Sunday, October 5, 2008

आदमियों के जंगल में एक जानवर की मौत



My Beloved Dog is dying due to absence of rabies vaccination programme for dogs.

वह कब पैदा हुई मुझे नही मालूम पर उसकी मौत कब होगी ये मुझे पता है क्योकि वह मेरी आंखों के सामने मर रही है विना किसी इलाज़ के और अब उसका कोई अपना नही है जो उसकी इस पीड़ा में उसका ढाढस बंधाये उसकी रंगों में भी खून दौड़ता है उसके सीने में भी एक दिल है (हार्ट) उसके भी दो आंखें है जो करुण वेदना के बावजूद मुझे निहारती है जैसे........उसकी आंखों में भी चंचलता बसा करती थी कभी वह मुझसे लड़ती थी तो कभी स्नेह मिश्रित भाव से मुझे निहारती थी ्जब मै घर आता तो छोटे बच्चे की तरह रास्ते में मेरी राह देखती और मुझसे आगे आगे घर की और दौड़ती और हां वह बीच बीच में पीछे मुड़ कर भी देखलेती कि मै रहा हूं या नही उसकी तमाम यादें है मेरे पास और मेरे मुहल्ले के लोगो के पास भी पर अब सब खत्म हो रहा है उसे दूध बहुत पसन्द था अब जब मै दूध लेकर आता हूं तो उसकी याद आती है रात मे वह मेरे कम्प्यूटर टेबल के पास जाती और वही सो जाती ........मम्मी की वह बहुत दुलारी थी और उनकी बात भी बहुत मानती थी मेरी मां ने ही उसका नामकरण किया "काली" और अब वह पूरे मुहल्ले की प्रिय काली थी वह रह्ती तो मेरे घर में थी पर उसे पूरी आज़ादी थी अपनी जाति के लोगो के साथ रहने की वह रात मे बरामदे मे सोती तो उसकी मां घर के बाहर सीढ़ियों पर उसके बहुत से गार्जियन थे उसे वह सब बाते सिखाते जो आदि काल से उनके पूर्वज करते आये है वह उन सब के साथ खेलती शिकार करना सीखती यानि उसे दो जातियों का सानिध्य प्राप्त था और इसी लिये वह अदभुत थी मेरी काली.................
हुआ यूं कि आज से तकरीबन आठ महीने पहले मेरे पड़ोसी के एक लड़के ने उसे अपने घर रखा वह अपनी मां को ढ़ूड़ते मेरे घर की तरफ़ रही थी और उस नामुराद लड़के ने उसे अपने घर उस नन्हे जीव को रखा दो दिन बाद उसक शौक खत्म हो गया और वह लावारिस हो गई चूंकि उसकि मां और अन्य जीवो को मेरी मां खाना खिलाय करती है सो उसे भी भोजन मिलने लगा और उसने कुछ ज्यादा नजदीकिया बना ली मेरी मां से और मेरी मां ने तभी उसका नामकरण किया काली और काली अब लावारिस नही थी...............
एक दिन वह अपनी मां और अन्य साथियों के साथ किसी से लड़ रही थी वह गुस्से में थी मां ने उसे अलग कर दिया इस लड़ाई से तभी उस नामुराद पड़ोसी लड़के ने उस्के पीछे से अपना पैर लगा दिया काली गुस्से में थी उसने उसका पैर पकड़ लिया इस बात पर मुझे अचरज हुआ सो मैने कुछ मालिकाना हक दिखाते हुए उसके मुहं में पैर लगाया फिर क्या था काली दौड़ पड़ी मुझ पर और पकड़ लिया मेरा पैर उसका हल्का दांत भी लग गया मुझे मैने तुरन्त अपने पैर साबुन से धुले और बीटाडीन लगाकर काली को देखने लगा आखिर इसे क्या हो गया है लेकिन अब उसका व्यवहार बदल रहा था उसके नजदीक जो भी जाता उसे वह दौड़ा लेती यहां तक कि अपने से बड़े जान्वर को यह नन्ही सी जान खदेड़ देती यहां तक कि मेरी मोटर साईकल उसके नजदीक जाती तो वह उसका टायर चबाने लगती लेकिन उसके नजदीक अगर कोइ ना आये तो वह किसी से नही बोलती यहां तक कि उसने किसी को भी नही काटा अब भी मै जब कुछ सामान लेकर आता तो वह मुझे देखकर मेरे पास जाती और मेरे साथ साथ घर तक आती पर उसके आक्रोश और आक्रमण को देखकर मुझे उससे डर लगने लगा था वह अपने शरीर पर मख्खी भी बर्दास्त नही करती थी फिर भी मै उसे खाना देता तो वह नही खाती हां दूध वह अभी भी पी लेती थी कल दो दिन पहले उसने सुबह थोड़ा सा दही खाया उसके बाद वह तो बिस्कुट खाती और ही अपना प्रिय भोजन समोसा मेरी पीड़ा अब बढ़ रही थी उसकी हालात देखकर पर उसके नज़दीक जाने से डर लगरहा था कभी कभी वह अपना नाम काली कहने पर मेरी ओर देखती पर अब उसमे वह बात नही थी कुछ था जो उसे बदल रहा था आखिर कार मैने रैबीज़ के इन्जेक्शन लगवाना शुरु कर दिया था किन्तु काली को इन्जेक्शन लगाने की हिम्मत नही बची थी शायद उसने कुछ जहरीला जीव खा लिया हो या किसी ने उसे जहर दिया हो या फिर रैबीज़ का राक्षस उसे हम सब से दूर कर रहा था !!!
आज़ वह अपनी अन्तिम सांसे गिन रही है मुझ से दूर आज़ वह पूरे २४ घन्टे से मेरे घर नही आयी हां कल से उसकी ताकत उसका साथ छोड़ रही थी लगभग एक हफ़्ते में काली हम्से दूर होकर इस संसार को अलविदा कह र्ही है मेरे परिचित ने मुझे बताया कि काली यहां है मैने उसे देखा तो जमीन पैरो से खिसक रही हो ऐसे भाव उत्पन्न हो रहे थे और मुझे इतिहास के उस महापुरुष की याद रही थी जिसने यही सब देखकर संसार को त्याग दिया सिद्दार्थ.......
लोगो ने मुझे ढाढस बधाया पर अब सब खत्म हो रहा था मै कायरों कि तरह वहा से चला आया क्यो कि अब मै कुछ नही कर सकता था?
आज़ मुझे सरकारी व्यवस्था पर क्रोध रहा है एक तरफ़ प्राजातियां बचाने की बात हो रही है खासतौर से अगर कुत्तो की बात करे तो टी वी पर इंडियन डाग बचाओ का प्रचार आता है बड़ी संस्थायें आवारा कुत्तो को बचाने की बात करती है पर उन्हे नही मालूम कि इन कुत्तो को अवारा बनाया किसने और भाई ये आवारा क्यो है? ये भी उसी धरती पर रहते है जहां हम सब और ये हमसे पहले आये इस धरती पर और हमने इनके घर जंगल नष्ट कर अपनी बस्तिया बसाई और आज ये आवारा हो गये............यहां तक कि इन्होने आदि काल में हमारा साथ दिया जंगलों में खोन्खार जनवरों से हमारे घरों खेतों और बच्चों कि सुरख्शा की ह्मने इनका सदियों इस्तेमाल किया और अब जब जरूरत नही है तो ये आवारा है

आज रैबीज़ जैसा खतरनाक जानवर इन्हे खत्म कर रहा है और हम जर्मन शेफर्ड और ना जाने कितनी आनुवशिंक प्रदूशित प्राजातियों को पाल रहे है इन्सान ने कुत्ते की नस्ल ही बिगाड़ दी और जो हमारे वास्तविक प्राजाति है वह सड़को पर टुकड़े बटोरने और वही किसी वाहन से कुचल कर मर जाने को मजबूर है क्या हम भारतीय कुत्तों की नस्ल बचा पायेगे?
क्या सरकार रैबीज़ के टीके का इन्तअजाम करती है इन जानवरो> के लिये यदि हां तो कब और कहां मैने अपने जीवन में खीरी जन्पद में कभी ऐसे व्यवस्था नही देखी जबकि इन्सान और जानवरों दोनों के लिये यह जरूरी है क्या पशुचिकत्शालय और एन जी और नगरपालिकायें सिर्फ़ व्यक्तिगत कार्य करने के लिये है
अंत में बस ईश्वर से यही अनुरोध है कि इस के कष्ट दूर कर दे और इसकी आत्मा को शान्ति प्रदान करे?


कृष्ण कुमार मिश्र
लखीमपुर खीरी
९४५१९२५९९७

3 comments:

Udan Tashtari said...

मंगलकामनाऐं.

Arvind Mishra said...

संवेदना !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

भाई, बहुत संवेदनशील लिखा है। इंसान को अपने पुराने साथी की फिक्र करनी चाहिए।