Saturday, August 25, 2007

लखीमपुर खीरी में शारदा नदी उफनायी

मेरी खानाबदोशी से कोई पूंछे
कितना मुशकिल है रास्ते को घर कहना

19 अगस्त 2007 फूलबेहड़ जिला खीरी का बाढ़ प्रभवित इलाके में भ्रमण के इरादे से मै अपने पत्रकार मित्रो के साथ वहाँ गया सड़क “बन्धा” के दोनों तरफ़ पानी ही पानी दिखाई दे रहा था सड़्क पर दोनों किनारों पर लोग बरसाती “पलीथीन” को डन्डों के सहारे तानें हुए जैसे तैसे बरसात व धूप से बचने की नकाम कोशिश कर रहे थे तमाम लोग कुछ राजनेताओं के साथ पूड़ी वितरित कर रहे थें और हम से अपनी फोटों खिचवानें की गुजारिश भी ! इन्ही राजनैतिक गतिविधिओं के बीच सब से बेखबर एक पिता अपने चार बच्चों कों सड़क पर बनाये ठिकाने जिसे घर कहना जरा मुश्किल है अपने बच्चों को दुलार दुलार कर पूडियां खिला रहा था “ मेरा बिटवा पुरी खा ले.........” उन्हे खुश देखकर बडा ही सकून मिला शायद प्रत्येक बरस ये लोग इन हालातों को झेलते झेलते इसे अपनी नियति मानकर इन आपदाओं से समझौता कर चुके थे हम आगे बड़े तो रिमझिम बारिश मे एक लड़की छाता के नीचे ईटों से बने ओवन “अकौहला” में लकड़ियों से खाना बना रही थी तो कुछ लोग तने हुए कपड़ों व बरसातियों के नीचे बैठ्कर बातें कर रहे थें बच्चे सड़क पर इधर उधर दौड़ लगा रहे थे कही कही पर कुछ बाढ़ पीड़ित महिलायें बच्चें कटान कि तरफ़ बड़ी तेजी से हंसते मुस्कराते बड़े जा रहे थे सरकार व राजनेताओं क हुज़ूम व उनकी चमचमाती हुई मोटरों को देखने पहले इन लोगों के हालात देखकर मैं अपने को एक तमाशबीन के रूप में देख रहा था और अपने पर शर्म भी आ रही थी की मैं यहां सिर्फ़ फ़ोटो खीचने और इनकी दुर्दशा देखने आया हूं ना कि इनके लिये कुछ बेहतर कर पाने ! और तब बड़ा रन्ज हुआ जब यहा अपने जैसे तमाम तमाशबीनों को देखा खाशतौर पर नेताओं व ठेकेदारों को और कुछ स्थानीय मगरमच्छों को ये सब इन पीडित लोगो से कुछ न कुछ पानें के आशय से यहां आ रहे थे न कि देने के; वज़ह साफ़ थी नेता अगले एलेक्शन के वोट बटोरने ठेकेदार काम तलाशने और कुछ स्थानीय अवारा लोग इनकी बहू बेटियां ताकने और हम भी कुछ दर्दनाक ह्रदयविदारक तस्वीरें ढ़ूड़ने कुल मिलाकर तस्वीर साफ़ थी की हरकोई अपने ही चक्कर मे था।

आगे बढ़ने पर लारियों से पत्थर उतारे जा रहे थे भारी तदाद में मजदूर तार के जाल बनाया जा रहा था उनमें मिट्टी भरी बोरियां भरी जा रही थे बांस व बल्लियों को गहरे पानी मे धसायां जा रहा था ताकि पानी के तेज बहाव में बल्लियों के सहारे पत्थर व बोरियां डाली जा सके और पानी के बहाव को रोका जा सके। इसी जगह पर सिचाई विभाग के आला अफसर रन्गीन अंग्रेजी छतरियों की छांव में आराम फरमा रहे थे और ठेकेदार उन्हे चारो तरफ़ से घेरे हुए उनकी आवभगत में तल्लीन। हमारे पहुंचने पर अफ़सरों ने अपने काम की तारीफ़ क सिलसिला शुरू किया तो ठेकेदारों ने मिठाई व फ़लों से हमारा स्वागत जो अफ़सरों की खुशी के ;लिये था न कि हमरे खाने के लिये............!
एक अफ़सर ने मुझे बताया कि पानी के बहाव पर अगर ध्यान दे तो आप को पानी दायी तरफ़ की तरफ़ भागता दिखायी देगा और इसी लिये लगभग कटान दहिनी तरफ़ को होते है ऐसा इस लिये होता है के तर्क में उन्होने बताया की धरती की अपनी धुरी पर घूमने के कारण ऐसा होता है..................!

दर असल यहां सड़क का कटान अपने आप नही हुआ था बल्कि सड़क के एक तरफ़ बाढ़ अत्याधिक हो जाने के कारण ग्रामीणों ने सड़क को काट दिया था तकि पानी दुसरी तरफ़ उतर जाये और उन लोगो का मानना था कि जब तक बन्धे को काटा नही जायेगा तब तक प्रशासन हमारी सुध नही लेगा...................! मेरा मानना है कि बन्धा बाढ़ प्रभावित इलाकों के लिये कोई माकूल विकल्प नही है।

आधे बने बन्धे पर जब हम गये तो वहा एक सहमा सहमा सांप डाले गये पत्थरों पर अपना ठिकाना तलाश रहा था।

यही पर एक बड़े अफ़सर से पूछने पर बताया कि किशनपुर वन्यजीव विहार के झादी ताल का शारदा नदी द्वारा हो रहे कटान के लिये ३.६४ सौ करोड़ रूपये का प्रोजेक्ट है जो काफ़ी कम है जबकि मेरे हिसाब से यह बहुत बड़ी रकम है इस काम के लिये और पर्याप्त भी।

झादी को यदि जल्दी ना बचाया गया तो दुनिया मे सबसे अधिक संख्या मे पायी जाने वाली बरहसिन्घा की प्रजाति समाप्त हो जायेगी लेकिन वन विभाग नहर विभाग व स्वमसेवी संगठनों कि ललचायी नज़रों से यह रकम वास्तव में क्या झादी ताल कि जीव सम्पदा को बचाने के काम आ पायेगी।


कॄष्ण कुमार मिश्र

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

अच्छा रिपोर्ताज है। फोटॊ होती तो और अच्छा था।

mamta said...

लिखा तो अच्छा है पर फोटो भी होती तो शायद वहां के हालत हमे और अच्छे से पता चलते।