडकास्ट करती टेलीविजन पर दिन भर बापू को दिखाया जाता तो हमारे समाज में यकीनन बापू की प्रासिंगकता बढ़ती और पूरा देश लाभान्वित होता खासतौर पर युवा पीढी पर टेलीविजन पर अपराध सी दी कांड रैप कांड और नर्तकियों के अर्धनग्न जिस्म दिखानें से ही फुर्शत नही बापू का मान बापू के असूलों को समाज में स्थापित करने की चिंता किसे !! वह समाज सबसे गरीब है जिसका कोई गौरवशाली इतिहास नही है और हम अपने इस संघर्षशील अतीत को भुलाने पर तुले है जब दुनिया के तमाम मुल्क अपने अतीत को दुहराने में संघर्सरत है जब समाज को दिशा देने की अवाश्यक्ताए मालूम होगी और हम इतिहास के पन्नों से लक्ष्मी बाई राणा प्रताप गांधी सुभाष को खोजें गे तो वह सब मिलेंगें जरूर पर समाज में उनकी प्रासिंगकता समाप्त हो चुकी होगी तब हम क्या बच्चों को सदी का नायक किसी नर्तक को या फिर नर्तिका को या फिर विदेशी धनी व्यक्तियों के नाम बताएँगे जिन्हें हमारे युवा बहुत ढंग से जानते होंगे और इन नामों के सहारे क्या हम इन १०० करोड़ भारतीयों को किसी लक्ष्य की तरफ़ उन्मुख कर पायेंगे नही विल्कुल नही तब तक हमारी पीढी अमेरिकन कम्पनियों की गुलाम हो चुकी होगी वह सिर्फ़ कॉल सेंटर या फिर विदेशी वस्तुवों के नाम जानते होंगे भारतीयता का तड़का समाप्त हो चुका होगा .................

आजादी के ६० वर्षों के उपरांत मोहनदास करमचंद गांधी यानी अपने बापू की अन्तिम भौतिक निशानी यानी उनके शरीर की भस्म जो अभी तक दुबई में बसे एक भारतीय व्यवसायी भरत नारायण के पास थी उन्होनें इसे मणि भवन गांधी संग्रहालय मुम्बई को दे दिया किंतु तुषार गांधी, महात्मा गांधी के पोते को ऐसा लगा की भविष्य में राजनैतिक दल इसका फायदा उठा सकते है या फिर बापू के भक्त उस स्थल को जहाँ बापू के शरीर की भस्म रक्खी है को पवित्र धार्मिक स्थान में परवर्तित की जा सकते है जबकि बापू एक धार्मिक हिंदू परिवार से थे और धर्म की परम्परा यह कहती है की मृत देह को अग्नि देने के बाद बची अस्थिया व राख को पवित्र नदी खासतौर से गंगा में प्रवाहित किया जाना चाहिए इसी विचारधारा से उन्होंने सन १९९७ में एक प्राइवेट बैंक में रक्खी बापू की देह भस्म को कोर्ट द्वारा प्राप्त कर प्रयाग में संगम में विसर्जित कर दिया था अब यदि कही बापू की देह भस्म बची है टू वह स्थान है पुणे के आगा खान के महल में जहाँ बापू १९४२ से १९४४ तक राजनैतिक बंदी के तौर पर रहे थे और दूसरा स्थान है कैलीफोर्निया के लोस अन्जेल्स शहर में योगेन्द्र आश्रम जहाँ बापू की देह भस्म मौजूद है पर ना जाने कितने घरों मी बापू होंगें कौन जाने उन आजादी के दीवानों में किस किस नें अपने महानायक की देह भस्म को उनकी निशानी के रूप में रख रक्खा हो !!

३० जनवरी १९४८ जब बापू भौतिक रूप से हमसे अलग हुए और उसके १४ दिनों बाद १२ फरवरी १९४८ जब बापू की देह भस्म को हिंदू धार्मिक परम्पराओं के अनुसार और हवाई जहाजों से हिंद्माहसागर से लेकर भारत वर्ष की सभी नदियों में विसर्जित किया गया इन १४ दिनों तक पूरी दुनिया शोकाकुल थी दुनिया के सभी मुल्कों के राष्ट्र अध्यक्षों ने शताब्दी के इस महानायक की मृत्यु पर शोक प्रगट किया बल्कि पूरी मानव आबादी में एक शोकलहर व्याप्त थी
हुआजिस साम्राज्य की जड़े गांधी ने हिला दी उस साम्राज्य को भी गांधी की नामौजूदगी का दुःख हुआ भारतीयों को ही नही वरन ब्रिटिश अमेरिकन रुस्सियन सभी हतप्रभ थे की राष्ट्र पिता महात्मा गांधी को उन्ही के मुल्क में कोई गोली मार देगा जिस व्यक्ति के एक इशारे पर ३३ करोड़ भारतीय उठ खड़ा होता हो जिससे बर्तानिया हुकूमत हर व्यक्ति खौफ खाता हो जिसकी एक आवाज पर ब्रिटिश सरकार की मजबूत नीवं हिलने लगती हो और बंकिम्घम पैलेश थरथरा जाता हो उसे उसके ही देश मी मारा जाएगा .....................!!

किंतु ३१ जनवरी २००८ को जब मणी भवन में रक्खी बापू की देह भस्म को अर्बियन सी अरब महासागर में विसर्जित किया गया तो मुझे बहुत दुःख हुआ यह पुनीत कार्य महत्मा की प्रपौत्री श्रीमती नीलम बेन पारेख ने किया वहां सिर्फ़ बापू के परिजनों व कुछ अन्य लोगो के अतिरिक्त भारत सरकार के नुमाइंदों में गृह मंत्री महारास्त्र के गवर्नर व उप मुख्यमंत्री ने ही शिरकत की ?.................!!

अब आप सोचिए की भारत के राष्ट्र पिता महात्मा गांधी जिनकी आवाज पर ३३ करोड़ भारतीय ही नही बल्कि दुनिया के तमाम देशो के लोग एक साथ उठ खड़े होते थे जिस महामानव के आगे पूरा विश्व झुक गया जिसे दुनिया में देवताओं के बाद सबसे ज्यादा मान्यता मिली हो जो अरबों लोगों के आदर्श हो जिनकी तस्वीर हमने अपनी नोटों पर छापी हो जिन्होंने हमे ही नही पुरी दुनिया को क्रांती का एक नया ढंग समझाया हो हमारी सोई हुई या यूं कह ले की मर चुकी आत्माओं में जान डाली हो और हम गुलामी से आजादी की तरफ़ चल पड़े हो ...............................
इन्ही बापू की जब अश्थिया व देह भस्म सन १२ फरवरी १९४८ को विसर्जित की गयी थी तो तमाम देशों के राष्ट्र अध्यक्षों के अलावा दुनिया के हजारों लोगो के अलावा भारत के ३३ करोड़ भारतवासी जिनमें मई प्रधानमंत्री राष्ट्र पति और तमाम ऊँचे ओहदों पर बैठे भारतीयों को शामिल करता हूँ। उस हुजूम और उसकी भावनाओं का जिक्र मई शब्दों में नही कर सकता किंतु आज जब हमें आजाद हुए ६० वर्ष हो गए और हम कुछ सीखने के बजाये अपनी परम्परा आदर्श, व्यवहार और सदाचरण जैसी बातों को ही भूल गए की बापू की बदौलत जो लोग आज बड़ी बड़ी कुर्सियों पर बैठे है उन्हें बापू की देह भस्म विसर्जित किए जाने पर वहाँ मौजूद रहने की फुर्शत नही मैं कहता हूँ कि क्या लेनिन(उदाहरण के तौर पर) की देह भस्म विसर्जित करनी होती तो क्या रूस के राष्ट्र पति पुतिन वहाँ मौजूद नही होते या फिर अब्राहम लिंकन या जार्ज वाशिंगटन की देह भस्म विसर्जित करनी होती तो जार्ज बुश वहाँ मौजूद नही रहते या फिर माओ की अस्थिया प्रवाहित करनी होती तो क्या चीन के मौजूदा राष्ट्र अध्यक्ष वह मौजूद न रहते पर भारत में ऐसा नही हुआ आज यदि पंडित नेहरू होते तो क्या ऐसा होता या फिर नेहरू, पटेल, डाक्टर राजेंद्र प्रसाद मौलाना आजाद यह तक कि लोहिया जयप्रकाश नारायण कि आत्माएं यह देख कर क्या खुश हो रही होगी ?

गांधी को नाथूराम गोडसे ने नही मारा गांधी को हम मारने कि कोशिस कर रहे है पर ये असम्भव है ....ये एक शर्मनाक सच है जिसे मैंने बयान करने कि कोशिश की है आप की प्रतिक्रियाओं का इन्तजार रहेगा ............

कृष्ण कुमार मिश्र